Tuesday, February 24, 2009

स्लमडॉग के बहाने...

44 साल के विकास स्वरूप दक्षिण अफ्रीका में भारत के डिप्टी हाईकमिश्नर हैं। इलाहाबाद के हैं और मुझसे कुछ साल बड़े हैं , इसलिए उनकी ख्याति अच्छी भी लगती है। उन्होंने दो साल पहले एक उपन्यास लिखा-Q & A. अंग्रेज़ी में लिखी ये उपन्यास लेकर वो भारत के दो-चार बड़े फिल्म बनाने वालों के पास गए-लोगों ने कहा ठीक तो है लेकिन बॉक्स ऑफिस का क्या करेंगे......फिर पैसे हम नहीं दे पाएंगे....विकास उल्टे पांव लौट आए...कालांतर में डैनियल बॉयल ने उनकी वो किताब पढ़ी जो इतनी लोकप्रिय हो गई थी कि बॉयल ने तुरंत उसके अधिकार खरीद लिए। इस फिल्म में जो भूमिका अनिल कपूर ने निभाई है , उसके लिए वो पहले अमिताभ बच्चन के पास गए...लेकिन उन्होंने इसके लिए मना कर दिया। उन्हें शायद इज्जत में बट्टा लगता दिखाई दिया। फिर वो शाहरुख के पास गए...शाहरुख अपने बगीचे में बागवानी कर रहे थे...खुरपी से मिट्टी खोदते खोदते उन्होंने बॉयल से बात की। खान के पास शायद टाइम ही नहीं था ऐसी फिल्मों के लिए। हारकर ब़ॉयल ने अनिल कपूर को लिया। अब वही फिल्म वाहवाही बटोर रही है , तो इन दोनों को और इनके परिवार वालों को बुरा लग रहा है। असल बात भइया यही है। मुंबई में एक्टरों की राजनीति ऐसी है कि बिल्कुल केकड़ों के जैसी।
खैर अपन ने इनमें से कई लोगों से खुद बात की है...और अपन अब इसी नतीजे पर पहुंचे हैं कि अच्छी फिल्म हो तो बिना भाषा के देखो , मज़ा लो।

लेकिन जो बड़ा मुद्दा है वो आप सब लोग मिस कर गए। मुद्दा ये कि -हर भाषा के उतकृष्ट साहित्य से भरपूर इस देश में लोग हिंदी, बांग्ला या तमिल तेलुगू का साहित्य क्यों नहीं पढ़ते। अपने बच्चों को तो हम अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़ाते हैं लेकिन उन्हें हिंदी के उपन्यास नहीं पढ़ाते...क्यों..सोचिएगा-जवाब मिल जाएगा।

