Tuesday, May 26, 2009

ये क्या बात हुई

मुद्दत बाद ऐसा हुआ
तुम पास से निकल गए
नि:शब्द...




मैं सिर्फ
उस हवा को छू पाया
जो तुम्हें छू कर
आई थी

ये क्या बात हुई

मुद्दत बाद ऐसा हुआ
तुम पास से निकल गए
नि:शब्द...




मैं सिर्फ
उस हवा को छू पाया
जो तुम्हें छू कर
आई थी

ये क्या बात हुई

मुद्दत बाद ऐसा हुआ
तुम पास से निकल गए
नि:शब्द...




मैं सिर्फ
उस हवा को छू पाया
जो तुम्हें छू कर
आई थी

Thursday, May 21, 2009

दाग झूठे हैं... देवेश वशिष्ठ 'खबरी'



सच सुंदर होता है...
और दाग अच्छे...
आज तक यही कहा है मैंने...
यही पढ़ा है...

मैंने इन दागों पर सुंदर कविताएं लिखीं,
और हर बार सुंदर धब्बों पर यकीन किया...
मैं डूबा रहा रंगों में...
गरारे करता रहा अपनी ही कविताओं के देर तक...

मैंने इंद्रधनुष को सुंदर कहा...
और समेटता रहा आंखों में सुंदर ख्वाब...
ये जानकर भी कि सुबह टूट जाएगी नींद...
और आंखों के झूठे ख्वाब भी...

सोता रहा मैं... आंखें मूंद कर
समेटता रहा सुंदर वादों का बोझ...
जैसे पोटली खोलूंगा तो सब बचा रहेगा...

मैं अक्सर बांधता रहा मुठ्ठी में किनारे की चमकीली रेत...
चुनता रहा फूल ये मानकर कि ये कभी नहीं मुरझाएंगे
मैं बटोरता रहा मुस्कान, शाश्वत खजाने की तरह...
पर मैं गलत था...

सब सुंदर चीजें सच नहीं थीं...
इंद्रधनुष बादलों का धोखा था...
मुस्कानों में दुनियादारी का फरेब था...
वादों में छिपी थी गद्दारी...

मेरी सब कविताएं झूठी थीं...
मेरे ख्वाब नकली थे...
अच्छे दागों की तरह...
अच्छे दाग झूठे होते हैं अक्सर...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9953717705

Wednesday, May 6, 2009

हम भी तालिबान


कल फिर एक औरत को नंगा करके गांव में घुमाया गया। सजा के तौर पर। उसका अपराध ही इतना ' घिनौना ' था कि इससे कम तो सजा क्या मिलती ! लड़की को भागने में मदद की। पता नहीं लड़की को भगाया गया या वह ' प्यार के चक्कर ' में खुद ही चली गई , लेकिन औरत ने किया है , तो ' अपराध ' बड़ा है। और इतने बड़े अपराध की सजा भी तो बड़ी होगी ! वहां भीड़ जमा होगी। किसी ने पूछा होगा , क्या सज़ा दें ? कहीं से आवाज आई होगी , इनके कपड़े फाड़ डालो। वाह ... सबके मन की बात कह दी। हां .. हां फाड़ डालो। एक ढोल भी मंगाओ। नंगी औरतों के पीछे - पीछे अपनी मर्दानगी का ढिंढोरा पीटने के काम आएगा। सज़ा भी दी जाएगी और सबको बता भी दिया जाएगा कि हम कितने बड़े मर्द हैं।

हम '... वही हैं , जो तालिबान को जी भरकर कोसते हैं। वे लड़कियों के स्कूल जलाते हैं , हम उन्हें नामर्द कहते हैं। वे कोड़े बरसाते हैं , हम उन्हें ज़ालिम कहते हैं। वे टीचर्स को भी पर्दों में रखते हैं , हम उन्हें जंगली कहते हैं। ' हम ', जो हमारी संस्कृति और इज़्ज़त की रक्षा के लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार रहते हैं। ' हम '... जो अपनी बेटियों के मुंह से प्यार नाम का शब्द बर्दाश्त नहीं कर सकते। यह सुनते ही उबल उठते हैं कि जाट की लड़की चमार के लड़के के साथ भाग गई। उन्हें ढूंढते हैं , पेड़ों से बांधते हैं और जला डालते हैं ... ताकि संस्कृति बची रहे।

