Wednesday, April 22, 2009

राष्ट्रपति भवन में कूड़ा डालना और पेशाब करना मना है...


जी हां... बात कुछ अटपटी लग सकती है... पर यकीन जानिये ये बात मैंने बिल्कुल बिना मोड़े-तोड़े और बिना शब्दों से खेले लिखी है... राष्ट्रपति भवन में वास्तव में कूड़ा डालने पर प्रतिबंध लगा हुआ है... और तो और कोई भारतीय सज्जन वहां दीवार की ओट लेकर या कोई कोना पकड़कर पेशाब भी नहीं कर सकता... मैं मजाक नहीं कर रहा हूं... बल्कि जो देखकर आया हूं, वही बता रहा हूं... एक बात और ये बात विदेशियों पर लागू नहीं होती... खतरा सिर्फ हिंदुस्तानियों से है इसलिए ये आदेश भी सिर्फ उन्हीं के लिए है... दरअसल हुआ यूं कि मैं अपने एक मित्र के साथ तफरी करने यूं ही राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया... और धूप कड़ी थी इसलिए मुख्य परिसर के ही अंदर किसी पेड़ की छांह लेने का मन किया... लेकिन देश के सबसे संवेदनशील स्थान पर हर जगह अपनी मन मर्जी तो चलाई नहीं जा सकती... इसलिए पूरे सम्मान से सभी सरकारी आदेशों का पालन करना भी जरूरी है... राष्ट्रपति भवन में एक ऐसे ही आदेश का बोर्ड दिखाई दिया... उसका मजमून यही था जो मैंने अक्षरश: इस पोस्ट के ऊपर लिख दिया है... ये आदेश मुझे कुछ अटपटा नहीं लगा... क्योंकि जैसे देश भर की दीवारें हकीम उसमानी या डॉक्टर शेखों के इलाज की गारंटियों से पटे रहते हैं... वैसे ही हमारी प्यारी दिल्ली में ‘यहां पेशाब करना मना है’ का आदेश कई क्रियेटिविटियों से गुजरता हुआ गधे के पूत यहां मत ... तक हो जाता है. कई जगह पर्यावरण, स्वास्थ्य और समाज के प्रति जागरूक लोग व्यक्तिगत पहल करते हुए दीवारों पर ये नेक नारे लिखते हैं तो कहीं कहीं कुछ बेहद समाज सेवी संस्थाएं ये काम करती हैं... लेकिन दिल्ली प्रशासन और सरकार को भी इस राष्ट्रीय परेशानी का इल्म है, और जगह जगह उसने इस काम में खुद भी भागीदारी की है... दिल्ली में लगभग हर चौराहे पर साफ सुथरे शौचालय हैं जो प्राय: साफ सुथरे ही बने रहते हैं... नई दिल्ली रेलवे स्टेशन को छोड़ दें तो मैंने उनमें आते जाते लोग कम ही देखे हैं... प्रकृति-प्रेमी और खुली हवा में जीने की इच्छा रखने वाले हम खुले में ही करने के शौकीन भी हैं... लेकिन खुले खेल का ये डर राष्ट्रपति भवन तक में है ये मुझे नहीं पता था... अब ये भी जान लीजिये कि ये आदेश आया कहां से... रायसीना हिल्स को समतल करके वहां भव्य भवन तो अंग्रेज बना गये लेकिन वहां कूड़ा फेंकना मना है और गधे के पूत यहां मत ... लिखना वो भूल गए... अंग्रेजों की इस मिस्टेक को सुधारा है लोक निर्माण विभाग ने... वैसे प्रेशर वाली बात तो ठीक है लेकिन सरकार वाकिफ है कि हम राष्ट्रपति भवन तक में जाकर कूड़ा फेंकने तक की हिम्मत रखते हैं... एक बात और... ये आदेश सिर्फ हम हिन्दुस्तानियों के लिए ही है... मेहमानों को इससे छूट मिली हुई है... मेरा यकीन न हो तो फोटो को दोबारा ध्यान से देखें... दिल्ली में लगे अमूमन सभी आदेश हिन्दी और अंग्रेजी दोनों में होते हैं... लेकिन इस महत्वपूर्ण जगह पर ये महत्वपूर्ण आदेश सिर्फ हिंदी में ही है... मैं समझता हूं इतना काफी है... आप समझ गए होंगे कि राष्ट्रपति भवन में कूड़ा फेंकना और पेशाब करना सख्त मना है...


देवेश वशिष्ठ खबरी

+91-9953717705

आकृति की मौत के बहाने


17 बरस की आकृति अब इस दुनिया में नहीं है। दिल्ली के मॉडर्न स्कूल में पढ़ने वाली आकृति दमे की मरीज़ थी और सोमवार को जब उसे दौरी पड़ा तो देश के सबसे मंहगे स्कूलों में से एक मॉडर्न स्कूल ने हाथ खड़े कर दिए। मेडिकल फेसिलिटी के नाम पर सैकड़ों रुपये हर महीने हर बच्चे से ऐंठने वाले इस स्कूल में एक नर्स भर थी....आकृति की तबीयत जब ज़्यादा बिगड़ गई और उसके मां बाप उसे अस्पताल लेकर जाने लगे तो जैसा कि लोग बताते हैं...उस नर्स ने ऑक्सीजन का मास्क तक हटा लिया। नतीजा-आकृति ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया।