स्लमडॉग पर सवालों के जवाब

स्लमडॉग ने एक बार फिर दुनिया भर में धूम मचायी है। फिल्मों से जुड़े सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ऑस्कर की खेप की खेप पर कब्ज़ा कर लिया। दस में आठ ऑस्कर जीते और अकूत वाहवाही भी। लेकिन किसी अंग्रेज़ की बनाई फिल्म को मिली ये कामयाबी हममें से कई लोगों को हज़म नहीं हो रही। इस कामयाबी पर कई लोगों के कई तरह के तर्क हैं ... उनका जवाब देना ज़रूरी लगा...इसलिए लिखने बैठ गया।
(1)'तारे ज़मीं पर' को ऑस्कर क्यों नहीं मिला--
फिल्म -तारे ज़मीं पर-एक बहुत बढ़िया फिल्म थी, लेकिन ऑस्कर में वो विदेशी भाषा की कैटेगरी में नॉमिनेटेड थी। ऐसी फिल्में जो अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी भाषाओं में बनती हैं वो सीधे कम्पीटीशन में नहीं आतीं। वो विदेशी भाषा के वर्ग में आती हैं जहां उनका कम्पीटीशन भी विदेशी भाषाओं की फिल्मों से ही रहता है। ये कहना बेमानी है कि -तारे ज़मीं पर -को ऑस्कर नहीं दिया तो बॉलीवुड या हिंदी फिल्मों की तौहीन हो गई। ये हम तब तक नहीं कह सकते जब तक हमें ये न पता हो कि उस वर्ग में जिस फिल्म को अवॉर्ड मिला है वो कैसी थी...हो सकता है -तारे से बेहतर हो...हो सकता है ...तारे से बहुत बेहतर हो....हो सकता है आमिर की इस फिल्म से वो फिल्म इतनी अच्छी हो कि तुलना ही न की जा सकती हो। इसलिए पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने की बजाय ये देखना चाहिए कि जिसे इनाम मिला है , उसकी खासियत क्या है। उसे देखा ही नहीं और कहने लगे ...अंग्रेज़ों ने बेमानी की है। हो सकता है बेमानी करते हों अंग्रेज़...लेकिन हमसे बड़े बेईमान तो नहीं हैं वो। कम से कम पुरस्कारों के बारे में। वर्ना ऑस्कर की इज़्ज़त इतनी क्यों है...आपको फिल्म फेयर और स्क्तीन अवॉर्ड्स...और तो और आपको राष्ट्रीय पुरस्कारों की कितनीइज़्ज़त है ..ये देखना हो तो इस बार के पद्म भूषण, पद्म श्री पुरस्कारों की लिस्ट देख लें..समझ में आ जाएगा कि ऑस्कर की इज़्ज़त इतनी क्यों है।
(2)ऑस्कर के लोग इतने दीवाने क्यों ?
इसलिए कि ये एवॉर्ड्स बड़े कड़े पैमाने पर तौले जाते हैं। फिल्म के एक एक फ्रेम , संगीत के एक एक टुकड़े को पैमाने पर तौला जाता है। ऐसी काट छांट होती है भइये कि आपकी हिंदुस्तानी फिल्में कहीं ठहरें ही नहीं। क्योंकि हमारे यहां तो पुरस्कार जान पहचान पर मिलते हैं..शायद इसीलिए आमिर खान खुद कभी भारत के किसी पुरस्कार समारोह में जाते ही नहीं...और इन्ही आमिर की फिल्में अगर ऑस्कर में जाती हैं , तो हमें तो खुश होना चाहिए कि कोई ऐसा भी है हमारे बीच जो इन सारी बाधाओं के बावजूद इतने बड़े कॉम्पीटीशन में घुस पाता है। लेकिन नहीं...एक अजब सी नालायकी है हमारे अंदर ....