Thursday, July 24, 2008

ग़ालिब और इज़ारबंद

निदा फाजली
दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज के सामने बनी एक ख़ूबसूरत इमारत है, जिसे ‘ऐवाने-ग़ालिब’ या ग़ालिब इंस्टीट्यूट कहा जाता है, ऐसी ही मामूली चीज़ों से ग़ालिब के दौर को दोहराती है. यह इमारत मुग़ल इमारत-साज़ी का एक नमूना है. आख़िरी मुग़ल सम्राट के समय के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के समय को, उस समय के लिबासों, बर्तनों, टोपियों, पानदानों, जूतों और छोटे-बड़े ज़ेवरों से दिखाकर एक ऐसा इतिहास रचने को कोशिश की गई है. यह इतिहास उस इतिहास से मुख़्तलिफ़ है जो हमें स्कूल या कॉलेजों में पढ़ाया जाता है जिसमें तलवारों, बंदूकों और तोपों को हिंदू-मुस्लिम नाम देकर आदमी को आदमी से लड़ाया जाता है और फिर अपना अपना वोट बैंक बनाया जाता है.

इस 'ग़ालिब म्यूज़ियम' में और बहुत सी चीज़ों के साथ किसी हस्तकार के हाथ का बना हुआ एक इज़ारबंद भी है. ग़ालिब दिल्ली के बल्लीमारान इलाक़े में रहा करते थे. ग़ालिब के उस लंबे, रेशमी इज़ारबंद ने मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही व्यवहार किया. ग़ालिब म्यूज़ियम में पड़ा हुआ मैं अचानक 2006 से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे. इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में 1857 का खूनी रंग भर रहे थे.
ग़ालिब का शेर है -
हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे

बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ आपना
हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है. ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, “तुमका नाम क्या होता?”

ग़ालिब - “मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश.”

अंग्रेज़ -“तुम लाल किला में जाता होता था?”

ग़ालिब-“जाता था मगर-जब बुलाया जाता था.”

अंग्रेज़-“क्यों जाता होता था?”

ग़ालिब- “अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने.”

अंग्रेज़- “यू मीन तुम पोएट होता है?”

ग़ालिब- “होता नहीं, हूँ भी.”

अंग्रेज़- “तुम का रिलीजन कौन सा होता है?”

ग़ालिब- “आधा मुसलमान.”

अंग्रेज़- “व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है?”

ग़ालिब- “जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता.”


और ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया. मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं. ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे. सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे.

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है

वो हरेक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता
इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ पाजामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी. औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे. हिंदुस्तानी में इसे कमरबंद कहते हैं. यह इज़ारबंद मशीन के बजाय हाथों से बनाए जाते थे.
ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे.
पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे. पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था.
ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे. इनमें कुछ यूँ हैं, ‘इज़ारबंद की ढीली’ उस स्त्री के लिए इस्तेमाल होता है जो चालचलन में अच्छी न हो. मैंने इस मुहावरे को छंदबद्ध किया है.


जफ़ा है ख़ून में शामिल तो वो करेगी ज़फा

इज़ारबंद की ढीली से क्या उमीदे वफ़ा

‘इज़ारबंद की सच्ची’ से मुराद वह औरत है जो नेक हो ‘वफ़ादार हो’. इस मुहावरे का शेर इस तरह है,

अपनी तो यह दुआ है यूँ दिल की कली खिले जो

हो इज़ारबंद की सच्ची, वही मिले

इज़ारबंदी रिश्ते के मानी होते हैं, ससुराली रिश्ता. पत्नी के मायके की तरफ़ का रिश्ता.

घरों में दूरियाँ पैदा जनाब मत कीजे

इज़ारबंदी ये रिश्ता ख़राब मत कीजे

इज़ार से बाहर होने का अर्थ होता है ग़ुस्से में होश खोना.


पुरानी दोस्ती ऐसे न खोइए साहब

इज़ारबंद से बाहर न होइए साहब

इज़ारबंद में गिरह लगाने का मतलब होता है किसी बात को याद करने का अमल.

