Friday, December 26, 2008

माया की 'माया'

यूपी के एक विधायक शेखर तिवारी आजकल जेल में हैं। जेल में क्यों-पुलिस कस्टडी में क्यों नहीं-ये एक सवाल है जो हर जुबान पर है। तिवारी जी उस पार्टी के नुमाइंदे हैं जिसने सूबे में कुर्सी पाने के लिए दो बरस पहले ब्राह्मणों से समझौता किया। उन्हीं ब्राह्मणों से जिनके खिलाफ कांशीराम ने कभी दलितों को एकजुट किया था।
बदलते वक्त में यूपी में एक नई ताकत बनने के लिए मायावती ने जो कार्ड खेला , वो चल गया और पार्टी सत्ता में अपने दम पर आई। बहन जी के जन्मदिन पर चंदा यूपी में कोई नई बात नहीं...महकमा छोटा हो या बड़ा , अफसरों को हर साल ताकीद की जाती है कि हर अफसर एक तय राशि बहन जी को पार्टी फंड में देगा। अब ये पैसा आधिकारिक तौर पर तो दिया नहीं जाता ...इसलिए इसका कोई रिकॉर्ड भी नहीं रहता। अफसर कमाते हैं और ये सोचकर कि अच्छी पोस्टिंग हाथ से न जाए , हर साल बहन जी को गिफ्ट में हरे हरे नोट देते भी हैं। लेकिन कभी कभी ,कोई अफसर फंस भी जाता है। जैसे औरैया के इस एग्ज़ीक्यूटिव इंजीनियर के साथ हुआ। उनकी मौत के बाद सकपकाई सरकार सिर्फ इतना कर पाई कि उसने विधायक को पुलिस कस्टडी में जाने से बचा लिया। तो शेखर तिवारी अब जेल में हैं-यानी आराम फरमा रहे हैं। उनसे कोई पूछताछ नहीं होगी और जेल में उनकी देखरेख भी बेहतर होगी। सीबीआई जांच के लिए मायावती साफ मना कर चुकी हैं क्योंकि वो जांच फिर केंद्र के पास चली जाएगी।
ये वही मायावती हैं जिनकी पार्टी का एक कार्यकर्ता मुलायम सरकार के दौरान इलाहाबाद में चुनावी राजनीति में गोली का शिकार हो गया था और तब सीबीआई जांच के लिए बहन जी ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया था। तो....क्या इंजीनियर मनोज गुप्ता के खून का रंग राजू पाल के खून से कम गाढ़ा था ? इस सवाल का जवाब मिले,न मिले-इस घटना ने एक नये ट्रेंड की शुरुआत की है। शायद पूर्ण बहुमत के साथ आई सरकार से यही सबसे बड़ा नुकसान होता है कि सरकार जो चाहे करती जाए...कोई सवाल न हो।

Saturday, December 13, 2008

श्वान हैं तो क्या !

गली का कुत्ता लालू गुस्से में था। गुस्सा इतना कि सड़क के कोने में बैठ लगभग कांप रहा था..पता ही नहीं चला कि पास से कब दुम हिलाती लाली निकल गई...लाली इसी गली की कुतिया है..और लालू से बनती है उसकी। लालू को इंतज़ार था कि गली के दूसरे कुत्ते कब आएंगे....उसने मीटिंग बुला रखी थी-कौम के लिए। धीरे धीरे सारे आवारा कुत्तों का हुजूम इकट्ठा होने लगा। बैठक दो मकानों के बीच बरसों से खाली पड़े एक प्लॉट में बुलाई गई थी। भीड़ इकट्ठी देख लालू अपनी जगह से उठा...एक उंची जगह जाकर खड़ा हुआ और बोलने से पहले गला साफ किया।

' दोस्तों ... '
लालू ने बोलना शुरू किया....
'वक्त बहुत मुश्किल है...अब चुप नहीं रहना...हमारी इज्जत खतरे में है...अब तक तो ठीक था...अपने बीरू भइया हिंदी फिल्मों में बोलते थे...कमीने कुत्ते...हम चुप रह जाते थे...लेकिन अब पानी सर से ऊपर जा रहा है...अब नेता भी हम पर तंज कसने लगे हैं....केरल का मुख्यमंत्री बोलता है मेजर संदीप शहीद नहीं हुआ होता तो कुत्ता भी उसके घर नहीं जाता...कोई मुझे बताए...क्या हमारी ही उपमाएं रह गईं हैं ? आखिर हम एक वफादार कौम हैं....ये और बात है कि हम आवारा हो गए...लेकिन हमारी बहुत सी जातियां बड़े बड़े घरों की रखवाली किया करती हैं.....हम न हों तो रात को सड़क पर लोग दारू पीकर दंगे करते फिरें ... ये तो हम हैं कि रात को सड़कों की बेबात रखवाली करते हैं....सड़कों पर लाठी पटक कर चला जाने वाला पहरेदार हमारे ही भरोसे तो चैन से रात भर सोता है....तो हम क्यों इंसानों का जुल्म बर्दाश्त करें....
सारे कुत्तों ने एक बार भौंक कर समर्थन जाहिर किया।

(आगे और है...अधूरा)

Thursday, December 4, 2008

संभल जाओ रहनुमाओ

वो ताज प्रेम की इमारत तो नहीं था-लेकिन वहां मोहब्बत करने वाले आते थे। लेकिन गोलियों से जब उसकी दीवारें छलनी कर दी गईं...तो शहर फट पड़ा। गेटवे ऑफ इंडिया पर उमड़ी वो भीड़ शायद इतिहास में अपना नाम लिख गई हो....बता गई हो कि सब्र का बांध जब टूट जाता है तो एक आम शरीफ शहरी के गुस्से की शक्ल कैसी होती है। मोमबत्तियां जलाकर, भड़काऊ पोस्टर लेकर और अपने रहनुमाओं को गाली देकर उस रात वो भीड़ लौट गई जिसने उस शहर का दुख अपने कलेजे में बड़ी शिद्दत से महसूस किया था। ये एका इतना चौंकाने वाला था कि उस शहर के आका को कुर्सी छोड़ते वक्त कहना पडा कि - लोगों का गुस्सा बहुत था, इसलिए इस्तीफा दे रहा हूं।
इतिहास में ऐसी कई भीड़ों का ज़िक्र हुआ होगा और उन्होंने कई बदलाव किये होंगे। एक की तो याद आप सबको होगी-जब फ्रांस की एक रानी ने महल से झांक कर बाहर देखा और कारिंदों से पूछा कि ये भीड़ क्यों महल के बाहर खड़ी है, कारिंदों ने बताया कि ये लोग कहते हैं कि ये भूखे हैं...इन्हें रोटी चाहिए....रानी ने पूछा--भूखे हैं तो केक क्यों नहीं खाते। इतिहास के पन्नों में दर्ज उस भीड़ ने कुछ दिनों बाद फ्रांस का तख्ता पलट दिया। ताज के सामने इकट्ठा वो भीड़ भी एक चेतावनी थी...हुक्मरानों को...कर लो जितना घालमेल कर सकते हो। एक दिन आएगा जब जवाब देना होगा..कोई कोर्ट कचहरी नहीं...यहीं सबके सामने देना होगा जवाब।
नींद से जागी भीड़ तब पूछेगी कि ये कौन सा कानून है कि ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने पर एक शूटर को ये देश 3 करोड़ रूपये और 40 लाख की कार न्योछावर कर देता है...और ताज बचाने वाले कमांडोज़ मारे जाते हैं तो उनके परिवार को 5 लाख रुपये देकर अपनी ड्यूटी पूरी कर ली जाती है। यही नहीं .... मरने वाले एक कमांडो के परिवार से एक मुख्यमंत्री बदजुबानी भी करता है, माफी मांगने से इनकार भी करता है , फिर माफी मांग भी लेता है। इस नैतिकता पर भीड़ सवाल नहीं पूछेगी...सीधे फैसला करेगी।
सवाल पूछे जाएंगे उन लोगों से भी जिन्होंने कहा था कि लिपिस्टिक-पाउडर लगाकर गेटवे ऑफ इंडिया पर प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की जांच होनी चाहिए। लोग पूछेंगे कि तुमने ये सवाल तब क्यों नहीं किया जब यहीं औरतें लिपिस्टिक-पाउडर लगाकर तुम्हें वोट देने सड़कों पर उतरीं थीं...और तुम्हें कुर्सी पर बिठाया भी। शायद इसीलिए लगातार अपनी ग़लतियों से सबक न लेने वाले देश को सोचना होगा कि वो नौबत न ही आए तो बेहतर कि भीड़ को फैसला करना पड़े।

Monday, December 1, 2008

पाकिस्तान को एक हिन्दुस्तानी शायर की हिदायत

पाकिस्तान के लोगों में पाकिस्तान की हकूमत और पाकिस्तानी मीडिया के ज़रिए ये बात फैलाई जाती है कि हिन्दुस्तान में जो मुसलमान हैं उन्हें बड़ी मुश्किलों का सामना करना पड़ता है...उनपर ग़मों के पहाड़ ढाए जाते हैं...इस बात को मद्देनज़र रखते हुए एक हिन्दुस्तानी शायर ने पाकिस्तान की मीडिया, पाकिस्तान की हुकूमत और पाकिस्तान की आवाम को मुखातिब करते हुए ये नज़्म कही... जो आपकी पेश-ए-खिदमत है !


तुमने कश्मीर के जलते हुए घर देखे हैं
नैज़ा-ए-हिंद पे लटके हुए सर देखे हैं
अपने घर का तु्म्हें माहौल दिखाई न दिया
अपने कूचों का तुम्हें शोर सुनाई न दिया
अपनी बस्ती की तबाही नहीं देखी तुमने
उन फिज़ाओं की सियाही नहीं देखी तुमने
मस्जिदों में भी जहां क़त्ल किए जाते हैं
भाइयों के भी जहां खून पिए जाते हैं
लूट लेता है जहां भाई बहन की इस्मत
और पामाल जहां होती है मां की अज़मत
एक मुद्दत से मुहाजिर का लहू बहता है
अब भी सड़कों पे मुसाफिर का लहू बहता है
कौन कहता है मुसलमानों के ग़मख़्वार हो तुम
दुश्मन-ए-अम्न हो इस्लाम के ग़द्दार दो तुम
तुमको कश्मीर के मज़लूमों से हमदर्दी नहीं
किसी बेवा किसी मासूम से हमदर्दी नहीं
तुममें हमदर्दी का जज़्बा जो ज़रा भी होता
तो करांची में कोई जिस्म न ज़ख्मी होता
लाश के ढ़ेर पे बुनियाद-ए-हुकूमत न रखो
अब भी वक्त है नापाक इरादों से बचो
मशवरा ये है के पहले वहीं इमदाद करो
और करांची के गली कूचों को आबाद करो
जब वहां प्यार के सूरज का उजाला हो जाए
और हर शख्स तुम्हें चाहने वाला हो जाए
फिर तुम्हें हक़ है किसी पर भी इनायत करना
फिर तुम्हें हक़ है किसी से भी मुहब्बत करना
अपनी धरती पे अगर ज़ुल्मों सितम कम न किया
तुमने घरती पे जो हम सबको पुर्नम न किया
चैन से तुम तो कभी भी नहीं सो पाओगे
अपनी भड़काई हुई आग में जल जाओगे
वक्त एक रोज़ तुम्हारा भी सुकूं लूटेगा
सर पे तुम लोगों के भी क़हर-ए-खुदा टूटेगा..


जय हिन्द

मसरूर अहमद
(मसरूर कलम के धनी हैं...ग़लत बात न सुनते हैं , न कहते हैं...शायद इसीलिए अल्लाताला ने उन्हें ये नेमत बख़्शी है...कहा है कि -जाओ धरती पर ...समंदर की सियाही लो...और धरती को काग़ज़ मानो--और लिखते जाओ...सो शरूआत की है उन्होंने। अल्ला उन्हें लंबी उम्र और उंगलियों में ताकत दे)

Wednesday, November 26, 2008

कहानी - थोड़ी पुरानी

बारहवीं-तेरहवीं सदी में ईरान में एक मशहूर सूफी संत हुए थे - मुहम्मद फरीदुद्दीन अत्तार। उन्होंने अपनी किताब मन्निकुत्तैर में साधक के मार्ग की कठिनाइयों और चरम लक्ष्य तक पहुंचने का वर्णन बडे़ ही रोचक ढंग से किया है। इसके लिए उन्होंने एक दिलचस्प रूपक का सहारा लिया। किताब की शुरुआत संसार भर के पक्षियों की कॉन्फ्रंस बुलाने और उसमें हुदहुद के नेता चुने जाने के वर्णन से होती है। हुदहुद को आध्यात्मिक जगत के रहस्यों का पता है। वह पक्षियों को बतलाता है कि उसका भी एक राजा है जिसका नाम सीमुर्ग है। लेकिन हुदहुद अकेले उसके पास तक जाने का साहस नहीं कर पाता। यदि कॉन्फ्रंस में उपस्थित सभी पक्षी साथ चलने को तैयार हों तो वह उन्हें ले कर जा सकता है। इसके बाद हुदहुद ने बहुत सी कहानियां कही हैं।
उन कहानियों को सुन कर बाकी चिड़ियों के हृदय में भी उस प्रियतम (सीमुर्ग) से मिलने की तीव्र आकांक्षा उत्पन्न होती है और वे हुदहुद के नेतृत्व में अपनी यात्रा पर अग्रसर होती हैं। हुदहुद रास्ते में साथी पक्षियों की जिज्ञासाओं का जवाब देता है। एक पक्षी के पूछने पर बतलाता है कि सीमुर्ग तक पहुंचने के लिए किस तरह घने जंगलों से भरी हुई सात घाटियां हैं। उन सात घाटियों के भी नाम हुदहुद ने बतलाए- पहली घाटी खोज की है, दूसरी प्रेम की, तीसरी ज्ञान की, चौथी नि:संगता की, पांचवीं एकत्व की, छठी भावाविष्ठावस्था (आनंद) की और सातवीं फना (मृत्यु) की। अत्तार ने फारसी में लगभग सवा लाख पद लिखे हैं। इनके कहने का ढंग अत्यंत ही सरल था, लेकिन कहीं-कहीं उनमें विरोधाभासी शैली अपनाने की प्रवृत्ति भी दीखती है। जैसे अत्तार अपनी मसनवी में लिखते हैं, ऐ मनुष्य, यह संसार तुम से ही परिपूर्ण है, लेकिन तुम संसार में नहीं हो। तुम्हारा मौन तुम्हारी वाणी से है।
अत्तार भावाविष्ठावस्था में कहते हैं, आखिरकार बेहद जद्दोजहद (प्रयत्नों) के बाद मैंने विजय पा ली है, मेरा अहंकार मेरी आंखों से आंसू बन कर बह गया है, मुझ खोजी को अब आनंद ही आनंद है। मेरे दिल का चिराग रोशन हो गया है, हर चेहरे में मुझे अब उसकी (ईश्वर) छवि दिखाई पड़ती है। मैं अपने ही भीतर प्रेम से जल रहा हूं, मुझे प्रेम में ही दफना दो। मैं एक ही साथ मोती भी हूं और उसका विक्रेता भी। अत्तार इत्रफरोश थे। एक दिन वे अपनी दुकान पर बैठे थे कि एक सूफी दरवेश आया।
अत्तार को लगा जैसे उसने भिक्षा पाने के लिए दरवेश का स्वांग बना रखा है, इसलिए उसे आगे बढ़ने के लिए कह दिया। तब दरवेश ने अपने फटे वस्त्रों को दिखलाते हुए कहा, संसार में केवल वही उसकी संपत्ति है। उसके लिए वहां से जाना अथवा इस संसार से कूच कर जाना बिल्कुल मुश्किल नहीं है। लेकिन वह अत्तार के लिए दुखी है कि वह अपनी इतनी संपत्ति को कैसे छोड़कर जाएगा।
अत्तार की जैसे आंख खुल गई, उसने उसी समय अपनी सारी धन- संपत्ति त्याग कर सूफी हो गए। अत्तार की मृत्यु की कहानी भी बड़ी विचित्र है। चंगेज खां ने फारस पर चढ़ाई की। अत्तार एक सैनिक के हाथ पड़ गए। वह उन्हें मारने ही जा रहा था कि एक अन्य सैनिक को उन पर दया आ गई। उसने काफी दव्य देकर अत्तार को खरीदना चाहा। लेकिन अत्तार ने अपने मालिक सिपाही को उतना मूल्य लेने से मना कर दिया और कहा कि उसे और अधिक कीमत मिल सकती है। इसके कुछ समय बाद एक दूसरे सैनिक ने उन्हें खरीदना चाहा। उसने देखा कि अत्तार बूढ़ा है, अतएव उनका मूल्य एक थैली घास से अधिक नहीं होगा। अत्तार ने उस सैनिक से जिसने उन्हें पकड़ रखा था, कहा कि वह उसे बेच दे क्योंकि वही उनकी पूरी कीमत है। इस बात से वह मालिक सैनिक इतना नाराज हुआ कि उसने ही अत्तार को मार डाला।

