Friday, May 23, 2008

आरुषि होने के मायने



आरुषि और हेमराज की हत्या में लसी-बंधीं कई गुत्थियां हैं... कुछ सुलझ गई हैं... कुछ सुलझ जाएंगीं... कुछ और उलझेंगी... इस मर्डर मिस्ट्री को जो जितना बेच सकता था, बेचा गया... जो इससे जितना बटोर सकता था, बटोर गया... कुछ दिनों में ये खबर पुरानी हो जाएगी... आरुषि मर्डर के अपडेट ब्रेकिंग से टिकर तक का सफर तय करेंगे और फिर धीरे धीरे गायब हो जाएंगे... यही सही वक्त है जब आप आरुषि को समझ जाएं... उसकी मौत की मिस्ट्री की फिर जांच करें... आरुषि की मौत सिर्फ एक लड़की की मौत नहीं है... हेमराज की मौत, एक नौकर की मालिक से दगाबाजी और उसके अंजाम तक ही नहीं सिमटती... इसके बाद बहुत कुछ है जो सोचा जाना बेहद ज़रूरी हो गया है... आरुषि होने के माइने सिर्फ इतने नहीं हैं... अगर सिर्फ ये होता तो इतना हंगामा न होता... इतनी हायतौबा न होती... आरुषि का मर्डर बड़ी खबर नहीं थी... आरुषि की मौत का खुलासा ज्यादा दर्दनाक है... इसलिए नहीं िक एक बाप ने अपनी लाड़ली इकलौती लड़की को मार दिया... इसलिये भी नहीं कि उसके पीछे एक बड़ी साजिश रची गई... बल्कि ज्यादा डरावने वो हालात हैं जो आरुषि जैसे हादसे की वजह बने... भगवान न करे पर ज़रा उस परिवार से... आरुषि से जुड़कर सोचिये... अपने मां बाप की इकलौती लाड़ली लड़की... नाना नीनी की इकलौती धेवती... चाचा ताऊ की इकलौती भतीजी... कितना लाड़, कितना प्यार बरसता होगा उस पर... पर कितनी अकेली हो गई होगी आरुषी हर जगह से इकलौती होकर... १४ साल की उम्र... उम्र का वो दौर जब हर चीज़ बदलती दिखती है... हार्मोन बदलते हैं... रूप रंग सब बदल जाता है... इस बदलाव में आरुषि को ज़रूरत होगी किसी अपने की... कुछ बताने के लिए... कुछ पूछने के लिए... आरुषि अपने आसपास देखती होगी... नाना... नानी... चाचा... ताऊ... और अगर वक्त मिल गया तो मम्मी, पापा... उसे उसकी उम्र का कोई नहीं दिखता होगा... अपने पास कोई नहीं दिखता होगा... वो बदलाव से गुजर रही थी... इसी बदलाव ने उसे बहका दिया... हेमराज... घर का नौकर... चुलबुली आरुषि को दिन भर परेशान देखता होगा... उसका हाल पूछता होगा... दोनों नज़दीक आ गए... उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था... कोई और हाथ नहीं था जो आरुषि को थाम ले... वो बह गई... उम्र के दौर में बदलाव की बयार में... उधर डॉक्टर तलवार... कौन नहीं चाहता अपने बच्चे को वक्त देना... इकलौती जान की जी जान से परवरिश करना... पर आज जिंदगी का जितना वजनदार लबादा हमने ओढ लिया है... उसके बाद वक्त कहां बचता है... न मां के पास... न बाप के पास... पर क्या बीती होगी उस पर जब उसने अपनी बच्ची को बहकते हुए अपनी आंखों के सामने देखा होगा... समझाने की भी कोशिश की होगी... तो अपनी गलतियंा याद आ गई होंगी... वो भी भटक गया था... और उसी बात को लेकर उसकी बीबी से नहीं बन रही थी... कितना बेबस हो गये होगा... कितना मजबूर हो गया होगा... कैसे समझाये... अपना गिरेबां बार बार कोसता होगा... कोई रास्ता नहीं दिखा... कुछ नहीं सूझा... और अपनी फूल सी बच्ची का कत्ल कर बैठा... न डॉक्टर तलवार माफी के काबिल है और न बाकी वो सभी जो इस मिस्ट्री से जुड़े हैं... पर क्या सिर्फ आरुषि की मिस्ट्री सुलझा भर लेने से काम चल जाएगा... क्या ये दोहरी मौत और एक हंसते खेलते परिवार की बर्बादी ये सोचने के लिए काफी नहीं है िक हम आप कितना वक्त दे पा रहे हैं अपने लाड़लों को... शायद यही सही वक्त है... आज आरुषि का जन्मदिन है और यही उसके लिए सबसे बढ़िया तोहफा होगा...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

आरूषि की चिट्ठी

डियर पापा
दुनियावी रस्म तो नहीं है कि ये खत आपको मिले...क्योंकि अब तो मैं उस देहरी पर हूं ही नहीं....जहां रिश्ते अब किसी दूसरे जामे में देखे जाते हैं। लेकिन मैं जानती हूं मैं जो लिख रही हूं वो आपके जेहन में है....सवाल कई हैं पापा...कितने पूछूं...कितने छोड़ दूं....कहां से शुरू करूं.....वहां से जब आप मुझे अस्पताल से रूई के फाहों में सहेज कर लाए थे....या वहां से जब अपने कांधे पर लेकर सीढ़ियां उतरे ......पापा....आपके पास इतना भी वक्त नहीं रहा कि कभी मेरा स्कूल बैग चेक कर लिया होता...तो पापा मैं क्या कर रही हूं , कैसे कर रही हूं...इससे आपको भले ही कोई मतलब न हो..मुझे इससे था कि आप क्या कर रहे हैं.....सोचना पापा...जेल की उस अंधेरी कोठरी के एक कोने में बैठ कर ....कि कहां चूक हो गई हमसे.....और मां....तुम भी सोचना कि अभी तक चुप क्यों हो...तुम