इस काम में लड़की का परिवार पूरी मदद करता है , क्योंकि उसके लिए इज़्ज़त बेटी से बड़ी नहीं। उसके बाद लड़के के परिवार को गांव से निकाल देते हैं। ' हम '... जो भन्ना उठते हैं , जब लड़कियों को छोटे - छोटे कपड़ों में पब और डिस्को जाते देखते हैं। फौरन एक सेना बनाते हैं ... वीरों की सेना। सेना के वीर लड़कियों की जमकर पिटाई करते हैं और उनके कपड़े फाड़ डालते हैं। जिन्हें संस्कृति की परवाह नहीं , उनकी इज़्ज़त को तार - तार किया ही जाना चाहिए। उसके बाद हम ईश्वर की जय बोलकर सबको अपनी वीरता की कहानियां सुनाते हैं। ' हम '... जो इस बात पर कभी हैरान नहीं होते कि आज भी देश में लड़के और लड़कियों के अलग - अलग स्कूल - कॉलिज हैं।

जहां लड़के - लड़की साथ पढ़ते हैं , वहां भी दोनों अलग - अलग पंक्तियों में बैठते हैं। क्यों ? संस्कृति का सवाल है। दोनों साथ रहेंगे तो जाने क्या कर बैठेंगे। ' हम '... जो रेप के लिए लड़की को ही कुसूरवार ठहराते हैं क्योंकि उसने तंग और भड़काऊ कपड़े पहने हुए थे। ' हम '... जो अपनी गर्लफ्रेंड्स का mms बनाने और उसे सबको दिखाने में गौरव का अनुभव करते हैं और हर mms का पूरा लुत्फ लेते हैं। ' हम '... यह सब करने के बाद बड़ी शान से टीवी के सामने बैठकर तालिबान की हरकतों को ' घिनौना न्याय ' बताकर कोसते हैं और अपनी संस्कृति को दुनिया में सबसे महान मानकर खुश होते हैं। क्या ' हम ' तालिबान से कम हैं ?
नवभारत टाइम्स में विवेक सामरी

Tuesday, May 5, 2009

ख़बरी की एक गज़ल


हुनर भी सब चुक गया है, मुस्कुराने का
अब जमाना लद गया है- दिल लगाने का


छांव, बारिश, नीम, नदिया- सब पुरानी हो गयी
जबसे चलन चला है- मेहमानखाने का


फोन वाले प्यार की तासीर कम होती रही
कब से वाकया नहीं हुआ- सपनों में आने का


होली, दीवाली, ईद- सब दरिया में जा कर मर गए
अब सलीका खो गया है रंग लगाने का


हर रोज मुझसे घूंट भर- छूटता सा तू रहा
और जमाना चल पड़ा- हर चीज़ पाने का...


देवेश वशिष्ठ 'खबरी'

Saturday, May 2, 2009

तीस साल बाद




मैं लेटा था
अस्पताल के सफेद
बिस्तर पर


तुम्हें देख सकता था
पर सुन नहीं


झुर्रियों वाले हाथ की
उंगलियां उठने को हुईं
पर ताकत उम्र से
मात खा गईं
तुम स्तब्ध थीं
तीस साल बाद देखा था शायद
खोज रहीं थीं पुराने चेहरे की
एक भी
कतरन जो मिल जाये

Friday, May 1, 2009

दुनिया खट्टी होगी सब


मेरे पद डगमग हैं... तो?
मेरी गति दुर्धर है... तो?
तुम अपनी फिक्र करो,
नसीहत मत दो...
मैं जानता हूं रास्ते टेड़े करना...
तुम अड़ो, तो अड़ो।


कर्मण्येवाधिकारस्ते...
रट लिया... रट लो!
छाले मेरे हैं...
फैसला तुम क्यों लेने लगो?
नींद, सपने, लाड़, चुंबन,
सपनों ने सब तो छल लिया,
मैं पिटूंगा, पर लड़ूंगा,
तुम डरो, तो डरो!...


प्यार नहीं है कविता जैसा... तो?
भाव नहीं है राधा जैसा... तो?
तुम ढूंढो-फिरो... कन्हैया, राम, रसूल...
मैं जानता हूं... मैं बना रहना!
तुम खुदा बनो, तो बनो।

गर्म तवे पर,
बर्फ के डेले की तरह तड़पा हूं मैं...
हौसला करता हूं,
आग बुझेगी ये...
दही की हांड़ी में,
सहेजे सा जमा बैठा हूं...
उम्मीद में हूं,
दुनिया खट्टी होगी सब...


देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705