Monday, November 14, 2016

जो तू मिला

इस उम्र में
मिला है तू
मुझसे कि अब मेरे
चेहरे पर
मेच्योरिटी का
एक परदा आन पड़ा है
न जाने कितने
नन्हें ख्वाब,
जिनकी बेवक्त मौत
हो गई थी
टूट के चिपके पड़े हैं
उस परदे पर
मैं झाड़ती नहीं कभी
उस पर्दे को
क्योंकि मुझे आज भी
वो ख्वाब तेरे पास ले जाते हैं

--रा.त्रि



मेरी दुनिया

ये हर सुबह की तस्वीर है
मेज़ पर फैले अखबार
के पहले पन्ने पर
रखा तुम्हारी
चाय का जूठा प्याला
उस आधे खाली
प्याले में

समाई मेरी पूरी दुनिया

--रा.त्रि 

सज़ा

गुनहगार तो हो तुम मेरे
सज़ा के हक़दार भी   
बड़ी ग़लतियां की हैं
तुम्हारे इस अंदाज़ ने
तुमने एक लम्हे को
इतिहास बनने
से रोक दिया था ना
अपने क्षणिक अहंकार 
पर सवार तुम
पास से गुज़र गए
नि:शब्द
शब्दों के ग़रीब थे तुम
मेरे करीब थे
फिर भी इतिहास की ह्त्या
के अपराधी तो हो ही
कोख में मारा था ना तुमने उसे
ख़ैर ....सज़ा ये है
कि जिसे मारा था
उसे ज़िंदा करो, प्यार से पालो
और फिर उसे पा   लो
वो सिर्फ तुम्हारा था
तुम्हारा ही है
सदैव

--रा.त्रि


तुम रहस्य

मेरी हर कहानी का पात्र 
तुम से ही क्यों निकलता है
हर कविता की दूब 
तुम्हारे भीतर ही क्यों लहलहाती है
रहस्यों से भरी हुई तुम
आखिर हो क्या


--रा.त्रि

मैं अकेला

ये कोई शिकायत नहीं है
............
............
लेकिन खोज रहा हूं रोज़
खुद को
बदल रहे हैं मायने
मेरे ‘ होने ’ के
क्योंकि
देर से ही सही
गिरने लगे हैं बदसूरत चेहरों
से सुंदर मुखौटे

--रा.त्रि

जीत

ताकि... तुम जीतो 
तो मैं भी जीतूं
इसीलिए......
मैं हार जाता हूं

--रा.त्रि

तुम साथ हो सदैव

चल देंगे फिर 
एक दिन कमंडल उठा कर
उठा लेंगे डेरा-डंडा
खोल देंगे जटाएं 
बैठ जाएंगे गंगा किनारे
धूनी रमाए
लेकिन
याद रहे...
हम अकेले नहीं हैं
तुम मेरे कमंडल में हो
गंगा जल की तरह
सदैव


--रा.त्रि

कसौटी

धूल धूसरित था मैं
कड़ी मेहनत से निकाला गया
आग में तपाया गया
कई कोनों से काटा गया
उकेरी गईं
मेरे सीने पे फिर नक्काशियां
और फिर...
तय हुआ मेरा दाम
और सज गया मैं दुकानों में
.......
.......
लेकिन अब भी परखा जाता हूं रोज़
हर ग्राहक हथेली पर रखता है
और परखता है-
खरा तो हूं ना मैं ?


--रा.त्रि

तू है, तो सब है

वो जो मंदिर की घंटियों की
घनघनाहट थीं न…
बड़ी कोशिश की 
लेकिन अलग नहीं कर पाया 
उन्हें तुम्हारी आवाज़ से 
जैसे बड़े जतन से
किसी ने गूंथ रखा हो
दोनों को
किसने किसको खुद में समेटा है
नहीं मालूम
या तो जो तुम्हारी आवाज़ थी
वह मंदिर की घंटियों जैसी है
या फिर घंटियां तुम्हारी
आवाज़ में डूब कर
एकाकार हो गईं है


--रा.त्रि

पीली शर्ट वाला

मैं देखती थी तुम्हें
लेमन येलो कलर की शर्ट में
और तुम जाने क्या करते रहते थे
नीचे देखते हुए
दाहिने पैर के 
अंगूठे से ज़मीन खोदते हुए
और जैस ही तुम
सिर ऊपर उठाते थे
मैं अपनी आंखें कहीं और
घुमा लेती थी
बहाना था वो मेरा खुद से
कि ‘मैं तुम्हें नहीं देख रही थी ‘
हकीकत भी यही है कि
मैं दरअस्ल तुम्हें नहीं
.......
.......
खुद को देखती होती थी।


--रा.त्रि

और ये हो न सका

ऐसा भी हो सकता था
कि तुम और मैं 
बात करते दूर तक 
निकल जाते
तुम होते अपने सलीकों में 
सजे संभ्रांत..
और मैं होती
अपने लहज़े में बिंदास...
फिर एक सन्नाटा
चलता थोड़ी देर
हमारे साथ
फिर पता है क्या होता...
अचानक मैं लिपट जाती
तुम्हारे गले से
किसी बेल की तरह
और इससे पहले कि हतप्रभ
तुम कुछ समझ पाते
तुम्हारे अधरों पर रख देती
अपना अमृतपात्र
पता है
मैं कर सकती थी वैसा
तुम चले तो होते मेरे साथ
कुछ देर...झूठमूठ ही सही


--रा.त्रि

हंसना ज़रूर

सुनो
तुम अपनी हंसी
की पीली छटा
हर सुबह बिखेर दिया करो
मेरे पतझड़ वाले 
आंगन में
ऐसे कट जाएगी
मेरी हर दुपहरिया
मैं वो हर दुपहर
सहेज कर रखूंगा


--रा.त्रि

बंधन नाकाम


बांध दो मुझे 
तारों की कंटीली बाड़ में
फिर ऊंची दीवारें खड़ी करो
मेरे आस-पास..... 
ध्यान रहे 
सूरज की रोशनी का
एक कतरा भी
न पहुंचे मेरे माथे तक
और हां....
रोकना न भूलना
हवा के रास्ते भी
लेकिन....
थाम नहीं सकते
तुम वो तूफान
जो मेरे भीतर हरहराता है
रोज़ सुबह शाम


--रा.त्रि

मैं सूफी

हर रात
खुश होकर सोता हूं
कि अब तुम्हे जान गया हूं
पूरी तरह,
तुम्हारे कामा-फुलस्टाप के साथ
लेकिन अगली ही सुबह तुम
मुझे झूठा साबित कर देती हो
एकदम अनदेखे,
नये आयाम और...
एक और रंग के साथ
एकदम सूफी कवियों के
रहस्य वाले रंग      
हारता हूं हर सुबह
फिर भी खुश हूं
क्योंकि

मैं भी सूफी हो गया हूं

-रा.त्रि