Thursday, November 13, 2008

'दक़ियानूसी राज'


शहर में राज का चर्चा दिखाई देता है
हर एक शक्स तड़पता दिखाई देता है
ज़माना चांद पे जाने की कर रहा है फ़िराक़
इसे तो सिर्फ़ मराठा दिखाई देता है
किसी को भी यहां ‘भईया’ से कोई बैर नहीं
इसी की आंख में कांटा दिखाई देता है
ज़माना जान चुका है परख चुका है इसे
ये शक्स खून का प्यासा दिखाई देता है
जहां में जब भी दरिंदों दी बात होती है
ये सैकड़ों में अकेला दिखाई देता है
लिबास इसका भले ही सफ़ेद हो लेकिन
ये शक्स सोच का काला दिखाई देता है
ये मुंबई की फ़िज़ाओं में ख़ौफ़ भर भर कर
बुराइयों का ओसामा दिखाई देता है
ये राजनीति का चक्कर है जान लो ‘भईया’
ये दकियानूस का चाचा दिखाई देता है
ये राज कौन है क्यों इसकी बात करते हो
ये ‘राज’नीति का प्यासा दिखाई देता है
भरेगा कब भला इसकी शरारतों का घड़ा
के इसका वक्त तो पूरा दिखाई देता है

---मसरूर अब्बास

Wednesday, November 5, 2008

"कोशिश तुम्हें जानने की"

(मीनाक्षी कंडवाल पेशे से टीवी जर्नलिस्ट है, लेकिन मन उनका एक कवि का है..उनकी एक कविता आप तक हम ला रहे हैं...जो अभी अधूरी है....मीनाक्षी चाहती थीं कि कविता जब पूरी हो तब सामने लाई जाए...लेकिन जिन महीन धागों से उन्होंने अपने ख्वाब बुने हैं...वो आपको देखनी ही चाहिए....इसी सोच के साथ हम ये लाइनें आप तक पहुंचा रहे हैं।)





एक कोशिश में जुटी हूँ आजकल
कोशिश तुम्हें जानने की,
समझने की,
और कभी कभी तो
परखने की भी......

वजह महज़ ये कि
तुम में है गज़ब का आकर्षण
जो तुमसे जुदा होने नहीं देता
जो तुमसे अलग कुछ सोचने नहीं देता


तुम मेरे प्रेमी नहीं हो
लेकिन प्रेमी से कम भी नहीं
लफ़्ज़ों की ज़ुबां में तुम 'ज़िंदगी' कहलाते हो
वक्त बेवक्त ज़ेहन में दस्तक दे जाते हो
बस इसीलिए
एक कोशिश में जुटी हूँ आजकल
हाँ कोशिश तुम्हें जानने की
'ज़िदंगी' को जानने की,
क्योंकि
साँसों के चलने से लेकर
सांसो के थमने तक
तुम्हारा विराट वैभवशाली अस्तित्व
अनंत अनुभवों की दास्तां कहता हैं

---मीनाक्षी कंडवाल

Friday, October 31, 2008

एक मां का रोना

मुंबई में एक लाल रंग की बस को सैकड़ों लोग घेरे हुए हैं.....उसमें एक अपराधी है जो राज ठाकरे को मारने आया है...भीड़ बस पर पत्थर फेंक रही है .... शीशों पर डंडे बरसा रही है...आखिर एक मराठी पर कोई हमला करने की सोच भी कैसे सकता है....कुछ वक्त बाद पुलिस आती है और एक शातिर (?) को गोली मार देती है। जो मारा जाता है वो राहुल राज है और जो जिंदा है वो राज। राहुल की मां पर जो बीती होगी .... उसकी कल्पना मियां मसरूफ ने की है। लाइव इंडिया न्यूज़ चैनल में entertainment desk में काम करते हैं और लिखते अच्छा हैं। आप भी देखिए--


गया तो ख़्वाब हज़ारों थे उसकी आंखों मे
जो आया लौट के तो ख्वाब बनके आया है..........................................!!!!
जिसे सुलाता था रातों को लोरियां देकर
जिसे चलाता था हाथों में उंगलियां देकर
कहां है वो जिसे आंखों का नूर कहता था
कहां है वो जिसे दिल का सुरूर कहता था...
मेरे मकान में तस्वीर उसकी आज भी है
दरीचे याद में डूबे हैं मां को आस भी है
तुम्हारी मां तेरे आने की राह तकती है
कहां हो तुम तेरे दीदार को सिसकती है...
तुम्हारी राखी है घर के अंधेरे ताख़ पे जो
बहन ने दी थी तुम्हें जिस वजह से याद है वो
उसी का कर्ज़ मेरे लाल तुम चुका जाते
तुम अपनी बहन के मिलने बहाने आ जाते...
कहां गए थे जो सीने में ज़ख़्म ले आए..
ये धब्बे खून के तुमने कहां पे हैं पाए
किसी ने तुमको बड़ी बेदिली से मारा है
तुम्हारी मां की भरी गोद को उजाड़ा है
सुना था देश के क़ानून में वफ़ा है बहोत़
सुना था इनकी अदालत में फैसला है बहोत
इन्हें कहो कि मेरा लाल मुझको लौटा दें
इन्हे कहो कि गुनहगार को सज़ा दे दें..
दुआएं देती थी तुझको जिये हज़ार बरस
दुआएं करती रही और गुज़र गया ये बरस
मगर ये क्या कि तुझे ये बरस न रास आया
तेरी उमीद भी की और तुझको ना पाया
कहां हो तुम मेरे नूर-ए-नज़र जवाब तो दो
कहां हो ऐ मेरे लख्त-ए-जिगर जवाब तो दो
कहां गए हो कि वीराना चारों सू है बहोत
कहां गए हो कि दुनिया में जुस्तजू है बहोत
कब कहां किसकी दुआओं के सबब आओगे
किस घड़ी ऐ मेरी उम्मीद के रब आओगे
कुछ तो बेचैनी मिटे मां की तेरे ऐ बेटा
ये बताने ही चले आओ कि कब आओगे...
तमाम शुद !!!!

--मसरूर

एक खुला खत आतंकवादियों के नाम


प्रिय महानुभावो,


इस खत का मकसद उन गलतफहमियों को दूर करना है जो हमारे और आपके बीच हैं। जयपुर, बेंगलुरु, अहमदाबाद, दिल्ली और अब गुवाहाटी - हाल के इन आतंकी हमलों से यह एकदम साफ है कि आपके दिलों में बेहद गुस्सा है।

गुस्सा हमारे दिलों में भी बहुत है। पिछले छह दशकों से हर पांचवें साल चुनाव के कुछ हफ्तों के दौरान हमारे इस गुस्से की वजहें भूख, बेरोजगारी, बिजली, सड़क आदि मुद्दों के रूप में सामने आती रही हैं। लेकिन, यह चर्चा फिर कभी। सच बताएं तो कटे-फटे शरीर, बिखरे खून की तस्वीरें हमें विचलित कर देती हैं। यह खून आम आदमी का होता है, जो हर पांच साल के बाद आने वाले उस एक दिन के लिए जीता है, जब वह लंबी कतारों में खड़े होकर शांति से वोट देने के लिए अपनी बारी का इंतजार करता है। बाकी के दिन वह गलियों में रेंगता रहता है, क्योंकि मुख्य सड़कें प्राय: उन लोगों के काफिलों के लिए रिज़र्व रहती हैं जिन्हें वोट देकर वह सत्ता में पहुंचाता है।

मुझे पक्का यकीन है कि आपलोग हमारे ही आसपास के होंगे। आप भी उन स्कूलों में से किसी में जरूर गए होंगे जिन पर इस देश को इतना नाज़ है। जहां, शिक्षक अगर हों तो वे ऊंघते होते हैं, फर्नीचर हो तो वह टूटा-फूटा होता है, खाना हो तो वह सड़ा-गला होता है और मकान हो तो वह जर्जर होता है। उससे पहले आप लोग भी हमारे बीच ही पल-बढ रहे होंगे, जब नफरत ने आपको जकड़ लिया और आप वह बन गए जो कि आज आप हैं। आश्चर्य नहीं कि आप हमारे बारे में इतनी सारी बातें इतने अच्छे से जानते हैं। लेकिन, मैं आपको एक जरूरी बात बताना चाहता हूं। आप गलत लोगों को निशाना बना रहे हैं। हम लोग नाचीज़ हैं। हमारे खून का कोई रंग नहीं। हमारी जिंदगी का भी कोई मोल नहीं है। जिस दिन हम अपना प्रतिनिधि चुन लेते हैं, बस उसी दिन से हम जीना छोड़ देते हैं। उसके बाद से हमारे प्रतिनिधि ही जीते हैं। हालांकि, हम मरते नहीं, क्योंकि हमें पांच साल के बाद फिर वोट देना होता है और इस दौरान तरह-तरह के टैक्स भी चुकाते रहना होता है। हमारी कोई सुरक्षा नहीं, लेकिन हमारे प्रतिनिधि चौबीसो घंटे कड़ी सुरक्षा में रहते हैं।

हम अपना प्रतिनिधि इसलिए चुनते हैं ताकि वे हमारी शिकायतें सुन सकें। अगर आपको हम आम लोगों से कोई शिकायत है तो कृपया उनसे मुखातिब हों। उनका पता? सबसे आलीशान इलाकों की सबसे आलीशान इमारतें।

अग्रिम धन्यवाद

एक आम आदमी

--नवभारत टाइम्स से साभार

Monday, October 27, 2008

गुस्सा थूकिये पाटिल साहब


पूज्य आर आर पाटिल साहब


पहली बार आपको लिख रहा हूं..इसलिए संबोधन में कौनो गुस्ताखी भई हो..त माफ करिएगा...लेकिन हम सोचे कि पूज्य तो आप हइयै हैं ... त ओहीं से सुरू करते हैं... आपको टीवी चैनल पर बड़ा गुस्सा में देखे आज...बहुत फायर हो रहे थे आप...का बात रही पाटिल साहब...राहुलवा प गुस्सा गए का ?...पागल है..अरे भाई, मारना ही था तो लाठी से मारता 10-20 बिहारियों के झुंड में आकर...जहां पा जाता मराठियों को वहीं मारता...उसी तरह जैसे मराठी मानुस बिहारियों को पीटे थे...एकदम सिवाजी का स्टाइल में...अचानक धोखे से सब काम ! लेकिन ओ जानता नहीं न था आप सब के बारे में कि कइसे लड़ते हैं आप सब...पत्ते नहीं था ससुरों को....लेकिन पाटिल साहब , ई मराठी मानुस अपनी ही ज़मीन पर आज तक कुछ कर काहे नहीं पाया...??? बस एक्के बात सीखा है ???? धोखे से मारना...पढ़ लिखकर नौकरी खोजने आए लोगों को ईंटा-पत्थर मारना ? लेकिन तब आपका इ नियम कहां गया था पाटिल साहब--कि गोली का बदला गोली से देंगे और पुलिस ने सब ठीक किया है.....ऐं..??? ई बयान के लिए आदेस मिला था का आपको-अरे ओही अपने पवार साहब से ? आपके गाडफादर भाई ?? अरे मरद आदमी हैं त सिवाजी की तरह नही...जयपरकास नारायण की तरह लड़िये न भाई....बिना लाठी के....औ राज ठाकरे के गुंडों को तो संभाल नहीं पाए लेकिन बिहारी भइयों पर अपना नियम चला दिए ? औ कहां तक लड़ियेगा बिहारियों और यूपी के भइयों से....आईएएस का तैयारी करता है भाई लोग... तो रेलवई का बाबू त बनबे करेगा न भाई कम से कम। आप कर लीजिये बराबरी उसका .... लेकिन उसकी बजाय आप मारपीट पर उतारू हैं...असावधान लोगों पर लाठी ???


जादा नहीं लिखेंगे..काहेकी हम सब ऊ लोग हैं जो कम में जादा बात करै वाले लोग हैं...लिखना थोर,समझना ढेर....आप भी समझिये....इ कुरसी वुरसी जादा दिन नहीं रहता.....कल को जब गद्दी पर से उतार दिये जाइएगा न...तो इहे पुलिस वाला लाठी मारेगा आपको ....ध्यान रखियेगा


आपैका सुभेच्छु

Saturday, October 25, 2008

मैं भी मराठी मानुस हूं...लेकिन..


मंगलवार को महाराष्ट्र में करीब 202 एसटी बसें , 350 टैक्सियां , 8 ऑटो , 115 बेस्ट बसें , 3 ट्रक और 4 प्राइवेट गाड़ियों को या तो जला दिया गया या फिर बुरी तरह से तोड़ दिया गया। इन्हीं क्षतिग्रस्त गाड़ियों में से एक मेरी गाड़ी है। राज ठाकरे की तरफ से दावा किया जाता है कि यह सब मराठी मानुस के लिए किया जा रहा है। चाहे कुछ भी क्यों न हो , यह बात तो तय है कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस) के नेता राज ठाकरे को आम महाराष्ट्रियन से तो कोई मतलब नहीं है। मुझे तो लगता है कि राज को खुद भी अंदाजा नहीं है कि उनकी लड़ाई किसके लिए है। राज ठाकरे की गिरफ्तारी की खबर के साथ ही मुझे अंदाजा हो गया था कि पूरा दिन जबरदस्त तरीके से हंगामाखेज़ होने वाला है। लेकिन एक पत्रकार और एक महाराष्ट्रियन होने के नाते मुझे पूरा यकीन था कि मैं पूरी तरह से सुरक्षित हूं। मुझे जरा भी अंदाजा नहीं था कि महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के ' ऐंटी नॉर्थ इंडियन ' आंदोलन का शिकार मैं बनूंगा। लेकिन मेरा यह विश्वास घर से ऑफिस जाते वक्त पलभर में ही टुकड़े-टुकड़े हो गया। मंगलवार को जैसे ही मैं अरुण कुमार वैद्य रोड से माहिम की तरफ मुड़ा , अचानक ही 4 लोग मेरी कार के सामने आ गए। मुझे लगा कि वे लोग शायद लिफ्ट मांगने के लिए रोक रहे हैं , क्योंकि रास्ते में कोई टैक्सी या गाड़ी नहीं दिखाई दे रही थी। मुझे लगा कि वे लोग किसी साधन के अभाव में मुझसे लिफ्ट लेने की गुजारिश करेंगे। लेकिन अगले ही पल मेरी इस आशावादिता की धज्जियां उड़ गईं। बिना कुछ जानने की कोशिश किए उनमें से दो लोगों ने मेरी कार के अगले शीशे पर बड़े-बड़े पत्थर दे मारे। इस दौरान तीसरा शख्स मेरी कार का पिछला शीशा तोड़ने में लगा था। मुझे आतंकित किया चौथे शख्स ने , मेरे कुछ भी कहने से पहले ही उसने मेरे ऊपर एक जलता हुआ टायर फेंक दिया। कार के अंदर ही भस्म हो जाने के डर से मेरे रोंगटे खड़े हो गए और मैं वहां से भाग खड़ा हुआ और तभी रुका जब मुझे सेंट माइकल चर्च के पास एक पुलिसवाला दिखाई दिया। फिर पुलिसवालों ने अपना पुलिसिया रवैया दिखाते हुए मेरी शिकायत दर्ज करने से पहले माहिम और बांद्रा पुलिस स्टेशनों के बीच दौड़ाया। लेकिन मेरी दिक्कत यह नहीं है कि मेरी शिकायत दर्ज क्यों नहीं हुई। मेरी कार भी कुछ दिनों में रिपेअर होकर सड़क पर दौड़ने लगेगी। मेरी असली दिक्कत है मेरा विश्वास , मेरा भरोसा जो अब टुकड़े-टुकड़े हो चुका है ! उस दिन छिन्न-भिन्न हो चुके मेरे विश्वास का क्या होगा ? मुंबई मिरर को दिए एक इंटरव्यू में राज ठाकरे ने कहा था कि उनके लोग किसी भी किस्म आंदोलन से पहले याचना करते हैं , वे कोई कार्रवाई करने से पहले चेतावनी या ज्ञापन देते हैं। उस दिन मेरी कार तोड़ने से पहले क्या किसी ने मुझसे पूछा ? मैंने मराठी मानुस से कौन सा अन्नाय किया था ? मैं खुद मराठी मानुस हूं , मैं यहीं पैदा हुआ और मेरी परवरिश यहीं हुई। मेरे पैरंट्स , मेरे पुरखे सभी मराठी हैं। मैं मराठी बोलता हूं , मराठी पढ़ता हूं और मराठी लिखता हूं। मैंने मराठी मीडियम के स्कूल में ही पढ़ाई की है , जैसा कि राज के अंकल (बाल ठाकरे) ने दशकों पहले ' आदेश ' दिया था (यह अलग बात है कि उनके खुद के पोते मराठी मीडियम के स्कूल में नहीं पढ़ते)। और तो और , बैंक के चेक पर मैं हस्ताक्षर भी मराठी में ही करता हूं। मैंने किसी महाराष्ट्रियन की नौकरी नहीं हड़पी।
दीपक लोखंडे
सिटी एडीटर, मुंबई मिरर
(नवभारत टाइम्स से साभार)

