Sunday, December 11, 2011

जाना....देवानंद का

कल लंदन में देवानंद का अन्तिम संस्कार किया गया। मैं उनका फैन रहा हूं और उनकी फिल्में देखी – समझीं भी हैं। मुझे लगता है कि प्रेम करना देवानंद के लिए उस धागे की तरह रहा , जिसके दोनों सिरे हमेशा उनके पास रहे...जब चाहा प्यार किया और जब लगा कि हवा को मुट्ठी में कैद नहीं कर सकते, तो कमंडल उठाया और एक वैरागी की तरह सब कुछ छोड़ कर आगे बढ़ लिए। अपने से बड़ी स्टार सुरैया पर फिदा हुए तो ज़मीन – आसमान एक कर दिय...ा....दुर्गा खोटे और कामिनी कौशल के ज़रिये ख़त भिजवाए....मान-मनौव्वल की...और जब लगा कि सुरैया नहीं मिल सकती....तो एक ही झटके में सब भूल भी गए। उसके बाद कभी मिले भी नहीं सुरैया से.. एक बार किसी फिल्मी पार्टी में आमना – सामना भर हुआ..बस। अपने किसी इंटरव्यू में उन्होंने कहा भी कि – अगर उससे मेरी शादी हो भी गई होती , तो क्या पता उसके बाद मैं वो न रहता , जो अब हूं। सुरैया जब बीमार पड़ीं तो किसी ने देव साहब को इत्तिला की कि वो अस्पताल में हैं..उन्हें देखने जाना चाहिए। लेकिन वो नहीं गये। ये एक बड़ा सवाल है कि वो मरती हुई सुरैया को देखने क्यों नहीं गए। शायद उन्हें लगा हो कि प्रेम की जिस गली को वो ऐश्वर्य के उद्दाम पर छोड़ आए थे..उसमें फिर जाना ठीक नहीं। हो सकता है कि देव साहब सुरैया को उस हालत में देख न सकते हों..बूढ़ी ...जर्जर...अस्पताल के बिस्तर में धंसी हुई सुरैया...एक वक्त की मलिका.. जिससे उन्होंने सब कुछ भूल जाने की हद तक प्यार किया था। प्रेम में उन्होंने लोकतांत्रिक मूल्यों का भी पूरा खयाल रखा। ज़ीनत को ज़ीनत अमान उन्होंने ही बनाया था। पहला ब्रेक दिया और फिल्म पूरी होते होते उन्हें ज़ीनत अमान से प्यार हो गया। बकौल उनके इसके बाद जेनी बेबी के साथ उन्होंने एक और फिल्म सोच रखी थी। लेकिन एक रात किसी फिल्मी पार्टी में ज़ीनत के साथ पहुंचे तो , कुछ ऐसा हो गया कि उन्हें अपनी मंज़िल बदलनी पड़ी। इस पार्टी में उन्होंने ज़ीनत को राजकपूर की बांहों में झूलते देख लिया...और सन्न रह गए। पार्टी से बाहर आए...सिगरेट सुलगाई...और सोचा कि छोड़ो भी...वो मेरी गुलाम तो नहीं....राज के पास जाती है तो जाए। और...देव साहब एक बार फिर अकेले हो गए। बड़ा हौसला चाहिए इसके लिए...सिर झटक देना ..और दूर हो जाना। मेरे ख्याल से हर फिक्र से परे होना बहुत बड़ी बात है..और ग्लैमर की दुनिया के बीचों बीच बैठे शख्स के लिए तो असंभव सी बात। शायद ये भी होता हो कि आप जब किसी को बनाते हैं तो आप न चाहते हुए भी उसके प्रति पज़ेसिव हो जाते हैं। एक अधिकार भाव पैदा होता है जो आपको अहसास कराता है कि ‘वो’ वही करेगी जो आप कहेंगे। यही अहसास शायद देव साहब को उस रात पार्टी से बाहर आकर हुआ हो...जिसके बाद उन्होंने फिर से अपना रास्ता बदल दिया। इसलिए जब वो कहते हैं कि – मैं पीछे मुड़कर नहीं देखता, तो ये सही भी लगता है। अपने वक्त में हिंदी फिल्मों में के वो पहले ऐसे स्टार रहे जो फैशन स्टेटमेंट थे। वो जो पहने हुए स्क्रीन पर दिखते थे ..वही पहना जाता था....गले में ढीला सा स्कार्फ हो या फिर चौड़े कॉलर की शर्ट्स...हीरोइन के पीछे टेढ़े होकर भागना हो या फिर टूथलेस मुस्कान....सब कुछ अपनाने का जी करता था। प्रेम में वो जैसे डूबते थे..वो आइडियल माना जाता था और मुश्किलों से निपटते दिखने के उनके तरीके..भले ही फिल्मी हों लेकिन ज़िंदगी के करीब उतरते भी दिखने लगे थे।