और था एक हाथी
पापा, जवाब दो ना
और था एक हाथी
किरदारों पर दांव

कहते हैं कि कुछ पात्र कभी नहीं मरते... कुछ किरदार दर्शकों के दिलों पर ऐसा अक्स छोड़ जाते हैं जो गुजरते वक्त के साथ धुंधला होने की जगह और गहराता जाता है... फिल्म इंड्रस्ट्री में ऐसे किरदारों को भुनाने का दौर नया नहीं है... हॉलीवुड में तो ये फैशन है ही पर अब बॉलीवुड भी हर हिट किरदार को दोबारा भुनाना चाहता है... नगीना में श्री देवी की नागिन और सपेरे की दुश्मनी दुनिया ने देखी... फिल्म सुपर डुपर हिट रही और श्री देवी की नागिन ऐसा ही न भूलने वाला किरदार बन गई... लेकिन जब श्री देवी नागिन बनकर दोबारा निगाहों के ज़रिये पर्दे पर आईं तो वो दर्शकों के निगाहों में जगह नहीं बना सकीं... ये मिसाल भर है कि हिंदी फिल्म इंड्रस्ट्री में सिक्वल बहुत सफल नहीं रहे हैं... वास्तव में संजय दत्त मुंबई के डॉन बने तो दर्शकों ने उनकी अदाकारी का खूब सराहा... लेकिन वास्तव के सिक्वल हथियार में संजय दत्त के साथ शिल्पा शेट्टी की जोड़ी को खारिज कर दिया... लेकिन सिक्वल फिल्मों के लगातार प्लॉप के बाबजूद दमदार किरदारों का मोह डायरेक्टर नहीं छोड़ पाये...
सिक्वल फिल्मों के प्रयोग में सिनेमा के साहूकारों को मोटा मुनाफा दिखाई देता है नहीं तो यशराज फिल्म्स, राकेश रोशन और विधु चोपड़ा जैसे बड़े बैनर सिक्वल पर इतना पैसा नहीं लगाते... लेकिन यहां ये बात भी ध्यान देने वाली है कि एक हिट फिल्म की सफलता से उसी किरदार पर बनने वाली दूसरी फिल्मों से उम्मीदें बढ़ जाती हैं और इसीलिए सीक्वल बनाने के लिए खास तौर पर तैयारी की जरूरत होती है...निर्माता निर्देशक पर दबाब होता है कि वो पिछली फिल्म से बेहतर फिल्म बनाए क्योंकि लोग सिक्वल फिल्म सिर्फ इसलिए देखने नहीं जाते कि फिल्म बेहतर हो बल्कि लोग उस फिल्म की पुरानी फिल्म से तुलना भी करते हैं... हॉलीवुड के जेम्स बॉण्ड की तर्ज पर हो सकता कि संजय दत्त मुन्ना भाई २, ३, ४, और ५ में भी देखने को मिलें...
मुन्नाभाई एमबीबीएस के हिट होने के बाद लगे रहो मुन्ना भाई भी जबर्दस्त हिट रही थी... हिट सीक्वल फिल्मों में फिर हेरा फेरी का नाम भी शामिल है जो जबर्दस्त कॉमेडी फिल्म हेरा फेरी की सिक्वल है... एक्शन फिल्मों में धूम के बाद धूम २ आई पर सफल हुई सुपरनेचुरल पावर पर बनी कोई मिल गया की सिक्वल कृष... अब सुनने में आ रहा है कि घायल, नो एंट्री और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों के सिक्वल की भी तैयारी चल रही है... यानी हिट फिल्मों के रीमेक को भले ही दर्शकों ने सिरे से खारिज कर दिया हो पर हिट किरदारों के सिक्वल पर अभी फिल्मकारों का भरोसा बना हुआ है...
देवेश वशिष््ठ 'खबरी'
9811852336
आरूषि की चिट्ठी
डियर पापा
दुनियावी रस्म तो नहीं है कि ये खत आपको मिले...क्योंकि अब तो मैं उस देहरी पर हूं ही नहीं....जहां रिश्ते अब किसी दूसरे जामे में देखे जाते हैं। लेकिन मैं जानती हूं मैं जो लिख रही हूं वो आपके जेहन में है....सवाल कई हैं पापा...कितने पूछूं...कितने छोड़ दूं....कहां से शुरू करूं.....वहां से जब आप मुझे अस्पताल से रूई के फाहों में सहेज कर लाए थे....या वहां से जब अपने कांधे पर लेकर सीढ़ियां उतरे ......पापा....आपके पास इतना भी वक्त नहीं रहा कि कभी मेरा स्कूल बैग चेक कर लिया होता...तो पापा मैं क्या कर रही हूं , कैसे कर रही हूं...इससे आपको भले ही कोई मतलब न हो..मुझे इससे था कि आप क्या कर रहे हैं.....सोचना पापा...जेल की उस अंधेरी कोठरी के एक कोने में बैठ कर ....कि कहां चूक हो गई हमसे.....और मां....तुम भी सोचना कि अभी तक चुप क्यों हो...तुम
तुम्हारी
बेटू
तुम्हारे लिए
गंगा जो इक नदी थी.....