Friday, October 24, 2008

राज ठाकरे की चिंता जायज है, तरीका गलत

" नीम का पत्ता कड़वा है, राज ठाकरे ... ड़वा है" (सपा की एक सभा में यह कहा गया और इसी के बाद यह सारा नाटक शुरू हुआ)। यह नारा मीडिया को दिखाई नहीं दिया, लेकिन अमर सिंह को "मेंढक" कहना और अमिताभ पर शाब्दिक हमला दिखाई दे गया। अबू आजमी जैसे संदिग्ध चरित्र वाले व्यक्ति द्वारा एक सभा में दिया गया यह वक्तव्य - मराठी लोगों के खिलाफ़ जेहाद छेड़ा जाएगा, जरूरत पड़ी तो मुजफ़्फ़रपुर से बीस हजार लाठी वाले आदमी लाकर रातोंरात मराठी और यह समस्या खत्म कर दूँगा - भी मीडिया को नहीं दिखा (इसी के जवाब में राज ठाकरे ने तलवार की भाषा की बात की थी)। लेकिन, मीडिया को दिखाई दिया और उसने पूरी दुनिया को दिखा दिया बड़े-बड़े अक्षरों में "अमिताभ के बंगले पर हमला ..." । बगैर किसी जिम्मेदारी के बात का बतंगड़ बनाना मीडिया का शगल हो गया है।

अमिताभ यदि उत्तरप्रदेश की बात करें तो वह ' मातृप्रेम ' , लेकिन यदि राज ठाकरे महाराष्ट्र की बात करें तो वह सांप्रदायिक और संकीर्ण ... है ना मजेदार!!! मैं मध्यप्रदेश में रहता हूँ और मुझे मुम्बई से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मीडिया, सपा और फ़िर बिहारियों के एक गुट ने इस मामले को जैसा रंग देने की कोशिश की है, वह निंदनीय है। समस्या को बढ़ाने, उसे च्यूइंगम की तरह चबाने और फ़िर वक्त निकल जाने पर थूक देने में मीडिया का कोई सानी नहीं है। सबसे पहले आते हैं इस बात पर कि "राज ठाकरे ने यह बात क्यों कही?" इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जबसे (अर्थात गत बीस वर्षों से) दूसरे प्रदेशों के लोग मुम्बई में आने लगे और वहाँ की जनसंख्या बेकाबू होने लगी तभी से महानगर की सारी मूलभूत जरूरतें (सड़क, पानी, बिजली आदि) प्रभावित होने लगीं, जमीन के भाव अनाप-शनाप बढ़े जिस पर धनपतियों ने कब्जा कर लिया। यह समस्या तो नागरिक प्रशासन की असफ़लता थी, लेकिन जब मराठी लोगों की नौकरी पर आ पड़ी (आमतौर पर मराठी व्यक्ति शांतिप्रिय और नौकरीपेशा ही होता है) तब उसकी नींद खुली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
वक्त के मुताबिक खुद को जल्दी से न ढाल पाने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई स्थानीय मराठी लोगों ने, उत्तरप्रदेश और बिहार से जनसैलाब मुम्बई आता रहा और यहीं का होकर रह गया। तब पहला सवाल उठता है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से लोग पलायन क्यों करते हैं? इन प्रदेशों से पलायन अधिक संख्या में क्यों होता है दूसरे राज्यों की अपेक्षा? मोटे तौर पर साफ़-साफ़ सभी को दिखाई देता है कि इन राज्यों में अशिक्षा, रोजगार उद्योग की कमी और बढ़ते अपराध मुख्य समस्या है, जिसके कारण आम सीधा-सादा बिहारी यहाँ से पलायन करता है और दूसरे राज्यों में पनाह लेता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से आए हुए लोग बेहद मेहनती और कर्मठ होते हैं (हालांकि यह बात लगभग सभी प्रवासी लोगों के लिए कही जा सकती है, चाहे वह केरल से अरब देशों में जाने वाले हों या महाराष्ट्र से सिलिकॉन वैली में जाने वाले)। ये लोग कम से कम संसाधनों और अभावों में भी मुम्बई में जीवन-यापन करते हैं, लेकिन वे यह जानते हैं कि यदि वे वापस बिहार चले गए तो जो दो रोटी यहाँ मुम्बई में मिल रही है, वहाँ वह भी नहीं मिलेगी।
इस सब में दोष किसका है? जाहिर है, उन्हीं का, जिन्होंने गत पच्चीस वर्षों में इस देश और इन दोनो प्रदेशों पर राज्य किया। यानी कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी पार्टियाँ। सवाल उठता है कि मुलायम, मायावती, लालू जैसे संकीर्ण सोच वाले नेताओं को उप्र-बिहार के लोगों ने जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया? क्यों नहीं इन लोगों से जवाब-तलब हुए कि तुम्हारी घटिया नीतियों और लचर प्रशासन की वजह से हमें मुंबई पलायन करना पड़ता है? क्यों नहीं इन नेताओं का विकल्प तलाशा गया? क्या इसके लिए राज ठाकरे जिम्मेदार हैं? आज उत्तरप्रदेश और बिहार पिछड़े हैं, गरीब हैं, वहाँ विकास नहीं हो रहा तो इसमें किसकी गलती है? क्या कभी यह सोचने की और जिम्मेदारी तय करने की बात की गई? उल्टा हो यह रहा है कि इन्हीं अकर्मण्य नेताओं के सम्मेलन मुम्बई में आयोजित हो रहे हैं, उन्हीं की चरण वन्दना की जा रही है जिनके कारण पहले उप्र-बिहार और अब मुम्बई की आज यह हालत हो रही है।
उत्तरप्रदेश का स्थापना दिवस मुम्बई में मनाने का तो कोई औचित्य ही समझ में नहीं आता। क्या महाराष्ट्र का स्थापना दिवस कभी लखनऊ में मनाया गया है? लेकिन अमरसिंह जैसे धूर्त और संदिग्ध उद्योगपति कुछ भी कर सकते हैं और फ़िर भी मीडिया के लाड़ले (?) बने रह सकते हैं। मुम्बई की एक और बात मराठियों के खिलाफ़ जाती है, वह है भाषा अवरोध न होना। मुम्बई में मराठी जाने बिना कोई भी दूसरे प्रांत का व्यक्ति कितने भी समय रह सकता है। यह स्थिति दक्षिण के शहरों में नहीं है, वहाँ जाने वाले को मजबूरन वहाँ की भाषा, संस्कृति से तालमेल बिठाना पड़ता है।
कुल मिलाकर सारी बात, घटती नौकरियों पर आ टिकती है। महाराष्ट्र के रेलवे भर्ती बोर्ड का विज्ञापन बिहार के अखबारों में छपवाने का क्या तुक है? एक तो वैसे ही पिछले साठ सालों में से चालीस साल बिहार के ही नेता रेलमंत्री रहे हैं। रेलें बिहारियों की बपौती बन कर रह गई हैं (जैसे अमिताभ सपा की बपौती हैं) मनचाहे फ़्लैग स्टेशन बनवा देना, आरक्षित सीटों पर दादागिरी से बैठ जाना आदि वहाँ मामूली(?) बात समझी जाती है। हालांकि यह बहस का एक अलग विषय है, लेकिन फ़िर भी यह उल्लेखनीय है कि बिहार में प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं, रेल तो उनके "घर" की ही बात है, लोग भी कर्मठ और मेहनती हैं, फ़िर क्यों इतनी गरीबी है और पलायन की नौबत आती है, समझ नहीं आता। और इतने स्वाभिमानी लोगों के होते हुए बिहार पर राज कौन कर रहा है? शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, तस्लीमुद्दीन, आनन्द मोहन आदि। ऐसा क्यों?
एक समय था जब दक्षिण भारत से भी पलायन करके लोग मुम्बई आते थे, लेकिन उधर विकास की ऐसी धारा बही कि अब लोग दक्षिण में बसने को जा रहे हैं। ऐसा बिहार में क्यों नहीं हो सकता? समस्या को दूसरे तरीके से समझने की कोशिश कीजिए ... यहाँ से भारतीय लोग विदेशों में नौकरी करने जाते हैं, वहाँ के स्थानीय लोग उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं। हमारी नौकरियाँ छीनने आए हैं ऐसा मानते हैं। यहाँ से गए हुए भारतीय बरसों वहाँ रहने के बावजूद भारत में पैसा भेजते हैं, वहाँ रहकर मंदिर बनवाते हैं, हिन्दी कार्यक्रम आयोजित करते हैं, स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं। जब भी उन पर कोई समस्या आती है वे भारत के नेताओं का मुँह ताकने लगते हैं, जबकि इन्हीं नेताओं के निकम्मेपन और घटिया राजनीति की वजह से लोगों को भारत में उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिल सकी थी, यहाँ तक कि जब भारत की क्रिकेट टीम वहाँ खेलने जाती है तो वे जिस देश के नागरिक हैं उस टीम का समर्थन न करके भारत का समर्थन करते हैं, वे लोग वहाँ के जनजीवन में घुलमिल नहीं पाते, वहाँ की संस्कृति को अपनाते नहीं हैं, क्या आपको यह व्यवहार अजीब नहीं लगता? ऐसे में स्वाभाविक रूप से स्थानीय लोग उनके खिलाफ़ हो जाते हैं। तो इसमें आश्चर्य कैसा? हमारे सामने फ़िजी, मलेशिया, जर्मनी आदि कई उदाहरण हैं, जब भी कोई समुदाय अपनी रोजी-रोटी पर कोई संकट आता देखता है तो वह गोलबन्द होने लगता है। यह सामान्य मानव स्वभाव है।
फ़िर से रह-रह कर सवाल उठता है कि उप्र-बिहार से पलायन होना ही क्यों चाहिए? इतने बड़े-बड़े आंदोलनों का अगुआ रहा बिहार इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करके बिहार को खुशहाल क्यों नहीं बना सकता? खैर ... राज ठाकरे ने हमेशा की तरह "आग" उगली है और कई लोगों को इसमें झुलसाने की कोशिश की है। हालांकि इसे विशुद्ध राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है और जैसा कि तमाम यूपी-बिहार वालों ने अपने लेखों और ब्लॉग के जरिए सामूहिक एकपक्षीय हमला बोला है उसे देखते हुए दूसरा पक्ष सामने रखना आवश्यक था। इस लेख को राज ठाकरे की तारीफ़ न समझा जाए, बल्कि यह समस्या का दूसरा पहलू (बल्कि मुख्य पहलू कहना उचित होगा) देखने की कोशिश है। शीघ्र ही पुणे और बंगलोर में हमें नए राज ठाकरे देखने को मिल सकते हैं।


---सुरेश चिपलूनकर
(नवभारत टाइम्स से साभार)




Wednesday, October 22, 2008

नेहा की मदद करना चाहेंगे आप ?


दुनिया भर में छाई आर्थिक मंदी का कहर दिल्ली के एक परिवार पर ऐसा बरपा कि उनकी खुशियां छिन गईं। हमने इसी ब्लॉग में नेहा की कहानी छापी थी.....उसे पढ़कर बहुत से लोगों ने हमसे पूछा है कि वो इस परिवार की मदद करना चाहते हैं...लेकिन कैसे करें...किससे संपर्क साधें।

हम ऐसे लोगों के लिए नेहा की नानी का फोन नम्बर दे रहे हैं--9811544027....नेहा की नानी का बैंक एकाउंट भी हम आपको मुहैया करा रहे हैं...State Bank of India, Branch- Dwarka, Sector-16 (Delhi), Maya Devi, A/c No. 30278913726. branch code- 04384.
आप अगर बैंक में पैसे जमा करवाना चाहते हैं तो पहले नेहा या उसकी नानी से फोन पर बात कर लें....फिर जैसे भी इस होनहार बच्ची और उसकी नानी की मदद करना चाहें..करें।


हम आपको बता दें कि नेहा, पश्चिमी दिल्ली के विकासपुरी इलाके में कोलंबिया स्कूल में नौवीं की छात्रा है .... और आठवीं में उसके 95 फीसदी नंबर आए हैं.....यानी पढ़ने में वो काफी अच्छी है....इस परिवार को इस वक्त रहने का ठिकाना चाहिए। जिस किराए के घर में वे रह रहे हैं, वह किराया न देने के कारण उन्हें जल्द ही खाली करना पड़ेगा। अभी तक उन्हें किसी से कोई बड़ी मदद नहीं मिली है। हां, मदद के लिए लोगों के फोन जरूर आ रहे हैं। पिछले दो-तीन दिनों में पांच सौ व हजार रुपए देकर कुछ लोगों ने उनकी मदद की। लेकिन ये नाकाफी है, क्योंकि अब तक कुल मदद तीन-चार हजार रुपए की ही हो पाई है। नेहा की नानी के मुताबिक, अब तक किसी बड़े एनजीओ ने उनसे कोई संपर्क नहीं किया है। दुख की इस घड़ी में नेहा के पिता के परिवारवालों ने भी उनकी कोई सुध नहीं ली। एक निजी चैनल से उनके पास फोन जरूर आया था, जिसके तहत नेहा को गोद लेने की पेशकश की गई थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। वह अपनी नातिन को अपने पास ही रखना चाहती हैं। मायादेवी नेहा की पढ़ाई जारी रखना चाहती हैं। इसके लिए उन्होंने लोगों से मदद की अपील की है।

कुछ कर गुज़र जाना है

अड़चनों की आंच में जलते रहें हम, अड़चनों को पार भी करते रहें हम।
कौन मुश्किलों से मानता हार है, ज़िंदगी तो क़ुदरत का उपहार है।

चलना ही है, बढ़ना ही है, बस पार उतर जाना है।
कुछ कर गुज़र जाना है।

हर तरफ है ताकत अंधेरे की, बात होती नहीं अब सवेरे की।
वो नोंच रहे हैं हमारा आशियाना, जिनको ज़िम्मा है उसको बनाना।

है हर तरफ नाउम्मीदी का आलम, मगर उम्मीदों का दीया जलाना है।
कुछ कर गुज़र जाना है।

लूट मची है हर तरफ हर जगह, इंसानियत को मिलती नहीं कहीं जगह।
कांटे सहें हम फूल की तलाश में, बढ़ते रहें उम्मीद और आस में।

चल पड़े हैं मंज़िल के वास्ते, खुद से खुद का हौसला बढ़ाना है।
कुछ कर गुज़र जाना है।

हैं देश के दुश्मन कई, कुछ भेड़िये भी भेड़ों की खाल में।
मासूम भी जवान भी, फंसते रहे सब इनकी जाल में।

नियमों का नीतियों का, कैसा ये अमली जामा है?
क्या यही देश की तरक्की का सफरनामा है?