न कुछ करते हैं , न करने देते हैं। आप में से कुछ लोगों को शायद याद हो-कि शाहरुख खा4न को जब पहले फिल्म फेयर मिला था तो , पुरस्कार लेकर पोडियम पर से उन्होंने कहा था कि -मैं तो पैसे लेकर तैयारी से आया था कि अगर नहीं मिला तो मंत के पीछे जाकर संयोजकों को थमा दूंगा थैली। तो हमारे पुरस्कारों की तो ये औकात है। हर आदमी को पता है कि हिंदुस्तान में बड़े से बड़ा ओहदा और बड़ी से बड़ी नौकरी कैसे मिल सकती है। पुरस्कार इसी कड़ी में है...वो कैसे भी मिल जाते हैं...मेरे सात के कई पत्रकार हैं...उनके घर में भांति भांति के सम्मान और ट्रॉफियां रखी हुईं हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा क्या किया है कि उन्हें इनामों से नवाज़ा गया है -उन्हीं से पूछ लीजिए -तो बता न पाएं। खुद मुझे दो बार ऑफर हो चुके हैं अवॉर्डस ...लेकिन ऐसे कि जिनका किसी ने नाम तक न सुना हो-या फिर ऐसे कि जिसमें पुरस्कारलेने के बाद आपके इस्तेमाल की संभावनाएं हों। मैंने आयोजकों से दोनों बार पूछा कि -मैंने ऐसा किया क्या है ? तो उनका भी कहना सुन लीजिए-अरे साहब , बड़े लोग विनम्र होते हैं ..ये आपका बड़प्पन है कि आप खुद को कुछ नहीं मानते।
(3)मूल किताब को ऑस्कर क्यों नहीं मिला, ऐक्टर्स को क्यों नहीं मिला--
इसलिए कि फिल्म मूल किताब पर नहीं बनी...उस पर आधारित स्क्रिप्ट पर बनी ...किताब को विकास स्वरूप दो साल पहले 10 करोड़ रुपये में बेच चुके हैं। इसलिए अब अगर डैनी बोयल उन्हें अपने साथ हर समारोह में रखते हैं , तो ये उनका बड़प्पन है। विकास की किताब की चर्चा तो साहब आपने खुद अपने देश में नहीं की। उनकी प्रतिभा की कद्र तो आपके बॉलीवुड ने खुद नहीं की। वो मुंबई गये -कई फिल्मकारों से मिले -सबने दरवाज़े बंद कर लिए ...क्योंकि उनकी निगाह में ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बेकार होती। और वो फिल्म जब अंग्रेज़ों ने बना ली और तहलका मचा दिया तो लोगों को मिर्ची लग रही है। अब जया बच्चन और अमिताभ बच्चन कहते हैं कि मीडिया को स्लमडॉग की सफलता को इतनी हवा नहीं देनी चाहिए, क्योंकि ये एक विदेशी फिल्म है। अच्छा , तो जया जी आपको बच्चों की फिल्मों के बारे में बात करें हम ? उन फिल्मों के बारे मे जिनमे दुनिया भर के लटके झटके होते हैं और कहानी ढ़ूंढने पर भी नहीं मिलती..ये वही फिल्में हैं जिनके चलते आपने और आपके परिवार ने हिंदुस्तानी पुरस्कारों पर कब्ज़ा कर रखा है। जया जी -आपकी बहू को पद्मश्री मिला है इस साल का। लेकिन इस साल तो उन्होंने सिर्फ एक ही फिल्म की। जोधा अकबर। और उस फिल्म में अभिनय की तारीफ तो आजतक आपके ही लोगों ने नहीं की। विशुद्ध मसाले से भरपूर इस फिल्म में ऐश्वर्या ने क्या किया था ऐसा कि राष्ट्रपति भवन से रुक्का आ गया। खबर तो ये भी है कि भाई अमर सिंह ने चाबी घुमाई थी-ताज़ा ताज़ा समर्थन दिया था केंद्र को-इसलिए एक अदना सा पुरस्कार तो बांएं हाथ का खेल था। दूसरी बात- स्लमडॉग को ऐक्टिंग के किसी वर्ग में नॉमिनेट किया ही नहीं गया था। ये जान लें कि केंद्रीय रोल किसी का था ही नहीं ।
(आगे और है)