निकल के ग़ैब से अश्आर जब भी आते थे

इज़ारबंद में ‘ग़ालिब’ गिरह लगाते थे

ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे. कबीर और नज़ीर को पंडितों तथा मौलवियों ने कभी साहित्यकार नहीं माना. कबीर अज्ञानी थे और नज़ीर नादान थे. इसलिए कि वो परंपरागत नहीं थे. अनुभव की आँच में तपाकर शब्दों को कविता बनाते थे. नज़ीर मेले ठेलों में घूमते थे. जीवन के हर रूप को देखकर झूमते थे. इज़ारबंद पर उनकी कविता उनकी भाषा का प्रमाण है.
उनकी नज़्म के कुछ शेर -

छोटा बड़ा, न कम न मझौला इज़ारबंद

है उस परी का सबसे अमोला इज़ारबंद

गोटा किनारी बादल-ओ- मुक़्क़ैश के सिवा

थे चार तोला मोती जो तोला इज़ारबंद
धोखे में हाथ लग गया मेरा नज़ीर तो

लेडी ये बोली जा, मेरा धो ला इज़ारबंद


--बीबीसी से साभार

Monday, July 14, 2008

ज़ाहिल मेरे बाने

भवानी प्रसाद मिश्र
---------------------


मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि चीर कर धरती धान उगाता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूं
आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर
आप सभ्य हैं क्योंकि धान से भरी आपकी कोठी
आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ पाते हैं पोथी
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं
आप सभ्य हैं क्योंकि जबड़े खून सने हैं
आप बड़े चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे
आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढंग हमारे
मैं उतारना नहीं चाहता जाहिल अपने बाने
धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटाए हूं याने!
भवानीप्रसाद मिश्र

कभी धूप कभी छाँव के दिन

जावेद अख़्तर
--------------

रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है....
मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढ़ियों पर एक कमज़ोर से बल्ब की कमज़ोर सी रौशनी में बैठा हूँ। पास ही ज़मीन पर इस आँधी-तूफ़ान से बेख़बर तीन आदमी सो रहे हैं।
दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है.... बारिश लगता है अब कभी नहीं रुकेगी..... दूर तक ख़ाली अँधेरी सड़कों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है.... ख़ामोश बिल्डिंगों की रौशनियाँ कब की बुझ चुकी हैं....
लोग अपने-अपने घरों में सो रहे होंगे.... इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है.... बंबई कितना बड़ा शहर है और मैं कितना छोटा हूँ, जैसे कुछ नहीं हूँ.... आदमी कितनी भी हिम्मत रखे कभी-कभी बहुत डर लगता है........मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो (जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूँ.... कंपाउंड में कहीं भी सो जाता हूँ. ....कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरीडोर में..... यहाँ मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोज़गार इसी तरह रहते हैं....
उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है..... वो रोज़ एक नई तरकीब सोचता है कि आज खाना कहाँ से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है..... जगदीश ने बुरे हालात में ज़िंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है.....मेरी जान-पहचान अँधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है. ....इसलिए किताबों की कोई कमी नहीं है.... रात-रात भर कम्पाउंड में जहाँ भी थोड़ी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढ़ता रहता हूँ....दोस्त मज़ाक करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज़्यादा पढ़ता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाऊँगा... आजकल एक कमरे में सोने का मौक़ा मिल गया है....स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ़ दीवारों में लगी बड़ी-बड़ी अलमारियाँ हैं जिनमें फ़िल्म पाकीज़ा के दर्जनों कॉस्ट्यूम रखे हैं.....मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं, इसलिए इन दिनों फ़िल्म की शूटिंग बंद है.... एक दिन मैं एक अल्मारी का ख़ाना ख़ोलता हूँ, इसमें फ़िल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड भी पड़े हैं....मैं उन्हें झाड़-पोंछकर अलग रख देता हूँ.... मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी फ़िल्म एवार्ड को छुआ है....रोज़ रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खड़ा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्रॉफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूँजते हुए हॉल में बैठे हुए लोगों की तरफ़ देखकर मैं किस तरह मुस्कुराऊँगा और कैसे हाथ हिलाऊँगा.....इसके पहले कि इस बारे में कोई फ़ैसला कर सकूँ स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते।

