Monday, August 24, 2009

एंकर का कोट

नमस्कार, मैं हूं राहुल शर्मा... और आप देख रहे हैं टेलीविजन इंडिया... इस वक्त की बड़ी खबर आ रही है आगरा के ताज महोत्सव से जहां भीषण आग लग गई है... आग में शिल्पियों के दो सौ से ज्यादा पांडाल जलकर खाक हो गए हैं... मौके पर दमकल की गाड़ियां पहुंच चुकी हैं... इस बीच खबर आ रही है कि कुछ लोग आग में फंसे हो सकते हैं... हमारे संवाददाता प्रशान्त कौशिक फोन लाईन पर हमसे जुड़ चुके हैं... प्रशांत क्या अपटेड है...?

असाइन्मेंट हैड आलोक श्रीवास्तव के चेहरे पर मुस्कान दौड़ रही थी... आउटपुट हैड शशिरंजन झा खुद पीसीआर संभाले हुए थे... ओवी पर शॉट आ गए हैं... जल्दी काटो... राहुल लाइव टॉस करो... हम सबसे पहले हादसे की सीधी तस्वीरें दिखा रहे हैं... खबर को बेचो... याद रखो खबर सबसे पहले हमने ब्रेक की है... शशिरंजन जी ने एंकर का टॉकबैक ऑन करके तमाम इंस्ट्रेक्शन एक सांस में दे मारे...

... और आपको सीधे लिए चलते हैं आगरा के ताजमहोत्सव में, जहां इस वक्त भयंकर आग लगी हुई है... इस वक्त आप अपने टेलीविजन स्क्रिन पर हादसे की पहली तस्वीरें देख रहे हैं... हम अपने दर्शकों को बता दें कि सबसे पहले ये खबर आप टेलीविजन इंडिया पर देख रहे हैं... और जैसा कि अभी हमारे संवाददाता प्रशान्त कौशिक बता रहे थे... आग में से चार शव निकाले जा चुके हैं... चारों शव इतनी बुरी तरह झुलस गए हैं कि उनकी शिनाख्त नहीं हो पा रही है... आग में शिल्पियों का तकरीबन एक करोड़ रुपये का माल जलकर खाक हो गया है... इस वक्त टेलीविजन स्क्रिन पर आप ताजमहोत्सव की आग की लाईव तस्वीरें देख रहे हैं... और हमारे साथ फोन लाइन पर जुड़ चुके हैं आगरा के एसएसपी जीपी निगम... निगम साहब, कैसे लगी ये आग? इतने बड़े जलसे के लिए पर्याप्त सुरक्षा इंतजाम क्यों नहीं किये गए थे... ?

एंकर की आवाज में अचानक जोश आ गया था... आउटपुट हैड बार बार टॉक बैक ऑन करके उसे याद दिला रहे थे कि ये तस्वीरें सिर्फ उन्हीं के चैनल पर दिखाई जा रही हैं... और राहुल हर बार और जोर से ये बात दर्शकों के सामने दोहरा रहा था...

प्राइम टाइम खत्म हुआ... भई वाह... छा गए... खूब बिक गई खबर... मार्केट मार लिया आज तो... एक्सक्लूसिव का टैग लगा लगा कर चलाई खबर... वैल डन राहुल... वैल डन... राहुल की जान में अब जान पड़ी... आउटपुट हैड औऱ एडिटर इन चीफ ने उसकी पीठ ठोंकी थी...

अरे सर... आगरा तो मेरा घर है... उस शहर की हर बारीकी जानता हूं मैं... आपने देखा कि कैसे लपेटा एसएसपी को सुरक्षा इंतेजामों के मुद्दे पर... एंकर ने टाई ढीली की... मेकअप रिमूव किया... आज की मजदूरी पूरी हो गई थी...

सर, शायद आपका फोन आ रहा है... मेकअप आर्टिस्ट ने राहुल को इशारा किया... राहुल हमेशा की तरह आज भी शो के बाद फोन का साइलेंट मोड डीएक्टीवेट करना भूल गया था... उधर पिताजी की भर्राई आवाज थी... अनर्थ हो गया बेटा... अंजली बुरी तरह से झुलस गई है... एट्टी पर्सेंट बर्न थी, जब हॉस्पीटल ले गए...

फोन के उस पार से जैसे शहर भर के रोने की आवाज आ रही थी... एंकर के कंधे से कोट उतर चुका था... एक आम आदमी अपनी बहन के लिए रो रहा था...