स्लमडॉग पर सवालों के जवाब

स्लमडॉग ने एक बार फिर दुनिया भर में धूम मचायी है। फिल्मों से जुड़े सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार ऑस्कर की खेप की खेप पर कब्ज़ा कर लिया। दस में आठ ऑस्कर जीते और अकूत वाहवाही भी। लेकिन किसी अंग्रेज़ की बनाई फिल्म को मिली ये कामयाबी हममें से कई लोगों को हज़म नहीं हो रही। इस कामयाबी पर कई लोगों के कई तरह के तर्क हैं ... उनका जवाब देना ज़रूरी लगा...इसलिए लिखने बैठ गया।
(1)'तारे ज़मीं पर' को ऑस्कर क्यों नहीं मिला--
फिल्म -तारे ज़मीं पर-एक बहुत बढ़िया फिल्म थी, लेकिन ऑस्कर में वो विदेशी भाषा की कैटेगरी में नॉमिनेटेड थी। ऐसी फिल्में जो अंग्रेज़ी के अलावा दूसरी भाषाओं में बनती हैं वो सीधे कम्पीटीशन में नहीं आतीं। वो विदेशी भाषा के वर्ग में आती हैं जहां उनका कम्पीटीशन भी विदेशी भाषाओं की फिल्मों से ही रहता है। ये कहना बेमानी है कि -तारे ज़मीं पर -को ऑस्कर नहीं दिया तो बॉलीवुड या हिंदी फिल्मों की तौहीन हो गई। ये हम तब तक नहीं कह सकते जब तक हमें ये न पता हो कि उस वर्ग में जिस फिल्म को अवॉर्ड मिला है वो कैसी थी...हो सकता है -तारे से बेहतर हो...हो सकता है ...तारे से बहुत बेहतर हो....हो सकता है आमिर की इस फिल्म से वो फिल्म इतनी अच्छी हो कि तुलना ही न की जा सकती हो। इसलिए पूर्वाग्रह से ग्रस्त होने की बजाय ये देखना चाहिए कि जिसे इनाम मिला है , उसकी खासियत क्या है। उसे देखा ही नहीं और कहने लगे ...अंग्रेज़ों ने बेमानी की है। हो सकता है बेमानी करते हों अंग्रेज़...लेकिन हमसे बड़े बेईमान तो नहीं हैं वो। कम से कम पुरस्कारों के बारे में। वर्ना ऑस्कर की इज़्ज़त इतनी क्यों है...आपको फिल्म फेयर और स्क्तीन अवॉर्ड्स...और तो और आपको राष्ट्रीय पुरस्कारों की कितनीइज़्ज़त है ..ये देखना हो तो इस बार के पद्म भूषण, पद्म श्री पुरस्कारों की लिस्ट देख लें..समझ में आ जाएगा कि ऑस्कर की इज़्ज़त इतनी क्यों है।
(2)ऑस्कर के लोग इतने दीवाने क्यों ?
इसलिए कि ये एवॉर्ड्स बड़े कड़े पैमाने पर तौले जाते हैं। फिल्म के एक एक फ्रेम , संगीत के एक एक टुकड़े को पैमाने पर तौला जाता है। ऐसी काट छांट होती है भइये कि आपकी हिंदुस्तानी फिल्में कहीं ठहरें ही नहीं। क्योंकि हमारे यहां तो पुरस्कार जान पहचान पर मिलते हैं..शायद इसीलिए आमिर खान खुद कभी भारत के किसी पुरस्कार समारोह में जाते ही नहीं...और इन्ही आमिर की फिल्में अगर ऑस्कर में जाती हैं , तो हमें तो खुश होना चाहिए कि कोई ऐसा भी है हमारे बीच जो इन सारी बाधाओं के बावजूद इतने बड़े कॉम्पीटीशन में घुस पाता है। लेकिन नहीं...एक अजब सी नालायकी है हमारे अंदर ....