Wednesday, June 17, 2009

मेराज़ साहब और वो शाम

मेराज़ फ़ैज़ाबादी बहुत बड़े शायर हैं और मैं उनसे एक बार 1992 में लखनऊ में मिला हूं। अब शायद उन्हें याद भी न हो..लेकिन पिछले हफ्ते लखनऊ में ही एक शाम चाय पर उनके साथ बीती। अच्छी आवाज़ और सुंदर शब्दों का जो सेलेक्शन उनकी बातचीत में होता है,वो यकीनन किसी भी अच्छे साहित्यकार की पहचान होता है। उनको बैठकर इत्मीनान से सुनना अपने आप में एक एहसास है। शायर तो हैं ही..किस्सागो भी हैं मेराज़ साहब। किस्से तो नहीं लेकिन बातचीत में कुछ अनुभव उन्होंने सुनाए जो भीतर तक भिगो गए। मेराज़ साहब 1993 में एक मुशायरे में मस्कत गए तो कुवैत के पाकिस्तानी राजदूत और उनकी पत्नी से उनकी मुलाकात हुई। करामतुल्ला गौरी और उनकी शरीक-ए-हयात आबिदा करामत। पति-पत्नी दोनों शायर थे और मुशायरे का एक हिस्सा भी। एंबेस्डर साहेब की बेगम ने जो शेर पढ़ा वो मेराज़ साहेब आज तक नहीं भूल पाए हैं...ये शेर उन्होंने अपने बेटे की याद में लिखा था जो पढ़ने के लिए अमरीका चला गया था। ये शेर कुछ यों था..

