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''मेरा चिर सुख''

सारे दिन की व्यस्तता के बाद भी
मेरे अहसास के कुञ्ज में
उन शुभागत ,बसंती पलों का ,
स्मरण कौंध जाता है,
अक्सर....

जब थक कर कुम्भ्लाती ॥
मेरी सुकुमार छवि को॥
पुनर्नवा बना देता था...
तुम्हारा एक स्नेहिल स्पर्श....


संग लिए लाड-प्यार॥
मनुहार और वो सब कुछ...
जिन्हें छलावा कहने को ॥
जी नहीं चाहता...
जिनमे घुल कर...
भूल जाती हूँ....
मै अपने सब दुःख....
आह मेरा ''चिर-सुख ''॥

(सुमन इलाहाबाद की एक कुशल गृहस्थिन हैं। घर बाहर पूरा उनकी अंगुलियों पर है। व्यस्तता किसी बड़ी कंपनी के सीईओ जितनी। लेकिन लिखना उनकी थकान कम करता है।)

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जो बीत गई सो बात गई




जो बीत गई सो बात गयी


जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया

अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गये फ़िर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मचाता है

जो बीत गई सो बात गई


जीवन में वह् था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियां
मुर्झाईं कितनी वल्लरियां
जो मुर्झाईं फ़िर कहां खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई


मृदु मिट्टी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आये हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अंदर
मधु घट हैं मधु के प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वो मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है

जो बीत गई सो बात गई


-डा. हरिवंशराय बच्चन

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रमता जोगी, बहता पानी




रमता जोगी, बहता पानी
तेरी राम कहानी क्या...
आहट-आहट, चौखट-चौखट
बैरी नई पुरानी क्या...?

रातों के लम्हे भी मुझको
बिल्कुल वैसे ताजे हैं...
जैसे साखी, सबद, सवैये
कोई प्रेम कहानी क्या... ?

सागर, पत्ते, हवा, पहाड़ी
नदियां अभी रवानी हैं...
लेकिन सारी बातों मुझको
तुझको सुनी सुनानी क्या...?

आते जाते, रुकते चलते
अब भी नश्तर चुभता है...
जब जब कह देता है कोई
गा दूं तुझको हानी क्या...?

पागल, पागल होकर देखा
तेरे एक बहाने से
और तभी से दुनिया भर की
मुश्किल मुझको मानी क्या...?


- देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

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इंशाजी उठो अब कूच करो



इंशाजी उठो अब कूच करो,

इस शहर में जी का लगाना क्या

वहशी को सुकूं से क्या मतलब,

जोगी का नगर में ठिकाना क्या

इस दिल के दरीदा दामन में

देखो तो सही, सोचो तो सही

जिस झोली में सौ छेद हुए

उस झोली को फैलाना क्या

शब बीती चाँद भी डूब चला

ज़ंजीर पड़ी दरवाज़े पे

क्यों देर गये घर आये हो

सजनी से करोगे बहाना क्या

जब शहर के लोग न रस्ता दें

क्यों बन में न जा बिसराम करें

दीवानों की सी न बात करे

तो और करे दीवाना क्या


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26/11, मुंबई और असली आतंकवादी