न कुछ करते हैं , न करने देते हैं। आप में से कुछ लोगों को शायद याद हो-कि शाहरुख खा4न को जब पहले फिल्म फेयर मिला था तो , पुरस्कार लेकर पोडियम पर से उन्होंने कहा था कि -मैं तो पैसे लेकर तैयारी से आया था कि अगर नहीं मिला तो मंत के पीछे जाकर संयोजकों को थमा दूंगा थैली। तो हमारे पुरस्कारों की तो ये औकात है। हर आदमी को पता है कि हिंदुस्तान में बड़े से बड़ा ओहदा और बड़ी से बड़ी नौकरी कैसे मिल सकती है। पुरस्कार इसी कड़ी में है...वो कैसे भी मिल जाते हैं...मेरे सात के कई पत्रकार हैं...उनके घर में भांति भांति के सम्मान और ट्रॉफियां रखी हुईं हैं। लेकिन उन्होंने ऐसा क्या किया है कि उन्हें इनामों से नवाज़ा गया है -उन्हीं से पूछ लीजिए -तो बता न पाएं। खुद मुझे दो बार ऑफर हो चुके हैं अवॉर्डस ...लेकिन ऐसे कि जिनका किसी ने नाम तक न सुना हो-या फिर ऐसे कि जिसमें पुरस्कारलेने के बाद आपके इस्तेमाल की संभावनाएं हों। मैंने आयोजकों से दोनों बार पूछा कि -मैंने ऐसा किया क्या है ? तो उनका भी कहना सुन लीजिए-अरे साहब , बड़े लोग विनम्र होते हैं ..ये आपका बड़प्पन है कि आप खुद को कुछ नहीं मानते।
(3)मूल किताब को ऑस्कर क्यों नहीं मिला, ऐक्टर्स को क्यों नहीं मिला--
इसलिए कि फिल्म मूल किताब पर नहीं बनी...उस पर आधारित स्क्रिप्ट पर बनी ...किताब को विकास स्वरूप दो साल पहले 10 करोड़ रुपये में बेच चुके हैं। इसलिए अब अगर डैनी बोयल उन्हें अपने साथ हर समारोह में रखते हैं , तो ये उनका बड़प्पन है। विकास की किताब की चर्चा तो साहब आपने खुद अपने देश में नहीं की। उनकी प्रतिभा की कद्र तो आपके बॉलीवुड ने खुद नहीं की। वो मुंबई गये -कई फिल्मकारों से मिले -सबने दरवाज़े बंद कर लिए ...क्योंकि उनकी निगाह में ये फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बेकार होती। और वो फिल्म जब अंग्रेज़ों ने बना ली और तहलका मचा दिया तो लोगों को मिर्ची लग रही है। अब जया बच्चन और अमिताभ बच्चन कहते हैं कि मीडिया को स्लमडॉग की सफलता को इतनी हवा नहीं देनी चाहिए, क्योंकि ये एक विदेशी फिल्म है। अच्छा , तो जया जी आपको बच्चों की फिल्मों के बारे में बात करें हम ? उन फिल्मों के बारे मे जिनमे दुनिया भर के लटके झटके होते हैं और कहानी ढ़ूंढने पर भी नहीं मिलती..ये वही फिल्में हैं जिनके चलते आपने और आपके परिवार ने हिंदुस्तानी पुरस्कारों पर कब्ज़ा कर रखा है। जया जी -आपकी बहू को पद्मश्री मिला है इस साल का। लेकिन इस साल तो उन्होंने सिर्फ एक ही फिल्म की। जोधा अकबर। और उस फिल्म में अभिनय की तारीफ तो आजतक आपके ही लोगों ने नहीं की। विशुद्ध मसाले से भरपूर इस फिल्म में ऐश्वर्या ने क्या किया था ऐसा कि राष्ट्रपति भवन से रुक्का आ गया। खबर तो ये भी है कि भाई अमर सिंह ने चाबी घुमाई थी-ताज़ा ताज़ा समर्थन दिया था केंद्र को-इसलिए एक अदना सा पुरस्कार तो बांएं हाथ का खेल था। दूसरी बात- स्लमडॉग को ऐक्टिंग के किसी वर्ग में नॉमिनेट किया ही नहीं गया था। ये जान लें कि केंद्रीय रोल किसी का था ही नहीं ।
(आगे और है)