यह वह दौर था जब कामयाबी मिलने लगी थी। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतज़ाम नहीं होता हम लोग महाकाली की गुफाओं में रहेंगे(महाकाली अँधेरी से आगे एक इलाक़ा है जहाँ अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है। उस ज़माने में वहाँ सिर्फ़ एक सड़क थी, जंगल था और छोटी-छोटी पहाड़ियाँ जिनमें बौद्ध-भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफाएँ थी, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरस-गाँजा पीने वाले साधु पड़े रहते थे....महाकाली की गुफाओं में मच्छर इतने बड़े हैं कि उन्हें काटने की ज़रूरत नहीं, आपके तन पर सिर्फ़ बैठ जाएँ तो आँख खुल जाती हैं...एक ही रात में ये बात समझ में आ गई कि वहाँ चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता... तीन दिन जैसे-तैसे गुज़ारता हूँ....बांदरा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है..... मैं बांदरा जा रहा हूँ।
जगदीश कहता है दो-एक रोज़ में वो भी कहीं चला जाएगा (ये जगदीश से मेरी आख़िरी मुलाकात थी)।
आनेवाले बरसों में ज़िंदगी मुझे कहाँ ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफ़ाओं में चरस और कच्ची दारू पी-पीकर मर गया और वहाँ रहने वाले साधुओं और आसपास के झोंपड़-पट्टी वालों ने चंदा करके उनका क्रिया-कर्म कर दिया-क़िस्सा खतम। मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की ख़बर भी बाद में मिली। मैं अकसर सोचता हूँ कि मुझमें कौन से लाल टंकें हैं और जगदीश में ऐसी क्या ख़राबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफ़ाक लगता है.... हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं....
मैं बांदरा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूँ वो पेशेवर जुआरी है. ..वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं.... मुझे भी सिखा देते हैं...कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुज़ारा होता है फिर वो लोग बंबई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं-अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा....एक मशहूर और कामयाब राइटर मुझे बुलाके ऑफ़र देते हैं कि अगर मैं उनके डॉयलॉग लिख दिया करूँ (जिन पर ज़ाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रुपए महीना देंगे....सोचता हूँ ये छह सौ रुपए इस वक़्त मेरे लिए छह करोड़ के बराबर हैं, ये नौकरी कर लूँ, फिर सोचता हूँ कि नौकरी कर ली तो कभी छोड़ने की हिम्मत नहीं होगी, ज़िंदगी-भर यही करता रह जाऊँगा, फिर सोचता हूँ अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूँ देखा जाएगा....तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूँ.... दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुज़रते हैं.... बंबई में पाँच बरस होने को आए, रोटी एक चाँद है हालात बादल, चाँद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है.....ये पाँच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सर नहीं झुका सके..... मैं नाउम्मीद नहीं हूँ... मुझे यक़ीन है, पूरा यक़ीन है, कुछ होगा, कुछ ज़रूर होगा, मैं यूँ ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ-और आख़िर नवंबर, 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फ़िल्मवालों की ज़बान में सही "ब्रेक"कहा जाता है...कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग़ है... अचानक देखता हूँ कि दुनिया ख़ूबसूरत है और लोग मेहरबान.... साल-डेढ़ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है. .....
सीता और गीता के सेट पर हनी ईरानी मिलीं और फिर शादी हो गई...हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूँ-अपना पहला घर, अपनी पहली कार.... तमन्नाएँ पूरी होने के दिन आ गए हैं मगर ज़िंदगी में एक तनहाई तो अब भी है.....सीता और गीता के सैट पर मेरी मुलाकात हनी ईरानी से होती है..... वो एक खुले दिल की, खरी ज़बान की मगर बहुत हँसमुख स्वभाव की लड़की है..... मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है...मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं (कुछ जख़्मों को भरना अलादीन के चिराग़ के देव के बस की बात नहीं-ये काम सिर्फ वक़्त ही कर सकता है).... दो साल में एक बेटी और एक बेटा, ज़ोया और फ़रहान होते हैं....
अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपर हिट फ़िल्में, पुरस्कार, तारीफ़ें, अख़बारों और मैगज़ीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियाँ, दुनिया के सफ़र, चमकीले दिन, जगमगाती रातें-ज़िंदगी एक टेक्नीकलर ख़्वाब है, मगर हर ख़्वाब की तरह यह ख़्वाब भी टूटता है.....पहली बार एक फ़िल्म की नाकामी-(फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी मगर कामयाबी की वो खुशी और खुशी की वो मासूमियत जाती रही)....

(फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर का यह आत्मकथ्य उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से लिया गया है)बीबीसी से साभार

Friday, July 11, 2008

शेर लिख कर सुलह की एक बाग़ी बेटे ने






जावेद अख़्तर



-------------



18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है(मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उसपर लिखा था-"जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे." (उन्होंने ठीक लिखा था).
अब तक तो मैं अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हू। मैं अपने-आपको और फिर अपने चारो तरफ़, नई नज़रों से देखता हूँ कि क्या बस यही चाहिए था मुझे ज़िंदगी से। इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीज़ें जो कल तक मुझे खुशी देती थीं झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं। अब मेरा दिल उन बातों में ज़्यादा लगता है जिनसे दुनिया की ज़बान में कहा जाए तो, कोई फ़ायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। लड़कपन से जानता हूँ कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूँ मगर आज तक की नहीं है। ये मेरी नाराज़गी और बग़ावत का एक प्रतीक है। 1979 में पहली बार शेर कहता हूँ और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है। इसी दौरान मेरी मुलाक़ात शबाना से होती है। कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ़ लौट रही थी। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था। मैं खुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है। जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी। "मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत हैं"- ये पंक्ति अगर बरसों पहले मज़ाज़ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता।
कोई हैरत नहीं कि हम क़रीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। फ़िल्मी दुनिया में जो मेरी पार्टनरशिप थी टूट जाती है। मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होनेवाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं। 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं. (हनी से मेरी शादी ज़रूर टूट गई मगर तलाक भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। और अगर माँ-बाप के अलग होने से बच्चों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ़ बहुत ज़्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फ़िल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों को इतनी इज़्ज़त करता हूँ जितनी इज़्ज़त मेरे दिल में हनी के लिए है.)
मैंने एक क़दम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी ज़िंदगी "कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर" जैसी हो गई। शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ही ज़्यादा पीने लगा. ये मेरी ज़िंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूँ। इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है. बहुत मुमकिन था कि मैं यूँ ही शराब पीते-पीते मर जाता मगर एक सबेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाऊँगा। आज इतने बरसों बाद जब अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो लगता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढ़ती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।
मेरे बच्चे ज़ोया और फ़रहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला कदम रखने को हैं। उनकी चमकती हुई आँखों में आने वाले कल के हसीन ख़्वाब हैं। सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुत-सी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत ज़हीन बच्चों का बाप है । ज़िंदगी के रास्ते उसके लिए कुछ कठिन नहीं थे मगर उसने अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंज़िल पा ली है. और आज भी आगे बढ़ रहा है। मैं खुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है. जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी. "मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत हैं"- ये पंक्ति अगर बरसों पहले मज़ाज़ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता ।
आज यूँ तो ज़िंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर-रोती हुई मेरी ख़ाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढे छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहाँ फ़र्श पर बहुत सी औरतें बैठी हैं। तख़्त पर सफ़ेद कफ़न में लेटी मेरी माँ का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढ़ी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी खाला हम दोनों बच्चों को उस तख़्त के पास ले जाती हैं और कहती है, अपनी माँ को आख़िरी बार देख लो । मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूँ... जानता हूँ मौत क्या होती है।




मैं अपनी माँ के चेहरे को बहुत ग़ौर से देखता हूँ कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी ख़ाला कह रही हैं-इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करों कि तुम ज़िंदगी में कुछ करोगे । मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूँ और फिर कोई औरत मेरी माँ के चेहरे पर कफ़न ओढ़ा देती है-
ऐसा तो नहीं है कि मैंने ज़िंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख़्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूँ उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख़्याल को दी हुई बेचैनी जाती नहीं.
(फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर के काव्य संग्रह 'तरकश' से साभार )