अंतर्मन की आवाज़ पर क़दम तुम्हें बढ़ाना है।

कुछ कर गुज़र जाना है।

अमर आनंद

Saturday, October 18, 2008

बेटी, मैंने बहुत संघर्ष किया, अब हिम्मत हार रही हूं


दुनिया भर में जारी आर्थिक मंदी की राजधानी में पहली शिकार बनी एक मां जिसकी मौत के बाद गुमसुम हो गई है 13 बरस की नेहा। नीलम तिवारी (35) की 13 साल की बेटी नेहा अब गुमसुम है। 10 साल पहले आगरा में हुए ट्रेन हादसे में पिता को खोने के बाद अब उसकी मां नीलम भी नहीं रही। नीलम ICICI बैंक से लोन दिलवाने का काम करती थी...बदले में उसे कुछ कमीशन मिल जाया करता था...जिससे वो घर चलाती थी। घर में एक बूढ़ी मां हैं और है घर की जान-13 बरस की नेहा...जिसे मां की मौत ने गुमसुम कर दिया है। उसने अपनी मां को पंखे से झूलते हुए देखा....इसलिए अब रातों को जग कर चीखने भी लगती है। पिछले तीन महीने से नेहा की मां नीलम आईसीआईसीआई बैंक से एक भी लोन नहीं दिलवा पाई थी-नतीजतन दो दिन पूरा परिवार भूखा रहा और फिर एक दिन....नीलम को छुटकारे का एक रास्ता सूझा-उसने फांसी का फंदा बनाया और झूल गई।
कहानी के असली दर्द से आपकी पहचान कराना अभी बाकी है। इस परिवार में अब न तो कोई पुरुष है और न ही कोई कमाने वाला। मौके से पुलिस को तीन स्यूसाइड नोट मिले। बेटी नेहा को लिखे नोट में नीलम ने लिखा 'मैंने अब तक बहुत संघर्ष किया है। अब हिम्मत हार रही हूं। बेटा, आगे का सफर तुम्हें खुद तय करना होगा'। बूढ़ी मां को लिखे नोट में उसने माफी मांगते हुए लिखा कि 'दूर-दूर तक कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा। आपकी स्थिति भी ऐसी नहीं है कि कोई मदद कर सकें। मेरे पास न तो किराया देने के पैसे हैं और न खाने के। मेरे घर का सामान बेचकर मेरी बेटी की पढ़ाई का कम से कम यह साल जरूर पूरा करा देना'। तीसरा नोट नीलम ने पुलिस को लिखा और अपनी मौत का जिम्मेदार आर्थिक तंगी को बताया। दिल्ली के द्वारका इलाके के सेवक पार्क में रहने वाली माया शर्मा के घर की हालत देखकर किसी भी संवेदनशील इंसान का दिल पिघल सकता है। घर में माया, उनकी अविवाहित बेटी और नेहा ही हैं। कमाने वाला कोई नहीं है.....नेहा पढ़ाई में बहुत होशियार है... आठवीं क्लास में उसके 95 फीसदी नंबर आए थे। लेकिन अब वो इस स्थिति में नहीं हैं कि उसकी पढ़ाई जारी रखवा सकें। उन्हें उम्मीद है कि कोई गैर सरकारी संगठन नेहा की मदद करने आगे आएगा।
कानपुर की रहने वाली नीलम की शादी 1994 में आगरा के रहने वाले दिलीप तिवारी से हुई थी। 1998 में आगरा में हुए ट्रेन हादसे में दिलीप की मौत हो गई। नीलम ने दूसरी शादी नहीं की और एक साल की बेटी को साथ लेकर मां और बहन के साथ दिल्ली आ गई। माया ने बताया कि उन्होंने नीलम से कई बार शादी करने के लिए कहा था, लेकिन वह तैयार नहीं होती थी। पहले वह पीरागढ़ी में प्राइवेट कंपनी में नौकरी करती थी। एक साल से उसने आईसीआईसीआई बैंक से लोन दिलवाने का काम शुरू किया था। लेकिन आर्थिक मंदी ने रोजी-रोटी का यह आसरा भी खत्म कर दिया।
लेकिन चिंता का विषय कुछ और है...दिल्ली के जामिया नगर में मारे गये आतंकियों के बचाव में बुद्धिजीवियों ने देश भर में जम कर प्रदर्शन किए थे। ऐसे मौकों पर कहां हैं वो....लाख टके का सवाल यही है। मंदी पर लंबे और उबाऊ व्याख्यान देने वाले , दाढ़ीयुक्त चेहरे वाले बुद्धिजीवी , जो अगले दिन अखबारों में अपनी फोटो खोजते हों .... कहां हैं ? किसी पुलिस इंस्पेक्टर की शहादत पर सवाल उठाने वाले बेहया नेताओं की जमात अब क्यों नहीं बोलती.....और तो और अखबार और टीवी वाले इसे स्टोरी क्यों नहीं मानते...सोचने वाली बात यही है।

Friday, October 17, 2008

सचिन तेंदुलकर का पहला इंटरव्यू--उम्र 15 साल

सचिन का ये इंटरव्यू फिल्म अभिनेता टॉम अल्टर ने किया था...साल 1989 में। ये तस्वीर उस वक्त की है जब सचिन टेस्ट टीम में नहीं आए थे..मुंबई की रणजी ट्रॉफी टीम के लिए खेलना शुरू ही किया था। गुजरात के खिलाफ मुंबई में 15 बरस की उम्र में सचिन के बल्ले ने पहले मैच में ही 100 रन उगले। लोग जब तक उसे समझ पाते ...वो टेस्ट टीम में था।

Thursday, October 9, 2008

पापा, जागते क्यों नहीं...


वो जगा रही थी
अपने पिता को
जो सो गए थे मौत की नींद
उसकी उंगली थाम ले गए थे
उसे कराने मां के दर्शन
जोधपुर के उस मंदिर में
जो है सबसे सिद्ध
जहां मांगने से पूरी होती है
सभी मुरादें पर,
यह क्या
उस मासूम से छिन गया
उसका बचपन छूट गया
वो दामन जिसे थाम चलना था
जग के पथरीले रास्तों पर
बार बार वो जगाती रही
अपने पिता को कहती रही
उठो पापा मंदिर जाना है..
रोती रही..सुबकती रही,
सोचती रही आज क्यों नहीं चुप कराते पापा
गोद में लेकर पुचकारते क्यों नही
पर लाडो के पापा
जागते कैसे वो तो सो चुके थे मौत की नींद
बनकर उस भगदड़ का हिस्सा
जो हुई जोधपुर के मंदिर में
पर वो न मानी झकझोरती रही,
उठाती रही अपने पापा को...

---- नवभारत टाइम्स में छपी शिखा सिंह की कविता

Thursday, October 2, 2008

मारा या बचाया ?


वो सिर झुकाये चुपचाप ज़मीन पर बैठा था। थानों में यूं भी अपना अपराध स्वीकार कर लेने वालों को स्टूल या कुर्सी देने की प्रथा कहां है....वो तो रसूख वालों या फिर इलाके के गुंडे बदमाशों के लिए होती है। खैर- ज़मीन पर बैठा 24 साल का वो शख्स बुत की तरह गुमसुम था। उसने अपनी दो दिन की बच्ची का गला घोंट कर मार डाला था। जानते हैं दो जून की रोटी कमाने के लिए करता क्या था वो-गुब्बारे बेचता था...उन बच्चों के लिए जिन्हें खाने को रोटी मिल जाती है। लेकिन अपनी दो दिन की बच्ची को वो भूख और गरीबी के भरोसे इस दुनिया में नहीं लाना चाहता था । उसने ऐसा क्यों किया...इसका जवाब ...पुरुलिया के पुलिस स्टेशन में बैठे इस आदमी ने ये कह कर दिया कि-- 30 रुपये रोज़ कमाने वाला... बीवी , मां और तीन बेटियों को कैसे पालता। जो उसने नहीं कहा वो ये कि कैसे वो ज़माने को सौंप देता बेटी को...आज नहीं तो कल भूखे समाज की शिकार तो होना ही था उसे ....इसलिए उसे मारकर असल में मैंने खुद को और अपने परिवार को बचाया है।

(टिकर पर आई एक ख़बर...जिसे बस मैंने कुछ कपड़े पहना दिए)

Tuesday, September 30, 2008

मैंने भी देखा सपना

आंखों में सपने लेकर तो हर कोई यहां आता है
पर क्या उन सपनों को वो सच कर पाता है...
देखा है एक सपना मैंने भी
उड़ रही हूं आसमान में मैं भी
डर लगता है कहीं ये सपना ही गुम ना हो जाए
डर लगता है कहीं ये वक्त ही ना थम जाए
आसमान में उड़ान भरना आसान नहीं
पतंगे की तरह सूरज की ओर बढना आसान नहीं
लेकिन कोशिश करना चाहती हूं मैं भी
पंख नहीं तो क्या हुआ हौंसलों से उड़ान भरूंगी मैं भी
नहीं रोक पाओगे मुझे
बनूंगी इतनी मज़बूत
बनूंगी इतनी शूर
नारी हूं तो क्या हुआ
ज़माने से आंखे मिलाउंगी मैं भी....


पल्लवी जैन
--(पल्लवी जैन एक टीवी चैनल-लाइव इंडिया में रिपोर्टर हैं...लोगों की अनुभूतियां इन्हें बहुत पास से देखने को मिलती हैं....कभी कभी कागज़ पर उतरीं तो कविता बन जाती हैं...)

Saturday, September 27, 2008

काँच की बरनी और दो कप चाय - एक बोध कथा


जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है, सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है , और हमें लगने लगता है कि दिन के चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं, उस समय ये बोध कथा , "काँच की बरनी और दो कप चाय" हमें याद आती है ।दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले


हैं...उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी (जार) टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची... उन्होंने छात्रों से पूछा - क्या बरनी पूरी भर गई ? हाँ... आवाज आई...फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये, धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी , समा गये, फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्या अब बरनी भर गई है, छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ.. कहा अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया, वह रेत भी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई, अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे...


फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा, क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना ? हाँ.. अब तो पूरी भर गई है.. सभी ने एक स्वर में कहा..सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली, चाय भी रेत के बीच में स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई...प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया - इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो... टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान, परिवार, बच्चे, मित्र, स्वास्थ्य और शौक हैं, छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी, कार, बडा़ मकान आदि हैं, और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव, झगडे़ है..अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती, या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते, रेत जरूर आ सकती थी...ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है...यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा... मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है ।

अपने बच्चों के साथ खेलो, बगीचे में पानी डालो , सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ, घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको, मेडिकल चेक- अप करवाओ..टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो, वही महत्वपूर्ण है... पहले तय करो कि क्या जरूरी है... बाकी सब तो रेत है..छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे..


अचानक एक ने पूछा, सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि "चाय के दो कप" क्या हैं ?प्रोफ़ेसर मुस्कुराये, बोले.. मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया... इसका उत्तर यह है कि, जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे, लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।


विकास कुमार

लाइव इंडिया

Saturday, September 20, 2008

अब आगे क्या होगा ?

मोहन चंद शर्मा पंचतत्व में विलीन हो गये। लेकिन उनकी मौत कई सवाल छोड़ कर गई है। उन पर चर्चा बाद में करेंगे लेकिन अभी ये कि जो पकड़े गए ...उनका क्या होगा। उन पर अदालतों में मुकदमें चलेंगे...पहले छोटी अदालत फिर उससे बड़ी...फिर उससे बड़ी...और फिर सबसे बड़ी। फिर कोई देश का नामी गिरामी वकील ..जिसके लिए रुपया पैसा, शोहरत , ताकत अब कोई नई चीज़ नहीं रही..आगे आएगा और कहेगा मैं लड़ूंगा ये केस। वो अदालतों में साबित करेगा कि सबूत नाकाफी हैं। फिर सात-आठ सालों में फैसला आएगा..जिसमें इस पूरी साज़िश में शामिल लोगों में से ज्यादातर को सबूतों के अभाव में छोड़ दिया जाएगा। वो फिर घूमेंगे...जामिया या वैसे ही किसी इलाके की बंद गलियों में हादसों की तैयारी करते। अगर एकाध को ज़िम्मेवार मान भी लिया गया तो ज़्यादा से ज़्यादा फांसी की सज़ी होगी। अच्छा...फिर क्या होगा ..फिर सरकार को मुसलमानों के वोट की याद आएगी...लगेगा ..चुनाव सिर पर हैं..फांसी अभी ठीक नहीं ...सो , फांसी पाए आतंकवादी को सुविधा दी जाएगी कि वो राष्ट्पति से माफी की गुहार करे...दो-चार महीने उसमें लग जाएंगे...फिर राष्ट्रपति के दफ्तर में उसकी बारी आते महीने और फिर कई साल लग जाएंगे। इस बीच देश के गृहमंत्री का बयान आएगा कि फांसी दी जाए या नहीं-इस पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए। गृहमंत्री को भी ये सदविचार इसी मौके पर सूझने थे। खैर...फांसी पर कोई फैसला हो पाए..इससे पहले ही कई और धमाके हो जाएंगे...देश उनमें फिर मसरूफ हो जाएगा। तब तक अगला चुनाव आ जाएगा...और दोस्तों....तब..हम सब फिर बेशर्मी ओढ़ लेंगे .... वोट देने और उगाहने खुद सड़कों पर चलेंगे...और अगला -पिछला सब भूल जाएंगे।

Monday, September 15, 2008

गॉन आर द डेज़

स्कूल जाने की जब तक उम्र होती है .... स्कूल जाना कड़वी दवा लगता है...लेकिन बाद में वो दिन खूब याद आते हैं। मन कहता है कि ज़िंदगी एक टेप होती है और हम उसे रिवाइंड कर लेते। लेकिन फिर...ज़िंदगी यही है ... जो बीत गया..वो वापस नहीं आ सकता। अगर कोई मुझसे पूछे कि ज़िंदगी में कौन सी चीज़ है जो मैं चालीस की उम्र में भी मिस करता हूं...मैं कहूंगा ...मेरे स्कूल के दिनों के फोटोग्राफ...हर क्लास का ग्रुप फोटो था...मेरी मां ने बहुत सहेज़ कर रखा था...लेकिन तीन दशकों से संभाल कर रखे गए फोटोग्राफ जब दो बरस पहले सीलन के शिकार हो गए तो सच मानिए ...कलेजा मुंह को आ गया। मुझे याद है हर साल मेरी मां बरसात के पहले और फिर उसके बाद खूबसूरत प्रेमों में सजी ढेर सारी फोटो घर के आंगन में खटिया पर बिछा देती थीं...ताकि धूप लगने से वो अगले साल तक सुरक्षित रहें। इनमें इलाहाबाद के ब्वॉयजॉ हाइस्कूल की वो तस्वीर भी थी जो औपचारिक शिक्षा की शुरुआती क्लास होती है। खाकी निकर और वर्दी पहन कर तीसरी लाइन में बुक्का जैसा खड़ा था मैं। शायद 1973 या 1974 की बात थी। लंबे चेहरे वाली खूबसूरत सी टीचर थीं..जो आज न जाने कहां होंगी। खूबसूरत फ्रेम वाला चश्मा उन्हें और खूबसूरत बनाता था। अगली क्लास में एक मोटी सी टीचर थीं जिनका नाम याद नहीं। लेकिन उन्होंने अंग्रेज़ी के अक्षरों के जो उच्चारण उस वक्त बताये थे ..आज तक नहीं भूला हूं। इसी स्कूल के लॉन में एक बार इमली के पेड़ की शाखाओं से लटक कर झूलने की कोशिश में गिर पड़ा था..बेहोश हो गया था। खैर..उन फ्रेमों में एक में मैं खुद को देखता हूं...एक फौजी के पहनावे में..शायद 1970 है ये...एक में टेबल पर पेट के बल लेटा हूं और दोनों हाथों से उठने की कोशिश कर रहा हूं..शायद 7 या 8 महीने की उम्र में खिंची थी। लंबे बालों वाला मैं। एक तस्वीर कक्षा 4 की भी है जो पीलीभीत के मेरे नये स्कूल की पहली फोटो है। इसमें एक टीचर हैं ..गीता आंटी...हर स्कूल में टीचर को कुछ न कुछ कह कर बुलाने की प्रथा है...मेरे बच्चे मैम कहते हैं...मेरे उस स्कूल में आंटी कहा जाता था। तो वो गीता आंटी थीं। सिर्फ यही एक ऐसी टीचर हैं जो आज तक मुझे याद आती हैं..आज भी इन्हें खोज रहा हूं..पीलीभीत में अपने संवाददाताओं से कहा--किसी भी तरह उन्हें खोजे...लेकिन अभी तक कुछ पता नहीं चला। वो मुझे बहुत मानती थीं..हर शनिवार को जब छुट्टी 12 बजे ही हो जाती थी...वो एक घंटे तक हम सबसे फिल्मी गाने सुनतीं। उनकी फरमाइश हर हफ्ते मुझसे एक ही गाने की होती...चुरा लिया है तुमने जो दिल को...मैं गाता..और सब सुनते। ये गाना आज भी मेरा फेवरिट है लेकिन गीता आंटी कहीं नहीं हैं..आज इनमें से एक भी फोटो मेरे पास नहीं बचीं....इसीलिए मुझे लगता है कि अब पीढ़ियां लापरवाह होती जा रही हैं..जो तस्वीरें तीन दशकों से मेरी मां ने संभाल कर रखी थीं...हमने खो दीं...