Wednesday, February 4, 2009

एक 'मुस्कान' की कहानी

अगर इस कहानी को दुनिया के किसी भी कोने में बैठा शख़्स सुन रहा हो.. तो वो इसका हिस्सा बन जाता है... ये उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में बसे एक गांव की कहानी है। सात साल की मासूम लड़की की कहानी है... कहानी को समझना है... उससे जुड़ी उम्मीदों को समझना है लिहाज़ा ज़रा गहरे चलते हैंउम्र सात साल... नाम है... ख़ैर छोड़िए, नाम जो भी रखा गया हो, उसके साथ के बच्चे तो उसे होठकटवा कह कर ही बुलाते हैं। बिलकुल नन्ही गुड़िया जैसी... आंखों में शरारत और भीतर बचपन समेटे... स्कूल जाती है.. पढ़ती है.. खेलती है.. लेकिन हर वक़्त उसके ऊपर चिपकी होती है ज़िल्लत। होठ जन्म से कटे हैं.. कोई कहता है ग्रहण का प्रकोप है.. कोई कहता है देवी की क्रूर नज़र पड़ी है। वो हंसना चाहती है.. लेकिन उसकी मुस्कराहट पर ताले पड़े हैं। क्लास में पीछे बैठती है, शायद खुद पर शर्म आती है इसलिए..। सब उसे चिढ़ाते हैं कोई उसके साथ नहीं खेलता... लेकिन बच्ची है न.. तो खुद ही गोल गोल चक्कर काटते हुए, उछलते हुए किसी ख्याल पर, मस्त हो जाती है.. फिर अचानक उसे अहसास होता है कि वो अकेली है और खोई खोई आंखों से लुका छिपी खेलते बच्चों में देर तक खुद को ढूंढती रहती है। सात साल की इस बच्ची की दुनिया जन्म से ऐसी ही रही ... जब कभी आईना देखती है... उसे अपनी शक्ल नहीं... डरावने... नुकीले दांतों वाले सवाल दिखाई देते हैं..। बीच बीच में अपने बाबू(पिता) को अपना चेहरा दिखाती है, बड़े इसरार से उनकी तरफ देखती है, और बाबू... वो अपनी तरफ देखते हैं, अपनी जेब बहुत छोटी और फटी दिखाई देती है उन्हें, नहीं जानते कि कभी इस बच्ची के हाथ पीले भी होंगे या नहीं। वो नहीं मानते कि उनकी बेटी कभी मुंहफट आईने से ये लड़ाई जीत सकेगी... या वो कभी शान से मुस्करा भी सकेगी..फिर एक सुबह, गंदी सी दीवार पर चिपका एक उजला इश्तेहार होठकटवा कही जाने वाली इस लड़की को अपने नाम पिंकी जैसा खिला खिला बनने की उम्मीद देता है... पिंकी की आंखों में चमक है.. वो एक बार फिर बाबू के सामने है.. अपने हाथ में बाबू की अंगुलियां लिए हुए कह रही है... चलो, चलो न बाबू..। बाबू के सवाल - बहुत दूर है कैसे जाओगी..? बहुत पैदल चलना पड़ेगा.. तुम्हें डर नहीं लग रहा ? लेकिन पिंकी की एक ही रट है बनारस जाना है। उसे विश्वास था कि उसकी ‘smile’ उसे हमेशा के लिए वापस मिल जाएगी। और ऐसा ही हुआ
कल तक जिस लड़की को सब होठकटवा कह कर बुलाते थे अब वो पिंकी हो गई है.... एक ऑपरेशन ने पिंकी की ज़िंदगी बदल दी है। अब उसकी ‘smile’ को पूरी दुनिया देख रही है... पिंकी की मुस्कान ने भारत को ऑस्कर के स्टेज तक पहुंचा दिया... क्योंकि अपनी मुस्कान को हासिल करने की इस सच्ची कहानी पर बनी डॉक्यूमेंट्री स्माइल पिंकी को दुनिया भर के सिनेमाप्रेमियों के साथ साथ एकेडमी अवार्ड्स के ज्यूरी मेंबर्स ने भी बहुत पसंद किया.. गांव रामपुर दाबाही के लोगों को भी खुशी है कि उनके ही गांव की पिंकी पर बनी डॉक्यूमेंट्री का डंका ऑस्कर में बजा, अब गली गली में अक्सर पिंकी के नाम के नारे सुनाई दे जाते हैं। गांव की हिरोइन पिंकी है तो गांव के हीरो डॉ सुबोध कुमार जिन्होंने पिंकी के क्लेफ्ट लिप्स को ऑपरेशन से ठीक कर दिया।
अब पिंकी से कभी मिलिए... उसे देखिए... शान से शीशा देखती है.. उसकी दुनिया एकदम बदल गई है
पिंकी की मुस्कान पर लगे ताले खुल चुके हैं...पहले बच्चे पिंकी को चिढ़ाते थे लेकिन अब सब उसके साथ खेलते हैं, पहले पिंकी स्कूल में सबसे पीछे बैठती थी लेकिन अब वो सबसे आगे बैठती है, मन लगाकर पढ़ती है। पिंकी को नई मुस्कान के साथ एक नया लक्ष्य मिला है अब उसे डॉक्टर बनना है अपने जैसे तमाम बच्चों का इलाज करना है.. कई और होंठ कटवा बच्चों को पिंकी बनाना है। और हां.. अब वो तन्हा नहीं है.. उसके साथ उसकी मुस्कान है।
हैरत है कि ये कहानी ख़ालिस हिंदुस्तानी है लेकिन ये दिखाई दी एक अमेरिकी फिल्म निर्देशक को.. 39 मिनट में अमेरिकी निर्देशक मेगन मायलन ने बोला कम है.. कहा ज़्यादा है.. गौर से देखें तो पिंकी की मुस्कराहट में हमारे लिए बहुत सारे सबक हैं।
सोचता हूं कि इस कहानी का सबसे अहम किरदार कौन है... पिंकी... डॉ सुबोध.. या फिर मेगन

सिद्धार्थ त्रिपाठी
(सिद्धार्थ यूं तो एक टीवी जर्नलिस्ट हैं पर ख्वामख्नाह अपनी ऊर्जा ज़ाया नहीं करते...वो जो दिन में करते हैं उसे रात में गुनते हैं...और फिर काग़ज़ पर बिखेर देते हैं...लोगों की कही-अनकही, किसी से सुना या फिर अखबार के किसी कोने में छपी एक छोटी सी खबर उन्हें आइडिया दे गई तो समझिए कुछ पक सा गया। तो, जो उन्होंने ताज़ा ताज़ा पकाया है ...वो आपके सामने है।)