Tuesday, July 8, 2008

एक और नज़्म

मत छेड़ो इन्हें
ख़्वाब हैं
जाग जाएंगे
तैर रही हैं हसरतें
सब पाने
कुछ न खोने की
कुछ चुराने का मज़ा
हसीन डाके,
उसको मारा
फलां को कुचला
बेशर्म हो लिए
फना हो लिए किसी पर
अब सच की दुनिया में
जीने के मौके हैं कम
चिपक जाएगा मुखौटा
आंख खुलते ही
मत छेड़ो, खेलने दो
सान लेने दो माटी इनको
© सिद्धार्थ

Friday, July 4, 2008

वीएचपी की गुंडई




हिंदू हितों की वर्ल्ड चैंपियन विश्व हिंदू परिषद ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन वापस लेने के खिलाफ गुरुवार को देश भर में बंद का आह्वान किया था। बंद के आह्वान में कोई गलती नहीं है अगर वह जबरन न कराया जाए। लेकिन वीएचपी जैसे मिलिटंट संगठन से आप ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं ! नतीज़ा मध्य प्रदेश आग में सुलगा , चार लोगों की जानें गईं और कई स्थानों पर कर्फ्यू लगाना पड़ा।
इस दौरान सबसे घिनौनी घटना सतना में हुई जहां बंद समर्थकों ने एक व्यापारी की पिटाई कर दी क्योंकि वह अपनी दुकान बंद नही कर रहा था। परिवार वालों के सामने अपनी पिटाई का सदमा बर्दाश्त न कर पाने के चलते 28 साल के उस व्यापारी ने खुद पर किरासन छिड़क दिया। खुशकिस्मती से वह अभी ज़िंदा है। लेकिन यह घटना बताती है कि वीएचपी और बजरंग दल के लोगों और कार्यकर्ताओं का असली चेहरा क्या है !
हर उग्रवादी संगठन की तरह इसमें भी वही और वैसे ही लोग हैं जो तर्क और बहस से दूर भागते हैं। जो अपने मत के आगे बाकी सारे मतों और विश्वासों को छोटा और हेय मानते हैं। और जो उनके विचारों से सहमत न हो , उसे वे हथियारों या ताकत के बल पर दबाना चाहते हैं।
मैं सही कह रहा हूं या गलत , यह जानने के लिए आपको टीवी पर बंद समर्थकों के जो शॉट्स आ रहे थे , उन्हें अपनी आंखों के सामने लाना है। इंदौर हो या जम्मू , हर जगह डंडा और केसरिया झंडा हाथ में लेकर ये इस तरह घूम रहे थे मानो यह जंगल राज है और यहां उन्हें सबकुछ करने की छूट है। उनकी आंखों में आप हिंसा और घृणा की आंच देख सकते हैं। ये आंखें किसी हिंस्र पशु की आंखों से कितनी मैच करती हैं जो अपने शिकार पर हमला करने की ताक में है।
मामला सिर्फ वीएचपी का नहीं है। जो भी समुदाय या भीड़ सिर्फ अपने एजेंडे को लेकर चल रही है और उस एजेंडे में बाकी सारे समुदाय दुश्मन माने जाते हैं , उनके कार्यकर्ताओं की आंखों में आपको ऐसी ही आग दिखेगी। वे चाहे श्रीनगर में बम फेंकते आतंकवादी हों , नंदीग्राम में कत्लेआम करते मार्क्सवादी या देश को दहशत की आग में झोंकते मोदीवादी। आतंकवादियों और इनमें बस इतना फर्क है कि वे छुपकर वार करते हैं , ये सरेआम। ऐसे में कई बार यह तय कर पाना कठिन हो जाता है कि इनमें से ज़्यादा खतरनाक कौन है।
नीरेंद्र नागर

Thursday, July 3, 2008

कहने को ये एक ख़बर है.........