पहला दिन

पहला दिन ऑफिस का
एक नया जोश , एक नई उमंग है
धड़कनों की रफ्तार तेज़ है
लेकिन
उससे भी तेज़ है
मेरे ख़्वाबों की उड़ान
पंख आपकी दुआओं और विश्वास के हैं
पैनी नज़र है मंज़िल की तरफ़
बस अब थोड़ी ही दूर मेरा आसमान है



--रूबिका लियाकत

(रूबिका लियाकत एक एंकर हैं ..खुलेपन में उनका यकीन है और सबसे बड़ी खासियत उनकी ये कि ..वो ज़िंदगी के रास्तों से वाकिफ हैं..आज न्यूज़ 24 ज्वाइन किया तो उमंगें बाहर छलक आईं...)

Thursday, September 4, 2008

देखोगे..यादें मेरी ?

यादें भली भी, बुरी भी
कभी जुबान पर मिठास घोलती हैं
घंटों पहले चखी चाशनी सी
तो कभी दर्द के मरोड़ों से
झकझोरती है अनपहचानी सी
कभी महकती है वर्षों पहले संभाले
हुए लिबास की तहों में
बासी खुशबू सी

तो कभी चढ़ जाती हैं
सिर पे खटास सी
ये चिपक भी जाती हैं
हड्डियों से चमड़ी की तरह
तो कभी फिसल जाती हैं
सोये हुए शिशु के हाथ से मनचाहे
खिलौने जैसी
हर रोज़ मैं सोया तो टूटे हुए दांतों
जैसी उम्मीदों को लेके तकिये के नीचे
कि कोई दांतों की परी ले जाये उन्हें
और दे जाये मुझे कुछ
अपनी यादें मिला के
जो उम्र के आखिरी लम्हों में
भी बांध के ले जाउं यादें तेरी


आ दिखा दूं तुझे यादें मेरी

---- अंजू सिंह

(अंजू की लेखनी से कविता बहती है... बचपन और उसके बाद का वक्त उन्हें भुलाये नहीं भूलता। घर की दीवारों पर , खिड़की के अधटूटे शीशे पर, अंडे के खोखले छिलकों पर और दरअसल .... हर उस चीज़ पर ...जो बड़े होते हुए सामने आती है--अंजू की कविताएं अंकित हैं )

Wednesday, August 27, 2008

अखबार तो निकाल दें, पर तोप कहां ढ़ूंढें?


अमा यार, आप लोगों ने वो हैवी वाला डायलोग सुना है. ‘जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो.’ यार निकाल तो दें, पर परेशानी ये है कि अखबार से तोप का कनेक्शन पल्ले नहीं पड़ रहा. अमा छोड़िये तोप को, हमें तो इतना बता दीजिए, कि जब सामने सफेद टोपी और गेरूए लिबास में तोपची खड़े हों तो क्या किया जाय. तोप कोई बड़ी चीज नहीं है. बड़ी चीज है तोपची. वो भी ऐसे वैसे नहीं, हल्ला मचाते- आग लगाते- हुड़दंगी जमात के खतरनाक तोपची. अबकी नसल में ये पौध खूब हुई है. तोप के छर्रे तो हमारे पुरखों ने खूब छाती पर झेले हैं, फिर भी हम यहां बकतोली के लिए बचे रह गये. पर ये जो पुराने ठंग के नये तोपची आ गये हैं, इनका इलाज नजर नहीं आ रहा. अब हम खबरी टाइप इंसान निकाल लें अखबार. तो क्या होगा. बड़े ही जाहिल गंवार टाइप जमात है इन तोपचियों की. पहले तो कुछ सुनते ही नहीं. सिर्फ कहते हैं. माइक वालों से. अखबार वालों से. टोपी वालों से. बंदूक वालों से. पजामे वालों से. नेकर वालों से. ये लोग बस बोलना जानते हैं. अब चचे तुम ही बताओ क्या कर लेगा अखबार और क्या कर लोगे तुम. अच्छा चलो, हिम्मत भी की और उनकी बोलती पर तुमने अपनी कहनी-पूछनी शुरू कर दी तो पहले तो तुम्हारे जूते उतारेंगे. फिर तुम्हारे पैरों के सामान से पटापट तुम्हारा ही शीर्षाभिषेक करेंगे. बच आओ तो तुम्हारा भाग्य, नहीं तो उनका आंदोलन. रह गया तुम्हारा अखबार तो हां वो उनके काम आ जायेगा. उन तोपचीयों में कुछ कुशल शिल्पकार होते हैं जो किसी भी वक्त उन अखबारों को बांस की दो खपच्चियों पर गुत्थम-गुत्था करके एक जैसे आकार-प्रकार वाले पुतले बनाने में माहिर होते हैं और दूसरे उस पर बड़े सम्मान से तुम्हारी ही स्याही, (नहीं तो बूट-पॉलिश) से उस पर बड़े बड़े कर्णिम अक्षरों से दूसरी पार्टी वाले किसी भी महानुभाव का सादर नाम लिख देते हैं. और फिर कभी सरेराह, नुक्कड़- चौराहे पर दशहरे का प्री रिहर्सल या फिर किसी प्रिय के अंतिम संस्कार की पूर्व पैक्टिस. सब कुछ चालू है, अब ये बताओ कि अखबार निकालकर क्या करें. हम लिखें और खुदा बांचे तो क्या फायदा. सब पर काम है पर हम खबरियों की परेशानी कोई समझने को तैयार ही नहीं. अगर अखबार निकालना है तो बकौल बड़े बुजुर्ग पहले मुकाबिल तोपें ढूंढनी होंगी. और फिर अखबार की फ्रंट पेज लीड और संपादकीय ठूंस ठूंस कर उनकी नाल बंद करनी होगी. इस संपादकीय रिस्क के लिए न तो इग्नू अलग से स्पेशलाइज्ड रिस्क मैनेजमेंट कराती है और न ही एल आई सी सरे चौराहे इन तोपचियों से मुकाबले के लिए कोई इंश्योरेंस पॉलिसी देती है. हम बेचारी अबला खबरिया जात के लिए कोनूं आरक्षण-वारक्षण है कि नाहीं. अरे कोई आंदोलन वांदोलन करो यार. नहीं आता तो इन तोपचियों से ही पूछ लो. इन्हें सब रास्ते पता हैं.
देवेश वशिष्ठ खबरी
9811852336
आपने आज तहलका पढ़ा या नहीं?,- ये लेख तहलका पर देखें.-
http://hindi.tehelka.co.in/stambh/anyastambh/fulka/116.html

Friday, August 22, 2008

मैं गूंगा हूं

'घर का सारा काम कराती हैं और तीन घंटे बाद छोड़ती हैं मेमसाब... '
'क्या क्या काम करती हो बेटा वहां ' मेरे पसीज उठे मन ने सवाल पूछा।
'झाड़ू-पोंछा,घर के सब लोगों का कपड़ा धोना, खाना बनाना... ' एक चुप्पी के बाद उसने मुंह खोला ।

मेरे पास पूछने के लिए कोई सवाल नहीं था-जवाब तो खैर क्या होता...लेकिन मुझे उसकी शक्ल में अपनी बेटी नज़र आ रही थी। वो हमारे घर काम करने वाली बाई की बेटी थी....और हमारे अपार्टमेंट्स में रहने वाले पाठक जी के घर काम करती थी। पाठक जी के घर पर उनकी मां का राज था और आज बारिश में उन्होंने इस बच्ची से जमकर कपड़े धुलवाए थे....अपने सूजे हुए नन्हें गुलाबी हाथ वो दूसरे हाथ से सहला रही थी....मौन थी लेकिन मुझे लगता था कि सवाल पूछ रही है.....हम सब से....लेकिन हममे से किसी को कुछ सुनाई नहीं दे रहा। मुझे लगा -मैं बहरा हो गया हूं...मुझे सिर्फ अपने मतलब की बातें सुनाई पड़ती हैं...बच्चों की फीस, उनके बर्थ डे गिफ्ट्स,कार का एसी बनवाना, घर का ईएमआई...नये घर का लोन सैंक्शन करवाना...और अपने बच्चों की..हां ...अपने बच्चों की सारी ज़िदें पूरी करना। लेकिन फिर भी मैं बहरा हूं...क्योंकि मुझे ख्वामख्वाह तंग करने वाली आवाज़ें अच्छी नहीं लगतीं....आवाज़ें ... जो मुझे अपने छोटेपन का अहसास दिलाएं

Wednesday, August 20, 2008

सब ढंक गया

यमुना नदी का सरस्वती घाट,
जिसके हो चले हैं अब ठाठ
वहाँ पक्की, मजबूत सीढ़ियाँ
देख कर ठिठक गया
नदी किनारे की वो बालू की जमीन,
उस जमीन पर बना
दो जोड़ी पैरों का निशान,
सब ढक गया
यहीं तो थी कभी गीली-दलदली जमीन,
जिसके पास ही उसने सूखी
और साफ जगह दिखायी थी
थोड़ी देर शान्त और एकान्त बैठकर,
अपनी बात सुनाने को,
उसने अपने दुपट्टे की चादर बिछायी थी
वो यही जगह थी
वो था एक कठिन दौर,
जब वह अपनी कमज़ोरियां कहें,
या कायरता मिटा न सका था
घर–परिवार के सपने तोड़कर
अपने मदमस्त
सपने सच करने का
हौसला न जुटा सका
उनके बीच की
डोरतनती जा रही थी।
प्यार के सपनों की राह
पर दुनियादारी की
दीवारबनती जा रही थी।


दुनिया से हारकर दोनो
ने समेट ली अपनी दुनिया
दूर हो जाएंगे, यह जान कर
एक दूसरे को मन ही
मनभेंट लिया था।
फिर भीबैठे रहते थे,
ठहरी हुई यमुना के किनारे,
मुट्ठी भर समय को पकड़कर।


जैसे रोक ले कोई,
पानी से भींगी रेत कोमुट्ठी में जकड़कर।
इस आस में,कि जब तक पानी है,
यह रेत मुट्ठी से नहीं निकलेगी।
मानो यहाँ की गहरी यमुना चंद
कदम चलकर,वेगवती गंगा में नहीं
आस को जिन्दा करने की उम्मीद में,
उन्होंने समय की उस रेत मेंआँखों का
पानी भी मिलाया था
लेकिन होनी तो
होनी ही थी,
अँधेरा घना हुआ, वे लौट गये,
यमुना का पानी गंगा में जा समाया था ।
--सिद्धार्थ शंकर
(सिद्धार्थ एक बड़े अफसर हैं..लेकिन लाल फीतों वाली भूरी सरकारी फाइलें उनके मन के कवि को ख़त्म नहीं कर पाईं..उनकी इस कविता ने इलाहाबाद से जुड़ी मेरी भी वो यादें ताज़ा कर दी हैं..जो उनके अनुभवों से मिलती जुलती हैं..और कहीं अब भी उस अद्भुत शहर की हवाओं में मौजूद हैं)

Thursday, July 24, 2008

ग़ालिब और इज़ारबंद

निदा फाजली
दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज के सामने बनी एक ख़ूबसूरत इमारत है, जिसे ‘ऐवाने-ग़ालिब’ या ग़ालिब इंस्टीट्यूट कहा जाता है, ऐसी ही मामूली चीज़ों से ग़ालिब के दौर को दोहराती है. यह इमारत मुग़ल इमारत-साज़ी का एक नमूना है. आख़िरी मुग़ल सम्राट के समय के शायर मिर्ज़ा ग़ालिब के समय को, उस समय के लिबासों, बर्तनों, टोपियों, पानदानों, जूतों और छोटे-बड़े ज़ेवरों से दिखाकर एक ऐसा इतिहास रचने को कोशिश की गई है. यह इतिहास उस इतिहास से मुख़्तलिफ़ है जो हमें स्कूल या कॉलेजों में पढ़ाया जाता है जिसमें तलवारों, बंदूकों और तोपों को हिंदू-मुस्लिम नाम देकर आदमी को आदमी से लड़ाया जाता है और फिर अपना अपना वोट बैंक बनाया जाता है.

इस 'ग़ालिब म्यूज़ियम' में और बहुत सी चीज़ों के साथ किसी हस्तकार के हाथ का बना हुआ एक इज़ारबंद भी है. ग़ालिब दिल्ली के बल्लीमारान इलाक़े में रहा करते थे. ग़ालिब के उस लंबे, रेशमी इज़ारबंद ने मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही व्यवहार किया. ग़ालिब म्यूज़ियम में पड़ा हुआ मैं अचानक 2006 से निकलकर पुरानी दिल्ली की टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़रकर बल्लीमारान में सहमी सिमटी उस हवेली में पहुँच गया जहाँ ग़ालिब आते हुए बुढ़ापे में गई हुई जवानी का मातम कर रहे थे. इस हवेली के बाहर अंग्रेज़ दिल्ली के गली-कूचों में 1857 का खूनी रंग भर रहे थे.
ग़ालिब का शेर है -
हम कहाँ के दाना थे किस हुनर में यकता थे

बेसबब हुआ ‘ग़ालिब’ दुश्मन आसमाँ आपना
हवेली के बाहर के फाटक पर लगी लोहे की बड़ी सी कुंडी खड़खड़ाती है. ग़ालिब अंदर से बाहर आते हैं तो सामने अंग्रेज़ सिपाहियों की एक टोली नज़र आती है. ग़ालिब के सिर पर अनोखी सी टोपी, बदन पर कढ़ा हुआ चोगा और इसमें से झूलते हुए ख़ूबसूरत इज़ारबंद को देखकर टोली के सरदार ने टूटी फूटी हिंदुस्तानी में पूछा, “तुमका नाम क्या होता?”

ग़ालिब - “मिर्जा असदुल्ला खाँ ग़ालिब उर्फ़ नौश.”

अंग्रेज़ -“तुम लाल किला में जाता होता था?”

ग़ालिब-“जाता था मगर-जब बुलाया जाता था.”

अंग्रेज़-“क्यों जाता होता था?”

ग़ालिब- “अपनी शायरी सुनाने- उनकी गज़ल बनाने.”

अंग्रेज़- “यू मीन तुम पोएट होता है?”

ग़ालिब- “होता नहीं, हूँ भी.”

अंग्रेज़- “तुम का रिलीजन कौन सा होता है?”

ग़ालिब- “आधा मुसलमान.”

अंग्रेज़- “व्हाट! आधा मुसलमान क्या होता है?”

ग़ालिब- “जो शराब पीता है लेकिन सुअर नहीं खाता.”


और ग़ालिब की मज़ाकिया आदत ने उन्हें बचा लिया. मैंने देखा उस रात सोने से पहले उन्होंने अपने इज़ारबंद में कई गाठें लगाई थीं. ग़ालिब की आदत थी जब रात को शेर सोचते थे तो लिखते नहीं थे. जब शेर मुकम्मल हो जाता था तो इज़ारबंद में एक गाँठ लगा देते थे. सुबह जाग कर इन गाठों को खोलते जाते थे और इस तरह याद करके शेरों को डायरी में लिखते जाते थे.