तुम्हारी
बेटू

Friday, May 9, 2008

तुम्हारे लिए


भीगी आंखों से पढ़
उस ख़त की एक एक इबारत
जल उठा एक छोटा सा
दीपक
मेरे एकदम भीतर
वेदों की पवित्र रिचाओं
सी तुम प्रकट हुईं और गर्म होठों
से छू लिया मेरा माथा

Wednesday, May 7, 2008

गंगा जो इक नदी थी.....

चौंकिए मत, ये तस्वीर जो आप देख रहे हैं...जोधपुर या बाड़मेर की नहीं है। इलाहाबाद का रसूलाबाद घाट है जहां से होकर नदी कुछ अरसा पहले तक बहती थी। आज गंगा की जगह अगर कुछ दिखता है तो सिर्फ रेत के ढूहे और ऊंटों के लंबे कारवां। यहां से कुछ दूर पर ही वो संगम है जिसका पुराणों में उल्लेख है। कहते हैं कि अब सिर्फ गंगा और यमुना हैं...सरस्वती विलुप्तप्राय है। सवाल है - कहीं गंगा का भी यही हश्र न हो ? ये फोटो इलाहाबाद से स्कंद ने भेजी है जो पर्यावरण को प्रति उतने ही चिंतित हैं जितना अपने बेटों के भविष्य को लेकर।

Tuesday, May 6, 2008

आरक्षण का अफ़साना

लोकसभा और राज्यसभा की गद्देदार सीटों पर बैठने वाले मर्दों को 20 साल बाद अब बुरा लग रहा है। 20 साल पहले जब मंडल कमीशन के लिए इन्हीं लोगों ने ' अलख ' जगाई थी..तब सोचा नहीं था कि एक दिन उस आंच में खुद भी झुलसना पड़ सकता है। अब मुद्दा संसद और विधानसभा में औरतों को आरक्षण देने का है। 12 साल में चौथी बार पेश हुआ तो बिल की ऐसी की तैसी कर दी गई। बाहुबलियों की एक पार्टी ने बिल को कई टुकड़ों में बांट कर उन्हें हवा में ऐसे उछाल दिया..मानों कह रहे हों कि ...जोड़ के दिखाओ तो जानें.....। ये वही लोग हैं जिन्होंने दो दशक पहले नौकरियों में आरक्षण की मांग कर राजनीति में अपनी पैठ बनाई थी...इनमें वो चेहरे भी हैं जो मंडल की आग में बच्चों को झुलसते देखते रहे...मुंह पर ताला लगा लिया और बाट जोहने लगे राज्यसभा सीटों के ईनाम की। आज वही लोग लड़ रहे हैं....कहते हैं ...जी, महिलाओं के लिए संसद और विधानसभा में आरक्षण नहीं होना चाहिए। लेकिन क्यों...नौकरियों में आरक्षण ज़रूरी है लेकिन संसद में नहीं ? क्षेत्रीय पार्टियां ज्यादा परेशान हैं। उनका शक इस बात पर है कि अगर मौजूदा विधेयक पास हो गया तो उनको पास जीत कर आने लायक महिलाएं नहीं होंगी। इसलिए आरक्षण के भीतर एक आरक्षण हो और 33 फीसदी में भी उन जातियों को आरक्षण दिया जाए जो पिछड़ी हैं। सवाल सिर्फ यही है कि आरक्षण होते हुए भी नौकरियों में सही उम्मीदवार क्यों नहीं मिलते....या आरक्षण समर्थक पार्टियों को डर क्यों है कि चुनाव जीतने लायक उम्मीदवार उनके पास नहीं...जवाब है क्योंकि उसके लिए कभी कोई कोशिश की ही नहीं गई। 61 साल हो गए आज़ादी को...प्राथमिक शिक्षा पर न जाने कितने पैसे खर्त हो गए...लेकिन हल जोत रहे किसान के बच्चे को क्लास तक लाने की आज तक कोशिश की ही नहीं गई...क्योंकि कोशिश करते ...तो दिल्ली में मजे कैसे लूटते....इसलिए आसान है कि नौकरियों में ही आरक्षण दे दो....वो तो संसद के एयरकंडीशंड हॉल में ही हो जाएगा...उसके लिए गांवों और कस्बों के धक्के खाने की ज़रूरत क्या है भला। शायद इसीलिए पिछड़े , 61 साल बाद भी पिछड़े हैं.....और अफसर वो बन रहे हैं जिनके मां बाप अफसर थे। नेताओं को नतीजे जल्दी चाहिए क्योंकि वो चुनावों में काम आते हैं.....उनके लिए समाज का ढांचा बदलना भी किसी सड़क या पुल के बनवाने जैसा है...जिसका बखान कर उन्हें अगला चुनाव जीतना होता है। लेकिन चूंकि इस तरह समाज नहीं बदलेगा....इसलिए आरक्षण की व्यवस्था भी चलती रहेगी..और चलती रहेगी दुकानें भी।