बारह साल के एक बच्चे को टीटीई ने चलती रेलगाड़ी से बाहर फेंक दिया। वजह थी पचास रुपये। इस कारण बच्चे को अपना दाहिना पैर और दाहिना हाथ गंवाना पड़ा। यह जानकारी सरकारी रेलवे पुलिस के सूत्रों ने दी। शंकर सिंह रेलगाड़ियों के डिब्बों की सफाई कर अपना गुजारा चलाता है। सूत्रों ने बताया कि बुधवार को राउरकेला रेलवे स्टेशन पर वह एक ट्रेन में चढ़ा। उसे एक सीट के नीचे से 50 रुपये का नोट मिला। टीटीई ने शंकर से 50 रुपये का नोट मांगा। शंकर ने इनकार कर दिया। इसे लेकर शंकर और टीटीई में झगड़ा हो गया और तब तक गाड़ी चलने लगी। सूत्रों ने बताया कि गुस्साए टीटीई ने उसे थप्पड़ जड़ा और खींचकर डिब्बे के दरवाज़े तक ले गया। उसके बाद टीटीई ने शंकर को चलती रेलगाड़ी से बाहर फेंक दिया। शंकर के एक दोस्त ने बाद में एफआईआर दर्ज कराई। सू़त्रों ने बताया कि शंकर को इस्पात जनरल अस्पताल में दाखिल कराया गया है जहां उसकी स्थिति नाज़ुक बताई जा रही है। घटना के तुरंत बाद सामाजिक संगठन जन कल्याण समिति ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और टीटीई की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की। राउरकेला के अडिशनल डीएम ने आश्वासन दिया कि लड़के का इलाज जिला रेडक्रॉस के फंड से कराया जाएगा। जीआरपी ने इस संबंध में मामला दर्ज कर लिया है।

Wednesday, July 2, 2008

एक नज़्म

गिरे हुए को
उठाने की
भटके को
आईना दिखाने की
फुरसत कहां है

'बिक'नी हसीना की
एक्सक्लूज़िव छींकें
चौके छक्के
चुटकुले
सपने-झूठ
जो बिकता है
वो दिखाते हैं
हमें मत सिखाओ
हम जानते हैं
कौन सी ख़बर है गर्म