चौंकिए मत, ये तस्वीर जो आप देख रहे हैं...जोधपुर या बाड़मेर की नहीं है। इलाहाबाद का रसूलाबाद घाट है जहां से होकर नदी कुछ अरसा पहले तक बहती थी। आज गंगा की जगह अगर कुछ दिखता है तो सिर्फ रेत के ढूहे और ऊंटों के लंबे कारवां। यहां से कुछ दूर पर ही वो संगम है जिसका पुराणों में उल्लेख है। कहते हैं कि अब सिर्फ गंगा और यमुना हैं...सरस्वती विलुप्तप्राय है। सवाल है - कहीं गंगा का भी यही हश्र न हो ? ये फोटो इलाहाबाद से स्कंद ने भेजी है जो पर्यावरण को प्रति उतने ही चिंतित हैं जितना अपने बेटों के भविष्य को लेकर।
आरक्षण का अफ़साना
लोकसभा और राज्यसभा की गद्देदार सीटों पर बैठने वाले मर्दों को 20 साल बाद अब बुरा लग रहा है। 20 साल पहले जब मंडल कमीशन के लिए इन्हीं लोगों ने ' अलख ' जगाई थी..तब सोचा नहीं था कि एक दिन उस आंच में खुद भी झुलसना पड़ सकता है। अब मुद्दा संसद और विधानसभा में औरतों को आरक्षण देने का है। 12 साल में चौथी बार पेश हुआ तो बिल की ऐसी की तैसी कर दी गई। बाहुबलियों की एक पार्टी ने बिल को कई टुकड़ों में बांट कर उन्हें हवा में ऐसे उछाल दिया..मानों कह रहे हों कि ...जोड़ के दिखाओ तो जानें.....। ये वही लोग हैं जिन्होंने दो दशक पहले नौकरियों में आरक्षण की मांग कर राजनीति में अपनी पैठ बनाई थी...इनमें वो चेहरे भी हैं जो मंडल की आग में बच्चों को झुलसते देखते रहे...मुंह पर ताला लगा लिया और बाट जोहने लगे राज्यसभा सीटों के ईनाम की। आज वही लोग लड़ रहे हैं....कहते हैं ...जी, महिलाओं के लिए संसद और विधानसभा में आरक्षण नहीं होना चाहिए। लेकिन क्यों...नौकरियों में आरक्षण ज़रूरी है लेकिन संसद में नहीं ? क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा परेशान हैं। उनका शक इस बात पर है कि अगर मौजूदा विधेयक पास हो गया तो उनको पास जीत कर आने लायक महिलाएं नहीं होंगी। इसलिए आरक्षण के भीतर एक आरक्षण हो और 33 फीसदी में भी उन जातियों को आरक्षण दिया जाए जो पिछड़ी हैं। सवाल सिर्फ यही है कि आरक्षण होते हुए भी नौकरियों में सही उम्मीदवार क्यों नहीं मिलते....या आरक्षण समर्थक पार्टियों को डर क्यों है कि चुनाव जीतने लायक उम्मीदवार उनके पास नहीं...जवाब है क्योंकि उसके लिए कभी कोई कोशिश की ही नहीं गई। 61 साल हो गए आज़ादी को...प्राथमिक शिक्षा पर न जाने कितने पैसे खर्त हो गए...लेकिन हल जोत रहे किसान के बच्चे को क्लास तक लाने की आज तक कोशिश की ही नहीं गई...क्योंकि कोशिश करते ...तो दिल्ली में मजे कैसे लूटते....इसलिए आसान है कि नौकरियों में ही आरक्षण दे दो....वो तो संसद के एयरकंडीशंड हॉल में ही हो जाएगा...उसके लिए गांवों और कस्बों के धक्के खाने की ज़रूरत क्या है भला। शायद इसीलिए पिछड़े , 61 साल बाद भी पिछड़े हैं.....और अफसर वो बन रहे हैं जिनके मां बाप अफसर थे। नेताओं को नतीजे जल्दी चाहिए क्योंकि वो चुनावों में काम आते हैं.....उनके लिए समाज का ढांचा बदलना भी किसी सड़क या पुल के बनवाने जैसा है...जिसका बखान कर उन्हें अगला चुनाव जीतना होता है। लेकिन चूंकि इस तरह समाज नहीं बदलेगा....इसलिए आरक्षण की व्यवस्था भी चलती रहेगी..और चलती रहेगी दुकानें भी।