" समझ नहीं आता, तारीखों से क्या रिश्ता है... क्या 26/11 के ज़ख्मों से खून सिर्फ आज के हीं दिन रिसता है..... ??? "ये वो लाइनें हैं जो 26 नवंबर को लिख पाया बस... लेकिन जब से मुंबई का दौरा कर के लौटा था तब से हीं सोच रहा था कि इस बाबत कुछ लिखुंगा.... पर समय नहीं मिल पाया... 26/11 पर बनने वाली एक डॉक्यूमेंट्री के सिलसिले में मुंबई गया था.... 3 दिन शूट किया... हर उस जगह को करीब से देखा जहां की दीवारों, गलियों और सडकों तक से खून रिस रहा था एक साल पहले.... लोगों को भी देखा.... जिन्होंने ये सब देखा और झेला है.... जिनके आस-पास हादसा तो हुआ लेकिन वो महज़ viewer भर थे, उनके लिए 26/11 को याद करना, कैमरे के सामने सब बोलना, कहानी की तरह बताना.... बहुत मुश्किल नहीं था... कुछ तो शायद बोलते बोलते प्रोफेश्नल हो गये थे.... कामा हॉस्पिटल में एक शख्स मिला जिसने कसाब के साथ बीस मिनट बिताये थे.... और जिन्दा बच गया था.... मिलकर मुझे लगा कि शायद इसकी रुह तक कांप जाये हमें उस दिन के बारे में बताने में... लेकिन उसने तो टेक पर टेक दिये... सबकुछ इनऐक्ट कर के बताया.... यहां तक कि जब हम उससे पहली बार मिले और लिफ्ट का इंतज़ार कर रहे थे तो मैंने बातों बातों में उससे पूछा कि उस दिन हुआ क्या था... और उसने कहा... देखो साहब, बार बार नहीं बताउंगा... घबराओ मत, ऊपर चलो... सब ऐक्ट कर के दिखाउंगा... मेरे तो होश फाख्ता हो गये.... क्योंकि जब उसने कहा कि वो नहीं बताएगा तो मुझे लगा कि बेचारे के जख्म हरे हो जाते होंगे शायद बार बार बताने में लेकिन फिर लगा कि नहीं ये तो हैबिच्वुअल हो चुका है और अपना समय बरबाद नही करना चाहता....इंटरव्यू खत्म होने के बाद तस्वीर और साफ हुई कि उसे बस पैसे चाहिए थे.... थोड़े और............लोग हंस रहे थे.... मस्त थे... बेखौफ हर उस जगह, जहां हमला हुआ था, मौजूद थे.... मुझे लगा शायद प्रशासन की तैयारियों ने इस बेखौफी को जन्म दिया है... लेकिन उनसे बात करके पता चला कि नहीं, उनसब को पूरा यकीन था कि मुंबई पर दुबारा ऐसा हमला हो सकता है.... फिर क्या चीज़ थी जो उन्हें डरने नहीं दे रही थी.... इस सवाल को साथ लिए मुंबई से दिल्ली वापस आ गया....और इस बात का जवाब मिला मुझे 26/11 के दिन शो एंकर करते वक्त, जब एक 10 साल की बच्ची हमारे साथ मुंबई से लाइव बैठी.... मुंबई हमलों में उसने टांगे गंवा दी हैं और कसाब मामले की सबसे कम उम्र की गवाह है वो.... बातचीत ठीक चल रही थी... मैं शायद उसका दर्द उससे ज्यादा महसूस कर पा रहा था... पर शो के अंत में जब उसका धन्यवाद करने लगा तो वो अचानक बोल पड़ी कि मैं लोगों से कहना चाहती हूं कि मेरा स्कूल में ऐडमिशन कराओ, मुझे घर चाहिए और टीवी भी और....... वो बोल हीं रही थी साउंड इंजीनियर ने पीसीआर से उसका ऑडियो काट दिया.... मैं सन्न था... जैसे तैसे शो वाइंड अप किया.... और उस वक्त लगा कि मुंबई में जो देखा और उस मंज़र ने जो सवाल पैदा किए उनसब का जवाब इस छोटी सी बच्ची ने दे दिया.... हर दर्द, हर तकलीफ शायद कुछ पल के बाद नहीं लौटती लेकिन भूखे पेट की हीं तकलीफ ऐसी है जो हर कुछ घंटों के बाद मुंह बाये सामने खड़ी हो जाती है.... और इसीलिए, किसी को डर नहीं लगता किसी आतंकी हमले से, किसी कसाब से, किसी अबु इस्माइल से... या फिर कहूं कि ज्यादा देर डर नहीं लगता क्योंकि सबको पता है कि इनसे डर गए तो पेट की आग जला कर मार देगी.... आतंकियों से तो फिर भी 60 घंटे लड़ा जा सकता है,जंग जीती जा सकती है लेकिन भूखे पेट का आतंक 60 घंटे क्या, 6 घंटे में हीं वो दर्द देने लगता है जो शायद AK-47 की गोलियां भी न देती होंगी.... 26/11 के आतंकियों ने भी सबकुछ धर्म के नाम पर भले किया हो लेकिन वो भी अपने परिवार वालों को भूख के आतंक से दूर रखने के लिए हीं खुद सूली चढ़े.... ये भी एक सच है....और शायद सबसे बड़ा सच ये है कि हर दिन एक 26/11 है... जहां हम सब जिन्दा रहने की लड़ाई लड़ रहे हैं... और आतंकी भूख, घात लगाये बैठी है...

सुशांत सिन्हा

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'लौ' रौशन हो रही थी...