सिद्धार्थ त्रिपाठी
युवा कवि


© सिद्धार्थ

नाम गुम जाएगा,चेहरा ये बदल जाएगा

इस निजी डायरी के ज़रिए मैं आपको अपने अतीत के उस सफ़र का हमराही बनाना चाहता हूँ जो सफ़र पाकिस्तान की जेल में बीता। आगे बढ़ने से पहले मैं 20-25 वर्ष के 'जवान' कश्मीर सिंह के बारे में थोड़ा बताना चाहूँगा-वो कश्मीर सिंह जिसकी यादें केवल एक फ़ोटोफ़्रेम में जड़ी तस्वीर में क़ैद होकर रह गई हैं। घर की मेज़ पर रखी इस तस्वीर में जड़ा जवान कश्मीर सिंह मानो टकटकी लगाए बुढ़ाए, झुर्रियों वाले नए कश्मीर सिंह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो। ग़नीमत है कि घर वालों ने इस तस्वीर को संभाल कर रखा हुआ है।
पंजाब के होशियारपुर ज़िले का एक छोटा सा गाँव था नंगलचोरां, वहीं 1941 में मेरा जन्म हुआ।
‘गाँव था’- ये इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मेरे पीछे से इस। गाँव का नाम नंगलचोरां से नंगलखिलाड़ियाँ हो गया है। अजीब विसंगति है -35 सालों में मेरा नाम बदल गया, बाहरी दुनिया भी बदली, कई लोगों को तो मेरा चेहरा-मोहरा पहचानने में भी दिक्कत होती है। इन तमाम बदलावों के बीच जेल से रिहा होने के बाद सोचा था कि अपने गाँव जाऊँगा, वापस आकर पता चला कि मेरे गाँव का नाम भी बदल गया है। हर चीज़, हर बात में बदलाव जैसे ये एहसास दिला रहें हो कि...ख़ैर छोड़िए आप इसे नंगलखिलाड़ियाँ कहें या नंगलचोरां, गाँव की मिट्टी तो वही है. बचपन-जवानी मेरी यहीं बीती. पढ़ाई-लिखाई तो मैने ज़्यादा की नहीं। और सच बात तो ये है कि जो कक्षाएँ पास की भी, नकल मार कर ही पास की हैं.
पुराने कश्मीर सिंह की यादें केवल एक फ़ोटोफ़्रेम में जड़ी तस्वीर में क़ैद होकर रह गई हैं। घर की मेज़ पर रखी इस तस्वीर में जड़ा जवान कश्मीर सिंह मानो टकटकी लगाए बुढ़ाए, झुर्रियों वाले नए कश्मीर सिंह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो। किसी भी दूसरे गबरू-जवान की तरह मेरा भी ब्याह हुआ। ये 1964 की बात होगी। मेरी शादी परमजीत कौर से हुई। अच्छा ख़ासा परिवार था मेरा। तीन बच्चे थे- दो बेटे और एक बेटी।
मैं सन 1967 में पुलिस में भर्ती हुआ लेकिन पुलिस की नौकरी मैने ज़्यादा देर नहीं की और जल्द ही छोड़ दी-1967 से लेकर 1971 तक। नौकरी छोड़ने के कई कारण रहे.... समझिए कि इंसान से नौकरी में कई ग़लतियाँ हो जाती हैं और फिर कुछ पारिवारिक समस्या भी थी। नौकरी छोड़ने के बाद मैं साल-छह महीने घर पर ही रहा। उसके बाद 1973 में पाकिस्तान गया। यहीँ से शुरू हुआ वो सफ़र जिसने ज़िंदगी का रुख़ बदल डाला।लोगों के ज़हन में सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि मैं क्यों और कैसे पाकिस्तान गया. यहाँ मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा कि बस ‘पिकनिक’ मना रहा था और पाकिस्तानी सीमा में चला गया...या कहूँ कि पेट की ख़ातिर गया था और फँस गया जाकर. ...उसके बाद तो जैसे ज़िंदगी ही बदल गई. ..पाकिस्तानी सीमा पर वहाँ की फ़ौज ने पकड़ लिया. .....शुरू में मैने अपना नाम बताया मोहम्मद रफ़ीक़ और पिता का नाम गुलाम मोहम्मद. .....और ये नाम सोचे समझे थे.
पकड़े जाने के बाद ज़ाहिर है पूछताछ शुरू हो गई... पूछताछ का सिलसिला चलता रहा लेकिन मेरी ज़ुबान पर भी ताला लगा रहा. .....सबके मन में सवाल आता है कि मुझे पाकिस्तान की जेल में कैसे रखा गया होगा- परेशान किया होगा या मारा पीटा होगा. ...ये बड़ी स्वाभाविक सी बात है कि जब कोई इंसान पहले-पहले पुलिस के हत्थे चढ़ता है तो अच्छा सुलूक तो नहीं होता. ....यहाँ भारत में भी अगर पुलिस किसी आते-जाते को ही पकड़ ले, तो आमतौर पर उससे अच्छा बर्ताव नहीं करती, फिर मैं तो ग़ैर मुल्क का क़ैदी था. ....जेल में अकेले रखा गया- एकदम अकेले,किसी से मिलने की इजाज़त नहीं थी. समझिए कि बस आख़िरी को दो-चार महीनों में मैं लोगों के साथ घुला-मिला. ....पाकिस्तान आने से पहले मैं भारत में एक हँसता-खेलता परिवार छोड़कर आया था. बड़ा बेटा आठ साल का था, छोटा बेटा चार साल का और मेरी बच्ची तो बस डेढ़ साल की थी. ..जेल पहुँचने के बाद शुरू में मुझे रत्ती भर भी जानकरी नहीं थी कि परिवार वाले कैसे हैं और न ही उन्हें मेरे बारे में कुछ पता था. ......इस बीच मुझे नहीं लगा कि भारत सरकार ने मुझे छुड़ाने की कोई कोशिश की होगी या बातचीत की होगी.
1973 में पकड़े जाने के बाद सज़ा के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा मुझे. जल्द ही सज़ा-ए-मौत सुना दी गई.
28 मार्च 1978 को फाँसी लगना तय हुआ. फाँसी लगने में दो घंटे का समय बचा था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था...किस्मत के इस खेल के आगे की कहानी अगली बार जारी रहेगी.(
(बीबीसी से साभार)