हुई मुद्दत कि ग़ालिब मर गया पर याद आता है

वो हरेक बात पे कहना कि यूँ होता तो क्या होता
इज़ारबंद से ग़ालिब का रिश्ता अजीब शायराना था. इज़ारबंद दो फारसी शब्दों से बना हुआ एक लफ्ज़ है. इसमें इज़ार का अर्थ पाजामा होता है और बंद यानी बाँधने वाली रस्सी. औरतों के लिए इज़ारबंद में चाँदी के छोटे छोटे घुँघरु भी होते थे और इनमें सच्चे मोती भी टाँके जाते थे. लखनऊ की चिकन, अलीगढ़ की शेरवानी, भोपाल के बटुवों और राजस्थान की चुनरी की तरह ये इज़ारबंद भी बड़े कलात्मक होते थे. हिंदुस्तानी में इसे कमरबंद कहते हैं. यह इज़ारबंद मशीन के बजाय हाथों से बनाए जाते थे.
ये इज़ारबंद आज की तरह अंदर उड़स कर छुपाए नहीं जाते थे. ये छुपाने के लिए नहीं होते थे.
पुरुषों के कुर्तों या महिलाओं के ग़रारों से बाहर लटकाकर दिखाने के लिए होते थे. पुरानी शायरी में ख़ासतौर से नवाबी लखनऊ में प्रेमिकाओं की लाल चूड़ियाँ, पायल, नथनी और बुंदों की तरह इज़ारबंद भी सौंदर्य के बयान में शामिल होता था.
ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे. इनमें कुछ यूँ हैं, ‘इज़ारबंद की ढीली’ उस स्त्री के लिए इस्तेमाल होता है जो चालचलन में अच्छी न हो. मैंने इस मुहावरे को छंदबद्ध किया है.


जफ़ा है ख़ून में शामिल तो वो करेगी ज़फा

इज़ारबंद की ढीली से क्या उमीदे वफ़ा

‘इज़ारबंद की सच्ची’ से मुराद वह औरत है जो नेक हो ‘वफ़ादार हो’. इस मुहावरे का शेर इस तरह है,

अपनी तो यह दुआ है यूँ दिल की कली खिले जो

हो इज़ारबंद की सच्ची, वही मिले

इज़ारबंदी रिश्ते के मानी होते हैं, ससुराली रिश्ता. पत्नी के मायके की तरफ़ का रिश्ता.

घरों में दूरियाँ पैदा जनाब मत कीजे

इज़ारबंदी ये रिश्ता ख़राब मत कीजे

इज़ार से बाहर होने का अर्थ होता है ग़ुस्से में होश खोना.


पुरानी दोस्ती ऐसे न खोइए साहब

इज़ारबंद से बाहर न होइए साहब

इज़ारबंद में गिरह लगाने का मतलब होता है किसी बात को याद करने का अमल.

निकल के ग़ैब से अश्आर जब भी आते थे

इज़ारबंद में ‘ग़ालिब’ गिरह लगाते थे

ग़ालिब तो रात के सोचे हुए शेरों को दूसरे दिन याद करने के लिए इज़ारबंद में गिरहें लगाते थे और उन्हीं के युग में एक अनामी शायर नज़ीर अकबराबादी इसी इज़ारबंद के सौंदर्य को काव्य विषय बनाते थे. कबीर और नज़ीर को पंडितों तथा मौलवियों ने कभी साहित्यकार नहीं माना. कबीर अज्ञानी थे और नज़ीर नादान थे. इसलिए कि वो परंपरागत नहीं थे. अनुभव की आँच में तपाकर शब्दों को कविता बनाते थे. नज़ीर मेले ठेलों में घूमते थे. जीवन के हर रूप को देखकर झूमते थे. इज़ारबंद पर उनकी कविता उनकी भाषा का प्रमाण है.
उनकी नज़्म के कुछ शेर -

छोटा बड़ा, न कम न मझौला इज़ारबंद

है उस परी का सबसे अमोला इज़ारबंद

गोटा किनारी बादल-ओ- मुक़्क़ैश के सिवा

थे चार तोला मोती जो तोला इज़ारबंद
धोखे में हाथ लग गया मेरा नज़ीर तो

लेडी ये बोली जा, मेरा धो ला इज़ारबंद


--बीबीसी से साभार

Monday, July 14, 2008

ज़ाहिल मेरे बाने

भवानी प्रसाद मिश्र
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मैं असभ्य हूं क्योंकि खुले नंगे पांवों चलता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि धूल की गोदी में पलता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि चीर कर धरती धान उगाता हूं
मैं असभ्य हूं क्योंकि ढोल पर बहुत ज़ोर से गाता हूं
आप सभ्य हैं क्योंकि हवा में उड़ जाते हैं ऊपर
आप सभ्य हैं क्योंकि आग बरसा देते हैं भू पर
आप सभ्य हैं क्योंकि धान से भरी आपकी कोठी
आप सभ्य हैं क्योंकि ज़ोर से पढ़ पाते हैं पोथी
आप सभ्य हैं क्योंकि आपके कपड़े स्वयं बने हैं
आप सभ्य हैं क्योंकि जबड़े खून सने हैं
आप बड़े चिंतित हैं मेरे पिछड़ेपन के मारे
आप सोचते हैं कि सीखता यह भी ढंग हमारे
मैं उतारना नहीं चाहता जाहिल अपने बाने
धोती-कुरता बहुत ज़ोर से लिपटाए हूं याने!
भवानीप्रसाद मिश्र

कभी धूप कभी छाँव के दिन

जावेद अख़्तर
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रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है....
मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढ़ियों पर एक कमज़ोर से बल्ब की कमज़ोर सी रौशनी में बैठा हूँ। पास ही ज़मीन पर इस आँधी-तूफ़ान से बेख़बर तीन आदमी सो रहे हैं।
दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है.... बारिश लगता है अब कभी नहीं रुकेगी..... दूर तक ख़ाली अँधेरी सड़कों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है.... ख़ामोश बिल्डिंगों की रौशनियाँ कब की बुझ चुकी हैं....
लोग अपने-अपने घरों में सो रहे होंगे.... इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है.... बंबई कितना बड़ा शहर है और मैं कितना छोटा हूँ, जैसे कुछ नहीं हूँ.... आदमी कितनी भी हिम्मत रखे कभी-कभी बहुत डर लगता है........मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो (जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूँ.... कंपाउंड में कहीं भी सो जाता हूँ. ....कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरीडोर में..... यहाँ मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोज़गार इसी तरह रहते हैं....
उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है..... वो रोज़ एक नई तरकीब सोचता है कि आज खाना कहाँ से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है..... जगदीश ने बुरे हालात में ज़िंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है.....मेरी जान-पहचान अँधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है. ....इसलिए किताबों की कोई कमी नहीं है.... रात-रात भर कम्पाउंड में जहाँ भी थोड़ी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढ़ता रहता हूँ....दोस्त मज़ाक करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज़्यादा पढ़ता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाऊँगा... आजकल एक कमरे में सोने का मौक़ा मिल गया है....स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ़ दीवारों में लगी बड़ी-बड़ी अलमारियाँ हैं जिनमें फ़िल्म पाकीज़ा के दर्जनों कॉस्ट्यूम रखे हैं.....मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं, इसलिए इन दिनों फ़िल्म की शूटिंग बंद है.... एक दिन मैं एक अल्मारी का ख़ाना ख़ोलता हूँ, इसमें फ़िल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड भी पड़े हैं....मैं उन्हें झाड़-पोंछकर अलग रख देता हूँ.... मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी फ़िल्म एवार्ड को छुआ है....रोज़ रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खड़ा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्रॉफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूँजते हुए हॉल में बैठे हुए लोगों की तरफ़ देखकर मैं किस तरह मुस्कुराऊँगा और कैसे हाथ हिलाऊँगा.....इसके पहले कि इस बारे में कोई फ़ैसला कर सकूँ स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते।

यह वह दौर था जब कामयाबी मिलने लगी थी। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतज़ाम नहीं होता हम लोग महाकाली की गुफाओं में रहेंगे(महाकाली अँधेरी से आगे एक इलाक़ा है जहाँ अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है। उस ज़माने में वहाँ सिर्फ़ एक सड़क थी, जंगल था और छोटी-छोटी पहाड़ियाँ जिनमें बौद्ध-भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफाएँ थी, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरस-गाँजा पीने वाले साधु पड़े रहते थे....महाकाली की गुफाओं में मच्छर इतने बड़े हैं कि उन्हें काटने की ज़रूरत नहीं, आपके तन पर सिर्फ़ बैठ जाएँ तो आँख खुल जाती हैं...एक ही रात में ये बात समझ में आ गई कि वहाँ चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता... तीन दिन जैसे-तैसे गुज़ारता हूँ....बांदरा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है..... मैं बांदरा जा रहा हूँ।
जगदीश कहता है दो-एक रोज़ में वो भी कहीं चला जाएगा (ये जगदीश से मेरी आख़िरी मुलाकात थी)।
आनेवाले बरसों में ज़िंदगी मुझे कहाँ ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफ़ाओं में चरस और कच्ची दारू पी-पीकर मर गया और वहाँ रहने वाले साधुओं और आसपास के झोंपड़-पट्टी वालों ने चंदा करके उनका क्रिया-कर्म कर दिया-क़िस्सा खतम। मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की ख़बर भी बाद में मिली। मैं अकसर सोचता हूँ कि मुझमें कौन से लाल टंकें हैं और जगदीश में ऐसी क्या ख़राबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफ़ाक लगता है.... हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं....
मैं बांदरा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूँ वो पेशेवर जुआरी है. ..वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं.... मुझे भी सिखा देते हैं...कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुज़ारा होता है फिर वो लोग बंबई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं-अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा....एक मशहूर और कामयाब राइटर मुझे बुलाके ऑफ़र देते हैं कि अगर मैं उनके डॉयलॉग लिख दिया करूँ (जिन पर ज़ाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रुपए महीना देंगे....सोचता हूँ ये छह सौ रुपए इस वक़्त मेरे लिए छह करोड़ के बराबर हैं, ये नौकरी कर लूँ, फिर सोचता हूँ कि नौकरी कर ली तो कभी छोड़ने की हिम्मत नहीं होगी, ज़िंदगी-भर यही करता रह जाऊँगा, फिर सोचता हूँ अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूँ देखा जाएगा....तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूँ.... दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुज़रते हैं.... बंबई में पाँच बरस होने को आए, रोटी एक चाँद है हालात बादल, चाँद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है.....ये पाँच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सर नहीं झुका सके..... मैं नाउम्मीद नहीं हूँ... मुझे यक़ीन है, पूरा यक़ीन है, कुछ होगा, कुछ ज़रूर होगा, मैं यूँ ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ-और आख़िर नवंबर, 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फ़िल्मवालों की ज़बान में सही "ब्रेक"कहा जाता है...कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग़ है... अचानक देखता हूँ कि दुनिया ख़ूबसूरत है और लोग मेहरबान.... साल-डेढ़ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है. .....
सीता और गीता के सेट पर हनी ईरानी मिलीं और फिर शादी हो गई...हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूँ-अपना पहला घर, अपनी पहली कार.... तमन्नाएँ पूरी होने के दिन आ गए हैं मगर ज़िंदगी में एक तनहाई तो अब भी है.....सीता और गीता के सैट पर मेरी मुलाकात हनी ईरानी से होती है..... वो एक खुले दिल की, खरी ज़बान की मगर बहुत हँसमुख स्वभाव की लड़की है..... मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है...मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं (कुछ जख़्मों को भरना अलादीन के चिराग़ के देव के बस की बात नहीं-ये काम सिर्फ वक़्त ही कर सकता है).... दो साल में एक बेटी और एक बेटा, ज़ोया और फ़रहान होते हैं....
अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपर हिट फ़िल्में, पुरस्कार, तारीफ़ें, अख़बारों और मैगज़ीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियाँ, दुनिया के सफ़र, चमकीले दिन, जगमगाती रातें-ज़िंदगी एक टेक्नीकलर ख़्वाब है, मगर हर ख़्वाब की तरह यह ख़्वाब भी टूटता है.....पहली बार एक फ़िल्म की नाकामी-(फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी मगर कामयाबी की वो खुशी और खुशी की वो मासूमियत जाती रही)....

(फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर का यह आत्मकथ्य उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से लिया गया है)बीबीसी से साभार

Friday, July 11, 2008

शेर लिख कर सुलह की एक बाग़ी बेटे ने






जावेद अख़्तर



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18 अगस्त 1976 को मेरे बाप की मृत्यु होती है(मरने से नौ दिन पहले उन्होंने मुझे अपनी आख़िरी किताब ऑटोग्राफ करके दी थी, उसपर लिखा था-"जब हम न रहेंगे तो बहुत याद करोगे." (उन्होंने ठीक लिखा था).
अब तक तो मैं अपने आपको एक बाग़ी और नाराज़ बेटे के रूप में पहचानता था मगर अब मैं कौन हू। मैं अपने-आपको और फिर अपने चारो तरफ़, नई नज़रों से देखता हूँ कि क्या बस यही चाहिए था मुझे ज़िंदगी से। इसका पता अभी दूसरों को नहीं है मगर वो तमाम चीज़ें जो कल तक मुझे खुशी देती थीं झूठी और नुमाइशी लगने लगी हैं। अब मेरा दिल उन बातों में ज़्यादा लगता है जिनसे दुनिया की ज़बान में कहा जाए तो, कोई फ़ायदा नहीं। शायरी से मेरा रिश्ता पैदाइशी और दिलचस्पी हमेशा से है। लड़कपन से जानता हूँ कि चाहूँ तो शायरी कर सकता हूँ मगर आज तक की नहीं है। ये मेरी नाराज़गी और बग़ावत का एक प्रतीक है। 1979 में पहली बार शेर कहता हूँ और ये शेर लिखकर मैंने अपनी विरासत और अपने बाप से सुलह कर ली है। इसी दौरान मेरी मुलाक़ात शबाना से होती है। कैफ़ी आज़मी की बेटी शबाना भी शायद अपनी जड़ों की तरफ़ लौट रही थी। उसे भी ऐसे हज़ारों सवाल सताने लगे हैं जिनके बारे में उसने पहले कभी नहीं सोचा था। मैं खुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है। जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी। "मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत हैं"- ये पंक्ति अगर बरसों पहले मज़ाज़ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता।
कोई हैरत नहीं कि हम क़रीब आने लगते हैं। धीरे-धीरे मेरे अंदर बहुत कुछ बदल रहा है। फ़िल्मी दुनिया में जो मेरी पार्टनरशिप थी टूट जाती है। मेरे आसपास के लोग मेरे अंदर होनेवाली इन तब्दीलियों को परेशानी से देख रहे हैं। 1983 में मैं और हनी अलग हो जाते हैं. (हनी से मेरी शादी ज़रूर टूट गई मगर तलाक भी हमारी दोस्ती का कुछ नहीं बिगाड़ सकी। और अगर माँ-बाप के अलग होने से बच्चों में कोई ऐसी कड़वाहट नहीं आई तो इसमें मेरा कमाल बहुत कम और हनी की तारीफ़ बहुत ज़्यादा है। हनी आज एक बहुत कामयाब फ़िल्म राइटर है और मेरी बहुत अच्छी दोस्त। मैं दुनिया में कम लोगों को इतनी इज़्ज़त करता हूँ जितनी इज़्ज़त मेरे दिल में हनी के लिए है.)
मैंने एक क़दम उठा तो लिया था मगर घर से निकल के कई बरसों के लिए मेरी ज़िंदगी "कटी उम्र होटलों में मरे अस्पताल जाकर" जैसी हो गई। शराब पहले भी बहुत पीता था मगर फिर बहुत ही ज़्यादा पीने लगा. ये मेरी ज़िंदगी का एक दौर है जिस पर मैं शर्मिंदा हूँ। इन चंद बरसों में अगर दूसरों ने मुझे बर्दाश्त कर लिया तो ये उनका एहसान है. बहुत मुमकिन था कि मैं यूँ ही शराब पीते-पीते मर जाता मगर एक सबेरे किसी की बात ने ऐसा छू लिया कि उस दिन से मैंने शराब को हाथ नहीं लगाया और न कभी लगाऊँगा। आज इतने बरसों बाद जब अपनी ज़िंदगी को देखता हूँ तो लगता है कि पहाड़ों से झरने की तरह उतरती, चटानों से टकराती, पत्थरों में अपना रास्ता ढूँढ़ती, उमड़ती, बलखाती, अनगिनत भँवर बनाती, तेज़ चलती और अपने ही किनारों को काटती हुई ये नदी अब मैदानों में आकर शांत और गहरी हो गई है।
मेरे बच्चे ज़ोया और फ़रहान बड़े हो गए हैं और बाहर की दुनिया में अपना पहला कदम रखने को हैं। उनकी चमकती हुई आँखों में आने वाले कल के हसीन ख़्वाब हैं। सलमान, मेरा छोटा भाई, अमेरिका में एक कामयाब साइकोएनालिस्ट, बहुत-सी किताबों का लेखक, बहुत अच्छा शायर, एक मोहब्बत करने वाली बीवी का पति और दो बहुत ज़हीन बच्चों का बाप है । ज़िंदगी के रास्ते उसके लिए कुछ कठिन नहीं थे मगर उसने अपनी अनथक मेहनत और लगन से अपनी हर मंज़िल पा ली है. और आज भी आगे बढ़ रहा है। मैं खुश हूँ और शबाना भी, जो सिर्फ़ मेरी बीवी नहीं मेरी महबूबा भी है. जो एक ख़ूबसूरत दिल भी है और एक क़ीमती ज़हन भी. "मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो उस दुनिया की औरत हैं"- ये पंक्ति अगर बरसों पहले मज़ाज़ ने किसी के लिए न लिखी होती तो मैं शबाना के लिए लिखता ।
आज यूँ तो ज़िंदगी मुझ पर हर तरह से मेहरबान है मगर बचपन का वो एक दिन, 18 जनवरी 1953 अब भी याद आता है। जगह, लखनऊ, मेरे नाना का घर-रोती हुई मेरी ख़ाला, मेरे छोटे भाई सलमान को, जिसकी उम्र साढे छह बरस है और मुझे हाथ पकड़ के घर के उस बड़े कमरे में ले जाती हैं जहाँ फ़र्श पर बहुत सी औरतें बैठी हैं। तख़्त पर सफ़ेद कफ़न में लेटी मेरी माँ का चेहरा खुला है। सिरहाने बैठी मेरी बूढ़ी नानी थकी-थकी सी हौले-हौले रो रही हैं। दो औरतें उन्हें संभाल रही हैं। मेरी खाला हम दोनों बच्चों को उस तख़्त के पास ले जाती हैं और कहती है, अपनी माँ को आख़िरी बार देख लो । मैं कल ही आठ बरस का हुआ था। समझदार हूँ... जानता हूँ मौत क्या होती है।