एक लौ रौशन करना मक़सद था..।
याद आ रहे थे पिछले साल के वो लम्हें जब आंखों से शहीद एनएसजी मेजर संदीप उन्नीकृष्णन के पार्थिव शरीर पर उनकी मां को बदहवास, रोते-बिलखते देखा था... उन इमोशन्स को कैश करवाने के लिए मुझे दृश्यों को "लुका-छिपी बहुत हुई, सामने आ जाना... कहां-कहां ढूंढा तुझे, थक गई है अब तेरी मां" गाने के साथ एडिट करवाने का आदेश मिला..। मेरे दोस्त मुझे बेहद मज़बूत दिल और कभी न रोने वाली लड़की के तौर पर जानते हैं लेकिन इस काम को करते वक्त कितनी बार दिल रोया.. कितनी बारे आंखें छलकी और कितनी बार लंबी सांस लेकर ख़ुद को संभाला.. मैं ही जानती हूं..।
26/11 की बरसी पर उन यादों को मोमबत्ती की लौ में रौशन देखना चाहती थी..।
जानना चाहती थी कि दिल्ली के दिलवाले कैसे 'ख़ामोशी' के साथ आवाज़ बुलंद करते हैं..। इसलिए रात को दफ़्तर से जल्दी छुट्टी लेकर इंडिया गेट की तरफ़ रुख़ किया..। ऑटो मैं बैठी थी लेकिन मन जैसे ख़्यालों के बोझ से मनभर हुआ जा रहा था... मैं क्या करुंगी वहां, क्या किसी से मेल-मुलाकात या बातचीत करुंगी, ख़ामोशी से उस लम्हें को महसूस करुंगी या फिर बस मोमबत्तियां जलाकर वापस लौट जाऊंगी..। लेकिन जैसे ही इंडिया गेट दिखाई दिया और मैं ऑटो से उतरकर उसके क़रीब पहुंची तो ख़्यालों का तूफ़ान थम चुका था..। शान और रौब के साथ खड़े इंडिया गेट की दीवार... और उसके नीचे ख़ुद को बेख़ौफ़ खड़ा पाकर... मन ने सलाम किया उन वीरों को जिनकी बदौलत मुझे वहां खड़े रहने की 'आज़ादी' नसीब थी..। मैं जैसे उस लम्हें में खो सी गई थी, फिर किसी ने अचानक आकर पूछा "Do you want to light a candle", मुझे अचानक याद आया कि हां एक 'लौ' जलाने के लिए ही तो आई हूं मैं..। मैंने उस शख़्स से वो मोमबत्ती ली और ठीक अमर जवान ज्योति के सामने जहां सब लोग मोमबत्तियां जला रहे थे... एक मोमबत्ती जला दी..। सैंकड़ों मोमबत्तियों की रौशनी में मुंबई हमलों के शहीदों की तस्वीर वाला बोर्ड झिलमिला रहा था..। नज़रों ने कहा वाह दिल्ली, मानना पड़ेगा वर्किंग डे पर भी वक़्त निकालकर तुम लोग यहां आए हों..। ख़ैर, नज़रों की ये वाहवाही बहुत देर तक बरक़रार नहीं रही... क्योंकि जब नज़रों ने आसपास के मंजर को थोड़ा और गहराई से समझना शुरू किया तो दिल टूट सा गया..।
चेहरों पर कोई गंभीरता नहीं थी, लोग इंडिया गेट पर अपनी उपस्थिति का सबूत देना चाहते थे, लिहाज़ा इंडिया गेट के हर कोने पर खड़े होकर तस्वीरें खिंचवाई जा रही थी..। पिकनिक स्पॉट की कमी को पूरा करने के लिए चाट-पकौड़ी, आइसक्रीम, चाय-कॉफ़ी, बच्चों के खिलौने और लड़कियों के साज-श्रृंगार का सामान बेच रहे रेहड़ी वाले भी अच्छी-ख़ासी तादाद में मौजूद थे..। मीडिया के कैमरामैन और अखबारों के फोटोग्राफर्स को चिंता थी कि कहीं कोई तस्वीर कैमरे में कैद होने से छूट न जाएं, और रही सही कसर सिगरेट फूंक रहे नौजवानों ने पूरी कर दी..। बस सुक़ून था तो इस बात का कि कम से कम कुछ माता-पिता तो ऐसे थे जो अपने बच्चों को इंडिया गेट पर मोमबत्ती जलाने का मतलब समझा रहे थे, या फिर कुछ बुज़ुर्ग (शायद आर्मी के रिटायर अधिकारी रहे होंगे) जिनकी आंखें मोमबत्तियों के उस नूर को सम्मान के साथ देख रही थी..।
मै किनारे एक मुंडेर पर बैठकर इंडिया गेट को क़रीब से महसूस कर रही थी..। शायद इतने क़रीब से जितना 22 सालों के सफ़र मे कभी महसूस नहीं किया था..। खुले आसमान के नीचे, अनजान चेहरों के बीच... मोमबत्तियों की लौ पर नज़रें टिकाए हुए, मैं कहीं ख़ुद को भी तलाश रही थी..।
रात डूब रही थी.. भीड़ छंट रही थी..। खुले आसमान के नीचे ठंड जैसे बदन का खून जमा रही थी... लेकिन कुछ था जो पिघल रहा था और 'लौ' रौशन हो रही थी..।