देवेश वशिष्ठ ‘खबरी’
9953717705

Saturday, August 22, 2009

दिल में कारगिल

कारगिल विजय की दसवीं सालगिरह पर ख़ास कार्यक्रम के दौरान राकेश जी ने अपने कारगिल रिपोर्टिंग के अनुभव बांटे उस वक़्त टीवी जर्नलिज़म का वो बूम नहीं था जो आज देखने को मिलता है। इसके बावजूद कुछ चुनिंदा चैनल थे जिन्होंने अपनी टीमें कारगिल युध्द को कवर करने के लिए भेजी थी, राकेश जी उन ख़ुशनसीब पत्रकारों में से एक थे। कार्यक्रम के दौरान उनकी तस्वीरें भी दिखाई गई जिनमें बोफ़ोर्स तोप हो, अलग-अलग बटालियन्स के जवान हो या फिर धमाकों की आवाज़ बंद होने के बाद ख़ामोश, ख़ूबसूरत वादियां हो, इन सभी को देखकर वहां मौजूद पत्रकारों के अनुभव का सिर्फ़ अंदाज़ा लगाया जा सकता है उसे महसूस करना मुश्किल है। लेकिन सिर्फ़ मज़ा ही नहीं था ख़तरा भी था, राकेश जी ने ये अनुभव भी बांटा की किस तरह एक मिसाईल वहां मौजूद पत्रकारों के उपर से होकर गुज़री और कुछ दूरी पर एक ट्रक पर जाकर गिरी। यहां से लौटते वक़्त बुरी तरह से ध्वस्त हुए इस ट्रक के अवशेष भी इन लोगों ने देखे।

यहां मौजूद सभी पत्रकारों को कुछ हिदायतें भी दी गई थी और थोड़ी ट्रेनिंग भी, क्योंकि भले ही ये पत्रकार सिपाही नहीं थे, लेकिन थे तो वॉर फ़ील्ड में ही। अब बाक़ायदा आर्मी की तरफ़ से कोर्सेस करवाये जा रहे, जिनमें वॉर रिपोर्टिंग की बारीक़ियां सिखायी जाती हैं। हमारे एक अन्य सहयोगी मनीष शुक्ला जो की इस कार्यक्रम का हिस्सा थे ऐसे ही एक स्पेशल कोर्स के लिए सिलेक्ट हुए हैं। मनीष ने इस ख़ास पेशकश के लिए कारगिल के आज के हालात पर वहां जाकर कुछ बेहतरीन पैकेज़ेस बनाए थे। इन ख़ूबसूरत तस्वीरों को देखकर आपका मन भी यहां जाने का होगा और यहां बस जाने का होगा। लेकिन पाकिस्तान के नापाक इरादों की वजह से इस जगह की जो तस्वीर दुनिया के सामने गई है, वो इसकी ख़ूबसूरती से इकदम जुदा है।

कारगिल का नाम ज़ेहन में आते ही सामने जंग की भयावह तस्वीर होती है, कानों में धमाकों की गूंज होती है और सैंकड़ों शहीदो के चेहरे होते हैं। कारगिल याद किया जा सकता है दुनिया के सबसे ख़ूबसूरत टुरिस्ट स्पॉट्स में से एक होने के लिए लेकिन इसे पाकिस्तानी फौज और घुसपैठियों ने तब्दील कर दिया है एक ख़तरनाक वॉर फ़ील्ड में। राकेश जी और मनीष के साथ किये इस कार्यक्रम का नाम हमने रखा था, “कारगिल कल और आज”, विश्वास जानिए इन दोनों से बातचीत के बाद एहसास होता है कि कारगिल आज भी उतना ही ख़ूबसूरत है जितना कल था, हां वहां टैंकर्स की तैनाती, बड़ी तदाद में फौज, आंखों को चुभती है लेकिन इस जगह की सुरक्षा के लिए वो देश की मजबूरी भी है।
राकेश जी भी बीते दिनों की यादों में खो गये थे और उनका कहना था की वो दोबारा कारगिल जाना चाहेंगे, लेकिन वॉर कवर करने नहीं बल्कि इसकी ख़ूबसूरती का नज़ारा करने के लिए। मनीष की ज़्यादातर रिपोर्ट्स में भी इस इलाक़े के बाशिंदों का यही दर्द सामने आते है कि जो जगह पर्यटकों के लिए स्वर्ग है उसे नर्क में तब्दील कर दिया गया है। यहां के तमाम होटल्स युध्द के दौरान तबाह हो गए थे। अब बहुत हद तक इस जगह को फिर से बसाने की कोशिश हो रही है। किसी एक्सीडेंट के बाद रिकवर करने में जैसे एक इंसान को समय लगता है वैसे ही कारगिल को भी रिकवर करने में वक़्त लगेगा और ये भी सही है कि जैसे ज़ख्मों के निशान रिकवर करने के बावजूद रहते है, कारगिल के ज़ख्मों के निशान भी हटना मुश्किल है। लेकिन यहां के लोगों को अब भी उम्मीद है की कारगिल अपनी सही वजहों के लिए जाना जाएगा न कि जंग के लिए।

राकेश जी, मनीष या जो भी इस जगह पर गया इसकी यादें अब भी उनके दिलों में ताज़ा हैं। मैं ख़ुद कभी कारगिल नहीं गया लेकिन इस पर ये कार्यक्रम करने के बाद और अपने सहयोगियों से इसकी ख़ूबसूरती के बारे में जानने के बाद, यहां के बेहतरी नज़ारों की तस्वीरें देखने के बाद ये मेरे भी दिल में बस गया है। जब मौक़ा मिलेगा में यहां ज़रुर जाऊंगा। आप को मौक़ा मिले तो आप भी जाईएगा, क्योंकि कारगिल में अगर हालात सामान्य होंगे तो ये नापाक मंसूबे वाले दुश्मनों को भी क़रारा तमाचा होगा। जय हिंद