मैं अपनी माँ के चेहरे को बहुत ग़ौर से देखता हूँ कि अच्छी तरह याद हो जाए। मेरी ख़ाला कह रही हैं-इनसे वादा करो कि तुम ज़िंदगी में कुछ बनोगे, इनसे वादा करों कि तुम ज़िंदगी में कुछ करोगे । मैं कुछ कह नहीं पाता, बस देखता रहता हूँ और फिर कोई औरत मेरी माँ के चेहरे पर कफ़न ओढ़ा देती है-
ऐसा तो नहीं है कि मैंने ज़िंदगी में कुछ किया ही नहीं है लेकिन फिर ये ख़्याल आता है कि मैं जितना कर सकता हूँ उसका तो एक चौथाई भी अब तक नहीं किया और इस ख़्याल को दी हुई बेचैनी जाती नहीं.
(फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर के काव्य संग्रह 'तरकश' से साभार )



Tuesday, July 8, 2008

एक और नज़्म

मत छेड़ो इन्हें
ख़्वाब हैं
जाग जाएंगे
तैर रही हैं हसरतें
सब पाने
कुछ न खोने की
कुछ चुराने का मज़ा
हसीन डाके,
उसको मारा
फलां को कुचला
बेशर्म हो लिए
फना हो लिए किसी पर
अब सच की दुनिया में
जीने के मौके हैं कम
चिपक जाएगा मुखौटा
आंख खुलते ही
मत छेड़ो, खेलने दो
सान लेने दो माटी इनको
© सिद्धार्थ

Friday, July 4, 2008

वीएचपी की गुंडई




हिंदू हितों की वर्ल्ड चैंपियन विश्व हिंदू परिषद ने अमरनाथ श्राइन बोर्ड को दी गई ज़मीन वापस लेने के खिलाफ गुरुवार को देश भर में बंद का आह्वान किया था। बंद के आह्वान में कोई गलती नहीं है अगर वह जबरन न कराया जाए। लेकिन वीएचपी जैसे मिलिटंट संगठन से आप ऐसी उम्मीद कैसे कर सकते हैं ! नतीज़ा मध्य प्रदेश आग में सुलगा , चार लोगों की जानें गईं और कई स्थानों पर कर्फ्यू लगाना पड़ा।
इस दौरान सबसे घिनौनी घटना सतना में हुई जहां बंद समर्थकों ने एक व्यापारी की पिटाई कर दी क्योंकि वह अपनी दुकान बंद नही कर रहा था। परिवार वालों के सामने अपनी पिटाई का सदमा बर्दाश्त न कर पाने के चलते 28 साल के उस व्यापारी ने खुद पर किरासन छिड़क दिया। खुशकिस्मती से वह अभी ज़िंदा है। लेकिन यह घटना बताती है कि वीएचपी और बजरंग दल के लोगों और कार्यकर्ताओं का असली चेहरा क्या है !
हर उग्रवादी संगठन की तरह इसमें भी वही और वैसे ही लोग हैं जो तर्क और बहस से दूर भागते हैं। जो अपने मत के आगे बाकी सारे मतों और विश्वासों को छोटा और हेय मानते हैं। और जो उनके विचारों से सहमत न हो , उसे वे हथियारों या ताकत के बल पर दबाना चाहते हैं।
मैं सही कह रहा हूं या गलत , यह जानने के लिए आपको टीवी पर बंद समर्थकों के जो शॉट्स आ रहे थे , उन्हें अपनी आंखों के सामने लाना है। इंदौर हो या जम्मू , हर जगह डंडा और केसरिया झंडा हाथ में लेकर ये इस तरह घूम रहे थे मानो यह जंगल राज है और यहां उन्हें सबकुछ करने की छूट है। उनकी आंखों में आप हिंसा और घृणा की आंच देख सकते हैं। ये आंखें किसी हिंस्र पशु की आंखों से कितनी मैच करती हैं जो अपने शिकार पर हमला करने की ताक में है।
मामला सिर्फ वीएचपी का नहीं है। जो भी समुदाय या भीड़ सिर्फ अपने एजेंडे को लेकर चल रही है और उस एजेंडे में बाकी सारे समुदाय दुश्मन माने जाते हैं , उनके कार्यकर्ताओं की आंखों में आपको ऐसी ही आग दिखेगी। वे चाहे श्रीनगर में बम फेंकते आतंकवादी हों , नंदीग्राम में कत्लेआम करते मार्क्सवादी या देश को दहशत की आग में झोंकते मोदीवादी। आतंकवादियों और इनमें बस इतना फर्क है कि वे छुपकर वार करते हैं , ये सरेआम। ऐसे में कई बार यह तय कर पाना कठिन हो जाता है कि इनमें से ज़्यादा खतरनाक कौन है।
नीरेंद्र नागर

Thursday, July 3, 2008

कहने को ये एक ख़बर है.........

बारह साल के एक बच्चे को टीटीई ने चलती रेलगाड़ी से बाहर फेंक दिया। वजह थी पचास रुपये। इस कारण बच्चे को अपना दाहिना पैर और दाहिना हाथ गंवाना पड़ा। यह जानकारी सरकारी रेलवे पुलिस के सूत्रों ने दी। शंकर सिंह रेलगाड़ियों के डिब्बों की सफाई कर अपना गुजारा चलाता है। सूत्रों ने बताया कि बुधवार को राउरकेला रेलवे स्टेशन पर वह एक ट्रेन में चढ़ा। उसे एक सीट के नीचे से 50 रुपये का नोट मिला। टीटीई ने शंकर से 50 रुपये का नोट मांगा। शंकर ने इनकार कर दिया। इसे लेकर शंकर और टीटीई में झगड़ा हो गया और तब तक गाड़ी चलने लगी। सूत्रों ने बताया कि गुस्साए टीटीई ने उसे थप्पड़ जड़ा और खींचकर डिब्बे के दरवाज़े तक ले गया। उसके बाद टीटीई ने शंकर को चलती रेलगाड़ी से बाहर फेंक दिया। शंकर के एक दोस्त ने बाद में एफआईआर दर्ज कराई। सू़त्रों ने बताया कि शंकर को इस्पात जनरल अस्पताल में दाखिल कराया गया है जहां उसकी स्थिति नाज़ुक बताई जा रही है। घटना के तुरंत बाद सामाजिक संगठन जन कल्याण समिति ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया और टीटीई की तुरंत गिरफ्तारी की मांग की। राउरकेला के अडिशनल डीएम ने आश्वासन दिया कि लड़के का इलाज जिला रेडक्रॉस के फंड से कराया जाएगा। जीआरपी ने इस संबंध में मामला दर्ज कर लिया है।

Wednesday, July 2, 2008

एक नज़्म

गिरे हुए को
उठाने की
भटके को
आईना दिखाने की
फुरसत कहां है

'बिक'नी हसीना की
एक्सक्लूज़िव छींकें
चौके छक्के
चुटकुले
सपने-झूठ
जो बिकता है
वो दिखाते हैं
हमें मत सिखाओ
हम जानते हैं
कौन सी ख़बर है गर्म

सिद्धार्थ त्रिपाठी
युवा कवि


© सिद्धार्थ

नाम गुम जाएगा,चेहरा ये बदल जाएगा

इस निजी डायरी के ज़रिए मैं आपको अपने अतीत के उस सफ़र का हमराही बनाना चाहता हूँ जो सफ़र पाकिस्तान की जेल में बीता। आगे बढ़ने से पहले मैं 20-25 वर्ष के 'जवान' कश्मीर सिंह के बारे में थोड़ा बताना चाहूँगा-वो कश्मीर सिंह जिसकी यादें केवल एक फ़ोटोफ़्रेम में जड़ी तस्वीर में क़ैद होकर रह गई हैं। घर की मेज़ पर रखी इस तस्वीर में जड़ा जवान कश्मीर सिंह मानो टकटकी लगाए बुढ़ाए, झुर्रियों वाले नए कश्मीर सिंह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो। ग़नीमत है कि घर वालों ने इस तस्वीर को संभाल कर रखा हुआ है।
पंजाब के होशियारपुर ज़िले का एक छोटा सा गाँव था नंगलचोरां, वहीं 1941 में मेरा जन्म हुआ।
‘गाँव था’- ये इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि मेरे पीछे से इस। गाँव का नाम नंगलचोरां से नंगलखिलाड़ियाँ हो गया है। अजीब विसंगति है -35 सालों में मेरा नाम बदल गया, बाहरी दुनिया भी बदली, कई लोगों को तो मेरा चेहरा-मोहरा पहचानने में भी दिक्कत होती है। इन तमाम बदलावों के बीच जेल से रिहा होने के बाद सोचा था कि अपने गाँव जाऊँगा, वापस आकर पता चला कि मेरे गाँव का नाम भी बदल गया है। हर चीज़, हर बात में बदलाव जैसे ये एहसास दिला रहें हो कि...ख़ैर छोड़िए आप इसे नंगलखिलाड़ियाँ कहें या नंगलचोरां, गाँव की मिट्टी तो वही है. बचपन-जवानी मेरी यहीं बीती. पढ़ाई-लिखाई तो मैने ज़्यादा की नहीं। और सच बात तो ये है कि जो कक्षाएँ पास की भी, नकल मार कर ही पास की हैं.
पुराने कश्मीर सिंह की यादें केवल एक फ़ोटोफ़्रेम में जड़ी तस्वीर में क़ैद होकर रह गई हैं। घर की मेज़ पर रखी इस तस्वीर में जड़ा जवान कश्मीर सिंह मानो टकटकी लगाए बुढ़ाए, झुर्रियों वाले नए कश्मीर सिंह को पहचानने की कोशिश कर रहा हो। किसी भी दूसरे गबरू-जवान की तरह मेरा भी ब्याह हुआ। ये 1964 की बात होगी। मेरी शादी परमजीत कौर से हुई। अच्छा ख़ासा परिवार था मेरा। तीन बच्चे थे- दो बेटे और एक बेटी।
मैं सन 1967 में पुलिस में भर्ती हुआ लेकिन पुलिस की नौकरी मैने ज़्यादा देर नहीं की और जल्द ही छोड़ दी-1967 से लेकर 1971 तक। नौकरी छोड़ने के कई कारण रहे.... समझिए कि इंसान से नौकरी में कई ग़लतियाँ हो जाती हैं और फिर कुछ पारिवारिक समस्या भी थी। नौकरी छोड़ने के बाद मैं साल-छह महीने घर पर ही रहा। उसके बाद 1973 में पाकिस्तान गया। यहीँ से शुरू हुआ वो सफ़र जिसने ज़िंदगी का रुख़ बदल डाला।लोगों के ज़हन में सबसे बड़ा सवाल शायद यही है कि मैं क्यों और कैसे पाकिस्तान गया. यहाँ मैं इससे ज़्यादा कुछ नहीं कहूँगा कि बस ‘पिकनिक’ मना रहा था और पाकिस्तानी सीमा में चला गया...या कहूँ कि पेट की ख़ातिर गया था और फँस गया जाकर. ...उसके बाद तो जैसे ज़िंदगी ही बदल गई. ..पाकिस्तानी सीमा पर वहाँ की फ़ौज ने पकड़ लिया. .....शुरू में मैने अपना नाम बताया मोहम्मद रफ़ीक़ और पिता का नाम गुलाम मोहम्मद. .....और ये नाम सोचे समझे थे.
पकड़े जाने के बाद ज़ाहिर है पूछताछ शुरू हो गई... पूछताछ का सिलसिला चलता रहा लेकिन मेरी ज़ुबान पर भी ताला लगा रहा. .....सबके मन में सवाल आता है कि मुझे पाकिस्तान की जेल में कैसे रखा गया होगा- परेशान किया होगा या मारा पीटा होगा. ...ये बड़ी स्वाभाविक सी बात है कि जब कोई इंसान पहले-पहले पुलिस के हत्थे चढ़ता है तो अच्छा सुलूक तो नहीं होता. ....यहाँ भारत में भी अगर पुलिस किसी आते-जाते को ही पकड़ ले, तो आमतौर पर उससे अच्छा बर्ताव नहीं करती, फिर मैं तो ग़ैर मुल्क का क़ैदी था. ....जेल में अकेले रखा गया- एकदम अकेले,किसी से मिलने की इजाज़त नहीं थी. समझिए कि बस आख़िरी को दो-चार महीनों में मैं लोगों के साथ घुला-मिला. ....पाकिस्तान आने से पहले मैं भारत में एक हँसता-खेलता परिवार छोड़कर आया था. बड़ा बेटा आठ साल का था, छोटा बेटा चार साल का और मेरी बच्ची तो बस डेढ़ साल की थी. ..जेल पहुँचने के बाद शुरू में मुझे रत्ती भर भी जानकरी नहीं थी कि परिवार वाले कैसे हैं और न ही उन्हें मेरे बारे में कुछ पता था. ......इस बीच मुझे नहीं लगा कि भारत सरकार ने मुझे छुड़ाने की कोई कोशिश की होगी या बातचीत की होगी.
1973 में पकड़े जाने के बाद सज़ा के लिए ज़्यादा इंतज़ार नहीं करना पड़ा मुझे. जल्द ही सज़ा-ए-मौत सुना दी गई.
28 मार्च 1978 को फाँसी लगना तय हुआ. फाँसी लगने में दो घंटे का समय बचा था. लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था...किस्मत के इस खेल के आगे की कहानी अगली बार जारी रहेगी.(
(बीबीसी से साभार)