वो क्या गया कि दर-ओ-बाम हो गये तारीक
मैं उसकी आंख से घर का दिया जलाती थी।
ये शेर सुनाते सुनाते मेराज़ साहब की आंखों में पानी आ जाता है..कहते हैं कि ऐसे उम्दा शेर उन्होंने बहुत कम सुने और उस मुशायरे के बाद बेगम आबिदा करामात के लिए उनके मन में इज़्ज़त बढ़ गई। मेराज़ साहब यहीं नहीं रुकते। बताते हैं कि आगे चलकर कई सालों बाद बेगम साहिबा से उनकी एक और मुलाकात शिकागो में हुई। शिकागो में उन्होंने बरसों से ज़ेहन में दबा एक सवाल उनसे पूछ ही लिया। उन्होंने पूछा कि आपका हिंदुस्तान से क्या रिश्ता है। बेगम ने तपाक से कहा-मेराज़ साहब, मैं पाकिस्तानी एंबैस्डर की बीवी हूं...मुझसे हिंदुस्तान की बात क्यों। मेराज़ साहब ने कहा-क्योंकि ऐसी सोच सिर्फ उसी धरती से मिल सकती है..आप बताएं आप हिंदुस्तान के किस इलाके से वास्ता रखती हैं। बेगम ने ठंडी सांस ली और बताना शुरू किया.....मेराज़ साहब, आप का अंदाज़ा सही है। उम्र के 12 बसंत मैंने झांसी में बिताए हैं...वही झांसी..रानी लक्ष्मीबाई वाली। 12 बरस की उम्र में जब देश टूटा तो मां बाप के साथ मैं पाकिस्तान आ गई। आ तो गई लेकिन वो घर...उसकी देहरी ...उसके कमरे...सब कुछ मुझे भुलाए नहीं भूला। पढाई लिखाई की और फिर शादी...कई पड़ाव ज़िंदगी के पीछे छूटते गए लेकिन झांसी का वो घर न भुलाया गया। झांसी फिर से देखने की ललक लिए लिए कई साल बीत गए। डिप्लोमैट्स को हिंदुस्तान का वीज़ा मिलना कोई आसान नहीं होता , लेकिन फिर भी कई कोशिशो के बाद आखिर एक दिन झांसी जाने का मौका मिल ही गया। दिल्ली आई और सिर्फ एक अदद अटैची लेकर ट्रेन से झांसी रवाना हुई। शहर बदला हुआ सा था ...लेकि न अपने घर जाने की न जाने कैसी उमंग थी...कि सब कुछ जाना पहचाना सा लगता था। इक्के से मैं अपने उस मोहल्ले पहुंची....और कहीं खो गई। घर न जाने कैसे हो गए थे। कुछ नए मकानात बन गए थे और मोहल्ला कुछ सिकुड़ा सिकुड़ा सा लग रहा था। कुछ पलों के लिए मैं देश और सीमाएं भूल गई - होश आया तो सामने एक बूढ़े हज़रत खड़े थे...लंबी दाढ़ी...सौम्य चेहरा...उन्होंने पूछा-किसको खोजती हो बेटी ? मैंने अपने वालिद का नाम बताया ...तुरंत जवाब आया बगल वाली गली में चली जाओ बेटी...घुसते ही दूसरा घर है। मुझे हैरत थी..जिस धरती से हमने हर नाता तोड़ लिया था ..वहां लोगों को वालिद का नाम अब भी याद है.....वो वक्त भी आया जब मैंने खुद को अपने उसी घर के सामने खड़ा पाया , जिसे आज से कई बरस पहले छोड़कर हम पाकिस्तान चले गए थे। अटैची ज़मीन पर रखी और पहले जी भर कर उस इमारत को देख लेना चाहा..जो अब अपनी नहीं थी। चौंकी तब जब घर के किवाड़ खुले और एक पचासेक के आसपास की महिला सामने आकर खड़ा हो गईं। पूछा-कौन हो बेटा-कहां जाना है। मैंने कहा-अम्मां , मैं यहीं आईं हूं ..इस घर में 12 बरस बचपन के बिताए हैं मैंने...अब पाकिस्तान में हूं....ये घर मेरे सपने में आता था...आज देखने आई हूं। जवाब भी तपाक से आया-अरे बेटी , तो खड़ी क्यों हो ...अपने घर आने के लिए सोचना कैसा.. उन्होंने मेरा हाथ पकड़ा..और सीधे घर के भीतर ले गईं। वो एक ऐसा हिंदू परिवार था जो विभाजन के बाद पाकिस्तान से यहा आया था । उसे हमारा घर दे दिया गया था। भीतर आकर उन्होंने ऊंची आवाज़ लगाई और सबको बुला लिया..और कहा-देखो बेटी आई है। इसका कमरा खाली कर दो....हफ्ते भर उस घर में मेराज़ साहब , मैं वैसे ही रही , जैसे शादी के बाद कोई लड़की अपने मायके में रहती है। और जब चलने का दिन आया...तो क्या देखती हूं...कि दरवाज़े के बाहर , चबूतरे पर मेरी उस एक अटैची के साथ तीन बड़ी बड़ी अटैचियां रखीं हुईं हैं। मेरे मुंह से बेसाख्ता निकला-अरे अम्मां ये क्या ? अम्मां ने मुझे थाती से चिपका लिया..बोलीं...बेटी हो ना...तो ऐसे वैसे थोड़ी न विदा करूंगी।
बेगम साहिबा ने फिर एक लंबी सांस ली। उनकी आंखें नम हों गईं थीं। बड़ी मुश्किलों के बाद वो बोल पाईं-तो मेराज़ साहब ...आपने सही पहचाना...ये था मेरा हिंदुस्तान से वो रिश्ता जो कोई झुठला नहीं सकता।

ये सच्चा किस्सा बयान करते करते मेराज़ साहेब का गला भर आया। वो कहीं खो से गए...उनकी चाय ख़त्म हो चुकी थी और उनका बेटा भी उन्हें लेने के लिए दरवाज़े पर खड़ा था।

Wednesday, June 3, 2009

खबरी की पांच छहनिकाएं


दीवार पर गढ़ी कील,
दिल-दीवार,
बाकी तुम..!

बांस सा ज्वार,
फनकार,
बंसी की धुन!
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चुक गए सवाल,
सांस,
मोक्ष-

रंगीन पानी...
तेरा अक्स...
होश!
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आहट,
अकेलापन,
डर-

न तू,
न मां,
न घर!
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खारा सागर,
टूटी बोतल,
जिन्न-

कारे आखर,
कोरे कागज,
तेरे बिन!
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तड़पती भूख,
रेगिस्तान,
प्यास!

वादियां... झरना...
तू...
काश!
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देवेश वशिष्ठ खबरी
9953717705