--मीनाक्षी कंडवाल

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मैं मां बन गया हूं... (कॉन्ट्राडिक्शन-5)



निष्ठुर... उसके फोन में मेरा नाम इसी नाम से दर्ज था, और मैंने अपनी फोनबुक में उसके बारे में दुष्ट लिख रखा था... मैं अक्सर अपनी प्रेमिकाओं के वो नाम भूल जाया करता था जो उनकी हाईस्कूल की मार्कशीट में दर्ज थे या जिनके साथ मेरी पहली मुलाकात उनसे हुई थी... ये बात शायद अजीब लगे लेकिन शहर बदलने के बाद मैं अपनी उस प्रेमिका को सिर्फ इसलिए नहीं ढूंढ पाया कि उसे बिट्टू के नाम से कोई नहीं जानता था...

यानी ये दूसरी प्रेमिका थी... (अगर मैंने कहीं अपने लेखन में सोलन की चिड़िया का भी जिक्र किया है तो फिर तीसरी...) बुरा होना इस दौर की समझदारी थी, इसलिए मैं उसे और वो मुझे अक्सर बुरे नामों से पुकारता था... मेरे कमरे की दीवारें छोटी थी, और उसकी छत को में एकटक देखता था और अक्सर उस पर लटकते सपने को तोड़ लेता था... उन दिनों में उनींदा रहने लगा था...

मैं अपनी बकवास और फ्रस्टेशन को किसी से न कह सकने की स्थिति में अक्सर कागज पर उतार देता, और तालियां बटोरता... मुझे इसकी आदत हो गई थी, और अब तुम्हारे बिना भी मैं आत्ममुग्ध हो सकता था...

उन दिनों में मां होना चाहता था और छत के पंखे के नीचे पसीने के तर तकिये को भूलकर घंटों दुनिया से बेहोश रहता था... दिमाग बाकी जिस्म से अलग होकर कहीं तैरने चला जाता था, या लगता था कि सिर्फ दिमाग सो गया है... बाकी बेहोश जिस्म देर तक जिंदा रहता था... और फिर मर कर ना जाने कैसे लौट आता था... जैसा भी था, अच्छा दौर था...

मैं तुम्हें अक्सर याद करने की कोशिश करता था... और जब बहुत सोचने पर भी तुम्हारा चेहरा... तुम्हारा रंग और तुम्हारी कोई पहचान मुझे याद नहीं आती तो मैं शराबी हो जाना चाहता था... मुझे लगता कि मैं तुम्हें न जानते हुए भी भावुक होना चाहता हूं... तुममें डूब मरना चाहता हूं... तुम्हें तमाम रंगों में से चुन लेना चाहता हूं और तुम्हारे माथे पर लाली मलना चाहता हूं... पर तुम मुझे याद नहीं आती थीं...

मैं उस दौर की उलझनों से निकलने के लिए बहस करता... सिगार पीता... या शायद बीड़ी... किसी दोस्त के कहने पर फोस्टर की बीयर और बैगपाइपर की शराब... और फिर इन सबसे निजात पाने के लिए कभी कभी तुम्हें याद कर लिया करता... इस सब से मैं अक्सर परेशान रहता और फिर और नशीला हो जाता...

मैं हमेशा चाहता कि तुम मेरा जिक्र करो... मेरा नाम लो और मै तुम्हें पुकार लूं... लेकिन न तो मुझे तुम्हारा नाम याद रहता और ना ही तुम्हें मेरा... और अचानक मुझे पता चलता कि मैं अब तक तुमसे नहीं मिला हूं... देर तक तकिये पर पसीना बहाता रहता और अक्सर पंखा चलाना भूल जाता... मैं अक्सर खामोशी में सोचता कि तुम्हारा अस्तित्व कैसा है...? मैं तुम्हारे लिए परेशान होना चाहता और तुम्हें ढूंढने की कोशिश करता...

मैं अक्सर तुम्हारे ना होने में होने की उम्मीद करता... कल्पनाओं में जीता... और तुम्हारे जिस्म की बनावट को अक्सर ओढा करता... मैं तुम्हें बेपनाह मोहब्बत करना सीख गया था... इसलिए तुम्हें जानना चाहता था... इसलिए मैं अक्सर तुम्हें पैदा कर लिया करता था...

तुम अगर उस दौर में होतीं तो मैं तुम्हारी मां बनता... वैसे तुम आज भी होतीं तो भी मैं मां ही बनता... हर बार तुममें खपने की कोशिश करता और निराश होकर बार बार आत्महत्या करता रहता... और इस तरह जीना सीखकर तुम्हें इस दुनिया का सामना करना सिखाता... मैं उन दिनों मां होना चाहता था... हर लड़के की तरह...
देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

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