Monday, June 30, 2008

एक पिता का जवाब





अमिताभ बच्चन को लोग एंग्री यंगमैन के तौर पर जानते हैं ...लेकिन कम ही लोग जानते हैं कि व्यवस्था पर उनका गुस्सा पर्दे पर लोगों ने बाद में देखा....उस कुंठा का पहला शिकार उनके बाबूजी यानी हरिवंश राय बच्चन ही हुए थे। अमिताभ ने उस घटना का ज़िक्र अपने ब्लॉग में किया है जो न सिर्फ, 60 के दशक के एक युवा की कुंठा बयान करती है, बल्कि उनके पिता हरिवंश राय बच्चन की उस शख्सियत को भी रेखांकित करती है , जो एक बड़े कवि होने के साथ साथ एक पिता भी है। ब्लॉग में बिग बी ने लिखा है कि यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उन्हें किसी भी हमउम्र की तरह , कई बार उद्देश्यहीनता का एहसास होता था। 50 और 60 के दशक में आज के जैसी उदारवादी अर्थव्यवस्था तो थी नहीं कि सबसे पास करने को कुछ न कुछ होता। तब इस तरह का एहसास किसी भी किशोर के मन में आना स्वाभाविक था। बिग बी ने लिखा है कि तब कई बार मन में सवाल उठता था कि --मैं आखिर इस दुनिया में आया ही क्यों हूं... कुछ ऐसा ही गुस्सा लेकर भावुक अमिताभ बच्चन एक दिन अपने पिता से अपने सवालों का जवाब मांगने गए। पिता अपने कमरे में बैठे कुछ लिख रहे थे। गुस्से में ,चिल्ला कर अमिताभ ने पूछा --आपने मुझे पैदा क्यों किया ? पिता ने चौंक कर उनकी ओर देखा ...फिर चुपचाप कुछ समझने की कोशिश करते रहे...कोई कुछ नहीं बोला...अमिताभ बच्चन के मुताबिक --कमरे में मौन कुछ इस तरह पसर गया कि या तो मुझे तेज़ तेज़ चलती अपनी सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी या फिर बाबूजी की मेज़ पर रखी टेबल क्लॉक की टिक टिक। पिता की ओर से जब कोई जवाब नहीं मिला तो मैं चुपचाप उल्टे पांव अपने कमरे मे वापस लौट गया... लेकिन रात भर सो नहीं पाया....अगली सुबह मेरे पिता जी मेरे कमरे में आए ...मुझे जगाया और मेरे हाथ में एक कागज़ का टुकड़ा पकड़ा दिया--मैंने देखा वो एक कविता थी--नई लीक..जो कुछ इस तरह थी।


नयी लीक
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ज़िंदग़ी और ज़माने की कशमकश से
घबराकर मेरे लड़के मुझसे पूछते हैं
'हमें पैदा क्यों किया था ? '
और मेरे पास इसके सिवाय
कोई जवाब नहीं है
कि मेरे बाप ने भी मुझसे
बिना पूछे
मुझे पैदा किया था
और मेरे बाप से बिना पूछे उनके बाप ने उन्हें
और बाबा से बिना पूछे उनके बाप ने उन्हें
ज़िंदग़ी और ज़माने की कशमकश पहले भी थी,
अब भी है..शायद ज़्यादा
आगे भी होगी शायद और ज़्यादा
तुम ही नयी लीक धरना
अपने बेटों से पूछकर उन्हें पैदा करना।
--हरिवंशराय बच्चन

Saturday, June 7, 2008

पापा, जवाब दो ना


अब भी याद है 30 साल
पहले की वो बात
जय करते थे हम उस पार्क में
जहां थे मोर, खरगोशऔर थे बारहसिंघे
एक झरना था, पुल था ,
और था एक हाथी
बहुत बड़ा...

हाथी भी क्या खूब
जिसकी पूंछ से चढ़ते और सूंड़ से थे फिसलते
30 साल बाद पार्क अभी है , लेकिन बदरंग
हाथी है ,पर कमज़ोर
झरने की जगह बचा है, तो एक छोटा नाला
जिसमें पड़ी हैं बेजान सैकड़ों पन्नियां,
सिगरेट के डिब्बे और कंडोम
5 साल के मेरे बेटे के उस सवाल का जवाब
मेरे तो क्या
पूरे शहर के पास नहीं है
गेटकीपर,डिप्टी कलेक्टर , कलेक्टर, सीईओ,
एसपी,एसएसपी,और यहां तक कि डिविज़नल कमिश्नर
तक के पास नहीं
बेटे का सवाल था...
पापा.......वो बत्तखें कहां हैं जिनकी
कहानी तुम रोज़ सुनाते हो
जो कभी टहलती थीं किसी झरने में
जहां पानी होता था, हिरन चौकड़ी भरते थे
खरगोश थे ... उजले से,
साही भी था कांटों वाला
और था एक पत्थर का काला हाथी
क्या झूठी थी कहानियां...???

अफसरों से लदे इस शहर में
मैं मूक हूं
किससे पूछूं इसका जवाब
इसलिए सिर्फ कहता हूं
आप अगर इलाहाबाद के किसी
घर से पढ़ लिख कर बने हों कोई अफ़सर
और खेले हों कभी उस काले हाथी की गोद में
तो एक बार ज़रूर जाइएगा वहां
बचपन के रंगीन सपनों को
बदरंग हुआ
ज़रूर देखिएगा
ये विरासत शायद आपने ही
छोड़ी हो
अपने बच्चों के लिए

-----इलाहाबाद से स्कंद शुक्ला


Thursday, June 5, 2008

किरदारों पर दांव



कहते हैं कि कुछ पात्र कभी नहीं मरते... कुछ किरदार दर्शकों के दिलों पर ऐसा अक्स छोड़ जाते हैं जो गुजरते वक्त के साथ धुंधला होने की जगह और गहराता जाता है... फिल्म इंड्रस्ट्री में ऐसे किरदारों को भुनाने का दौर नया नहीं है... हॉलीवुड में तो ये फैशन है ही पर अब बॉलीवुड भी हर हिट किरदार को दोबारा भुनाना चाहता है... नगीना में श्री देवी की नागिन और सपेरे की दुश्मनी दुनिया ने देखी... फिल्म सुपर डुपर हिट रही और श्री देवी की नागिन ऐसा ही न भूलने वाला किरदार बन गई... लेकिन जब श्री देवी नागिन बनकर दोबारा निगाहों के ज़रिये पर्दे पर आईं तो वो दर्शकों के निगाहों में जगह नहीं बना सकीं... ये मिसाल भर है कि हिंदी फिल्म इंड्रस्ट्री में सिक्वल बहुत सफल नहीं रहे हैं... वास्तव में संजय दत्त मुंबई के डॉन बने तो दर्शकों ने उनकी अदाकारी का खूब सराहा... लेकिन वास्तव के सिक्वल हथियार में संजय दत्त के साथ शिल्पा शेट्टी की जोड़ी को खारिज कर दिया... लेकिन सिक्वल फिल्मों के लगातार प्लॉप के बाबजूद दमदार किरदारों का मोह डायरेक्टर नहीं छोड़ पाये... सिक्वल फिल्मों के प्रयोग में सिनेमा के साहूकारों को मोटा मुनाफा दिखाई देता है नहीं तो यशराज फिल्म्स, राकेश रोशन और विधु चोपड़ा जैसे बड़े बैनर सिक्वल पर इतना पैसा नहीं लगाते... लेकिन यहां ये बात भी ध्यान देने वाली है कि एक हिट फिल्म की सफलता से उसी किरदार पर बनने वाली दूसरी फिल्मों से उम्मीदें बढ़ जाती हैं और इसीलिए सीक्वल बनाने के लिए खास तौर पर तैयारी की जरूरत होती है...निर्माता निर्देशक पर दबाब होता है कि वो पिछली फिल्म से बेहतर फिल्म बनाए क्योंकि लोग सिक्वल फिल्म सिर्फ इसलिए देखने नहीं जाते कि फिल्म बेहतर हो बल्कि लोग उस फिल्म की पुरानी फिल्म से तुलना भी करते हैं... हॉलीवुड के जेम्स बॉण्‍ड की तर्ज पर हो सकता कि संजय दत्त मुन्ना भाई २, ३, ४, और ५ में भी देखने को मिलें... मुन्नाभाई एमबीबीएस के हिट होने के बाद लगे रहो मुन्ना भाई भी जबर्दस्त हिट रही थी... हिट सीक्वल फिल्मों में फिर हेरा फेरी का नाम भी शामिल है जो जबर्दस्त कॉमेडी फिल्म हेरा फेरी की सिक्वल है... एक्शन फिल्मों में धूम के बाद धूम २ आई पर सफल हुई सुपरनेचुरल पावर पर बनी कोई मिल गया की सिक्वल कृष... अब सुनने में आ रहा है कि घायल, नो एंट्री और रंग दे बसंती जैसी फिल्मों के सिक्वल की भी तैयारी चल रही है... यानी हिट फिल्मों के रीमेक को भले ही दर्शकों ने सिरे से खारिज कर दिया हो पर हिट किरदारों के सिक्वल पर अभी फिल्मकारों का भरोसा बना हुआ है...
देवेश वशिष््ठ 'खबरी'
9811852336

Friday, May 23, 2008

आरुषि होने के मायने



आरुषि और हेमराज की हत्या में लसी-बंधीं कई गुत्थियां हैं... कुछ सुलझ गई हैं... कुछ सुलझ जाएंगीं... कुछ और उलझेंगी... इस मर्डर मिस्ट्री को जो जितना बेच सकता था, बेचा गया... जो इससे जितना बटोर सकता था, बटोर गया... कुछ दिनों में ये खबर पुरानी हो जाएगी... आरुषि मर्डर के अपडेट ब्रेकिंग से टिकर तक का सफर तय करेंगे और फिर धीरे धीरे गायब हो जाएंगे... यही सही वक्त है जब आप आरुषि को समझ जाएं... उसकी मौत की मिस्ट्री की फिर जांच करें... आरुषि की मौत सिर्फ एक लड़की की मौत नहीं है... हेमराज की मौत, एक नौकर की मालिक से दगाबाजी और उसके अंजाम तक ही नहीं सिमटती... इसके बाद बहुत कुछ है जो सोचा जाना बेहद ज़रूरी हो गया है... आरुषि होने के माइने सिर्फ इतने नहीं हैं... अगर सिर्फ ये होता तो इतना हंगामा न होता... इतनी हायतौबा न होती... आरुषि का मर्डर बड़ी खबर नहीं थी... आरुषि की मौत का खुलासा ज्यादा दर्दनाक है... इसलिए नहीं िक एक बाप ने अपनी लाड़ली इकलौती लड़की को मार दिया... इसलिये भी नहीं कि उसके पीछे एक बड़ी साजिश रची गई... बल्कि ज्यादा डरावने वो हालात हैं जो आरुषि जैसे हादसे की वजह बने... भगवान न करे पर ज़रा उस परिवार से... आरुषि से जुड़कर सोचिये... अपने मां बाप की इकलौती लाड़ली लड़की... नाना नीनी की इकलौती धेवती... चाचा ताऊ की इकलौती भतीजी... कितना लाड़, कितना प्यार बरसता होगा उस पर... पर कितनी अकेली हो गई होगी आरुषी हर जगह से इकलौती होकर... १४ साल की उम्र... उम्र का वो दौर जब हर चीज़ बदलती दिखती है... हार्मोन बदलते हैं... रूप रंग सब बदल जाता है... इस बदलाव में आरुषि को ज़रूरत होगी किसी अपने की... कुछ बताने के लिए... कुछ पूछने के लिए... आरुषि अपने आसपास देखती होगी... नाना... नानी... चाचा... ताऊ... और अगर वक्त मिल गया तो मम्मी, पापा... उसे उसकी उम्र का कोई नहीं दिखता होगा... अपने पास कोई नहीं दिखता होगा... वो बदलाव से गुजर रही थी... इसी बदलाव ने उसे बहका दिया... हेमराज... घर का नौकर... चुलबुली आरुषि को दिन भर परेशान देखता होगा... उसका हाल पूछता होगा... दोनों नज़दीक आ गए... उन्हें कोई रोकने वाला नहीं था... कोई और हाथ नहीं था जो आरुषि को थाम ले... वो बह गई... उम्र के दौर में बदलाव की बयार में... उधर डॉक्टर तलवार... कौन नहीं चाहता अपने बच्चे को वक्त देना... इकलौती जान की जी जान से परवरिश करना... पर आज जिंदगी का जितना वजनदार लबादा हमने ओढ लिया है... उसके बाद वक्त कहां बचता है... न मां के पास... न बाप के पास... पर क्या बीती होगी उस पर जब उसने अपनी बच्ची को बहकते हुए अपनी आंखों के सामने देखा होगा... समझाने की भी कोशिश की होगी... तो अपनी गलतियंा याद आ गई होंगी... वो भी भटक गया था... और उसी बात को लेकर उसकी बीबी से नहीं बन रही थी... कितना बेबस हो गये होगा... कितना मजबूर हो गया होगा... कैसे समझाये... अपना गिरेबां बार बार कोसता होगा... कोई रास्ता नहीं दिखा... कुछ नहीं सूझा... और अपनी फूल सी बच्ची का कत्ल कर बैठा... न डॉक्टर तलवार माफी के काबिल है और न बाकी वो सभी जो इस मिस्ट्री से जुड़े हैं... पर क्या सिर्फ आरुषि की मिस्ट्री सुलझा भर लेने से काम चल जाएगा... क्या ये दोहरी मौत और एक हंसते खेलते परिवार की बर्बादी ये सोचने के लिए काफी नहीं है िक हम आप कितना वक्त दे पा रहे हैं अपने लाड़लों को... शायद यही सही वक्त है... आज आरुषि का जन्मदिन है और यही उसके लिए सबसे बढ़िया तोहफा होगा...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9811852336

आरूषि की चिट्ठी

डियर पापा
दुनियावी रस्म तो नहीं है कि ये खत आपको मिले...क्योंकि अब तो मैं उस देहरी पर हूं ही नहीं....जहां रिश्ते अब किसी दूसरे जामे में देखे जाते हैं। लेकिन मैं जानती हूं मैं जो लिख रही हूं वो आपके जेहन में है....सवाल कई हैं पापा...कितने पूछूं...कितने छोड़ दूं....कहां से शुरू करूं.....वहां से जब आप मुझे अस्पताल से रूई के फाहों में सहेज कर लाए थे....या वहां से जब अपने कांधे पर लेकर सीढ़ियां उतरे ......पापा....आपके पास इतना भी वक्त नहीं रहा कि कभी मेरा स्कूल बैग चेक कर लिया होता...तो पापा मैं क्या कर रही हूं , कैसे कर रही हूं...इससे आपको भले ही कोई मतलब न हो..मुझे इससे था कि आप क्या कर रहे हैं.....सोचना पापा...जेल की उस अंधेरी कोठरी के एक कोने में बैठ कर ....कि कहां चूक हो गई हमसे.....और मां....तुम भी सोचना कि अभी तक चुप क्यों हो...तुम

तुम्हारी
बेटू

Friday, May 9, 2008

तुम्हारे लिए


भीगी आंखों से पढ़
उस ख़त की एक एक इबारत
जल उठा एक छोटा सा
दीपक
मेरे एकदम भीतर
वेदों की पवित्र रिचाओं
सी तुम प्रकट हुईं और गर्म होठों
से छू लिया मेरा माथा

Wednesday, May 7, 2008

गंगा जो इक नदी थी.....

चौंकिए मत, ये तस्वीर जो आप देख रहे हैं...जोधपुर या बाड़मेर की नहीं है। इलाहाबाद का रसूलाबाद घाट है जहां से होकर नदी कुछ अरसा पहले तक बहती थी। आज गंगा की जगह अगर कुछ दिखता है तो सिर्फ रेत के ढूहे और ऊंटों के लंबे कारवां। यहां से कुछ दूर पर ही वो संगम है जिसका पुराणों में उल्लेख है। कहते हैं कि अब सिर्फ गंगा और यमुना हैं...सरस्वती विलुप्तप्राय है। सवाल है - कहीं गंगा का भी यही हश्र न हो ? ये फोटो इलाहाबाद से स्कंद ने भेजी है जो पर्यावरण को प्रति उतने ही चिंतित हैं जितना अपने बेटों के भविष्य को लेकर।