Thursday, July 13, 2017

अबे ओ दल्ले ! सुनो...

अबे ओ दल्ले
सांप की केंचुली में छिपे जोंक
तुम सबसे घिनौने तब नहीं होते
जब बनते हो प्रहरी
और हाथ में डेढ़ फुट का डंडा
या वर्दी पर टंके सितारों के रुआब में
तुम उसे भगाते हो थाने से
जो भेड़ियों से भागकर
घूंघट भर हिम्मत जुटाकर
मन में प्रलंयकारी प्रण करके पहुंचती है
और तुम्हारीं
लपलपाती फटी जीभ तक पहुंचे
भोग का प्रकोप
उसकी बची खुची
अस्मत-किस्मत-हिम्मत को भी
चीर देती है

अबे ओ दल्ले
खादी के पीछे के रंगे सियार
तुम सबसे अश्लील तब नहीं होते
जब दलालों के पूरे कुनबे के साथ बैठकर
मनाते हो जश्न हादसों का
चिताओं का ताप, लाशों की सढांध
तुम्हारे मुंह में पानी लाती है
और तुम तुम्हारी तोंद से ज्यादा लील जाते हो

अबे ओ दल्ले
छाती पर बैठ मूंग दलते सरकारी दामाद
तुम तब सबसे हरामखोर नहीं होते
जब जिंदा गरीब की खाल खींचते हो
उसके जी को खौलाकर तिल तिल मारते हो
लेकिन उसके माथे पर लिखे कर्ज का
सूद भर भी उसे नहीं देते
पर उसी के हाड़-मांस-पसीने पर
ठहाके लगाते हो
लाढ़ लड़ाते हो
बच्चे पढ़ाते हो
और उसकी किस्मत की फाइलों पर
कतारों के दलदल के दस्तखत करने में
तुम्हारे हाथ नहीं कांपते

अबे ओ दल्ले
तुम सबसे कमीने, सबसे कुटिल, सबसे चालबाज तब होते हो
जब हाथ में थाम लेते हो माइक
और मार देते हो लाख सपनों की पैमाइश
तुम सबसे हरामखोर, सबसे अश्लील तब होते हो
जब और दल्लों की तुम्हारी ओर उछाली चाप को
तुम हजारों घुंटी हुई सांसों का दम घोंटकर उछलकर लपकते हो
तुम सबसे अमानवीय तब होते हो
जब तुम सवाल बेचते हो
क्योंकि दल्लों के दलदल में फंसी छटपटाती जान के पास
सिर्फ सवाल होते हैं !

- देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
14 जुलाई 2017 (नोएडा)
             - 9953717705

Monday, November 14, 2016

जो तू मिला

इस उम्र में
मिला है तू
मुझसे कि अब मेरे
चेहरे पर
मेच्योरिटी का
एक परदा आन पड़ा है
न जाने कितने
नन्हें ख्वाब,
जिनकी बेवक्त मौत
हो गई थी
टूट के चिपके पड़े हैं
उस परदे पर
मैं झाड़ती नहीं कभी
उस पर्दे को
क्योंकि मुझे आज भी
वो ख्वाब तेरे पास ले जाते हैं

--रा.त्रि



मेरी दुनिया

ये हर सुबह की तस्वीर है
मेज़ पर फैले अखबार
के पहले पन्ने पर
रखा तुम्हारी
चाय का जूठा प्याला
उस आधे खाली
प्याले में

समाई मेरी पूरी दुनिया

--रा.त्रि 

सज़ा

गुनहगार तो हो तुम मेरे
सज़ा के हक़दार भी   
बड़ी ग़लतियां की हैं
तुम्हारे इस अंदाज़ ने
तुमने एक लम्हे को
इतिहास बनने
से रोक दिया था ना
अपने क्षणिक अहंकार 
पर सवार तुम
पास से गुज़र गए
नि:शब्द
शब्दों के ग़रीब थे तुम
मेरे करीब थे
फिर भी इतिहास की ह्त्या
के अपराधी तो हो ही
कोख में मारा था ना तुमने उसे
ख़ैर ....सज़ा ये है
कि जिसे मारा था
उसे ज़िंदा करो, प्यार से पालो
और फिर उसे पा   लो
वो सिर्फ तुम्हारा था
तुम्हारा ही है
सदैव

--रा.त्रि


तुम रहस्य

मेरी हर कहानी का पात्र 
तुम से ही क्यों निकलता है
हर कविता की दूब 
तुम्हारे भीतर ही क्यों लहलहाती है
रहस्यों से भरी हुई तुम
आखिर हो क्या


--रा.त्रि

मैं अकेला

ये कोई शिकायत नहीं है
............
............
लेकिन खोज रहा हूं रोज़
खुद को
बदल रहे हैं मायने
मेरे ‘ होने ’ के
क्योंकि
देर से ही सही
गिरने लगे हैं बदसूरत चेहरों
से सुंदर मुखौटे

--रा.त्रि

जीत

ताकि... तुम जीतो 
तो मैं भी जीतूं
इसीलिए......
मैं हार जाता हूं

--रा.त्रि