अब आइए असल कहानी पर। दिल्ली और देश के सारे बड़े पब्लिक स्कूलों में मेडिकल सुविधा के नाम पर हर बच्चे से हर महीने 500 से ज़्यादा वसूल किया जाता है। ठीक है...वसूलिए...लेकिन जब असल ज़रूरत पड़े तो आपकी सारी मशीनरी ही फेल हो जाए...तो सवाल खड़े होते हैं...क्या स्कूल अब धंधा बन चुका है...वैसे ही जैसे अस्पताल खोलना, शराब का ठेका चलाना वगैरह वगैरह....। यानी शन्नो हो या आकृति , MCD का स्कूल हो या फिर कनॉट प्लेस के मुहाने पर खड़ा -मॉडर्न स्कूल...हर जगह बच्चे की जान लेने पर सिस्टम आमादा है। कोई देखने वाला नहीं है कि शन्नो को धूप में मुर्गा बना देने वाली टीचर की गलती है या फिर उस व्यवस्था की, जिससे निकल कर ऐसे लोग टीचर बनते हैं।

Saturday, April 18, 2009

तुम खट्टी होगी...


तुम खट्टी होगी...
पर सच्ची होगी...
अभी छौंक रही होगी हरी चिरी मिर्चें...
खट्टे करौंदों के साथ...
या कच्ची आमी के...
या नींबू के...
या ना भी शायद...

नाप रही होगी अपना कंधा...
बाबू जी के कंधे से...
या भाई से...
और एड़ियों के बल खड़ी तुम्हारी बेईमानी
बड़ा रही होगी तुम्हारे पिता की चिंता...

तुम भी बतियाती होगी छत पर चढ़ चढ़
अपने किसी प्यारे से...
और रात में कर लेती होगी फोन साइलेंट...
कि मैसेज की कोई आवाज पता न चल जाए किसी को...
तुम्हें भी है ना...
ना सोने की आदत...
मेरी तरह...
या शायद तुम सोती होगी छककर... बिना मुश्किल के...
जब आना...
मुझे भी सुलाना...

गणित से डरती होगी ना तुम...
जैसे मैं अंग्रेजी से...
या नहीं भी शायद...
तुम लड़ती होगी अपनी मम्मी से...
पापा-भैया से भी,कभी कभी...
मेरी तरह...
पर तुम्हें आता होगा मनाना...
मुझे नहीं आता...
बताना...
जब आना...

तुम खट्टी होगी...
चोरी से फ्रिज से निकालकर
मीठा खाने में तुम्हें भी मजा आता होगा ना
तुम भी बिस्किट को पानी में डुबोकर खाती होगी...
जैसे मैं...
या शायद तुम्हें आता होगा सलीका खाने का...
मुझे भी सिखाना...
जब आना...

देवेश वशिष्ठ 'खबरी'
9953717705

क्यों कर ली मोहब्बत


हथेली पे तेरा नाम उभारा क्योंकर

तुझको नज़रों के समंदर में उतारा क्योंकर

तेरा नाम मेरे नाम से मिलता ही नहीं

इस तरह नाम तेरा लेके पुकारा क्योंकर

मेरी बस्ती के उजाले भी खफ़ा हैं मुझसे

चांद तारों को अंधेरों में उतारा क्योंकर

इन निगाहों को निगाहों की कोई फिक्र नहीं

फिर ये छुप छुप के निगाहों का इशारा क्योंकर

तेरी दुनिया में सवालों के सिवा कुछ भी नहीं

फिर ये रंगीन निगाहों का नज़ारा क्योंकर

लो चलो खत्म हुआ अपना बिछड़ना मिलना

जिनसे मिलना ही नहीं उनसे किनारा क्योंकर


मसरूर अब्बास

Saturday, April 11, 2009

मैं श्रवण कुमार


अम्मां
अपने कमरे की दीवार पर
टांग ली है मैंने
तुम्हारी 30 साल पुरानी तस्वीर
और बन बैठा हूं श्रवण कुमार

तस्वीर काफी पुरानी है अम्मां
तब तुम हंसती थी
घर के हर कोने पर
अपनी मौजूदगी का अहसास
कराती थीं

रसोई के मुहाने से लेकर
लॉन के आगे गेट तक
हर जगह था तुम्हारा साम्राज्य
लेकिन अब कहां हो तुम अम्मां

एक और तस्वीर है अम्मां
बाबूजी और तुम्हारी
काले सूट और टाई में बाबूजी
और बाईं ओर तुम
संतुष्ट गृहिणी की तरह

अब तुम्हें रोज़ सुबह
उठकर देख लेता हूं
और डींगें हांकता हूं
लोगों से कहता हूं कि मैं
याद करता हूं अपनी अम्मां को
फ्रेम में जड़ी तस्वीर वाली
अम्मां को।

मैं हूं श्रवण कुमार


अम्मां

अपने कमरे की दीवार पर

टांग ली है मैंने

तुम्हारी 30 साल पुरानी तस्वीर

और बन बैठा हूं श्रवण कुमार


तस्वीर काफी पुरानी है अम्मां

तब तुम हंसती थी

घर के हर कोने पर

अपनी मौजूदगी का अहसास

कराती थीं


रसोई के मुहाने से लेकर

लॉन के आगे गेट तक

हर जगह था तुम्हारा साम्राज्य

लेकिन अब कहां हो तुम अम्मां


एक और तस्वीर है अम्मां

बाबूजी और तुम्हारी

काले सूट और टाई में बाबूजी

और बाईं ओर तुम

संतुष्ट गृहिणी की तरह


अब तुम्हें रोज़ सुबह

उठकर देख लेता हूं

और डींगें हांकता हूं

लोगों से कहता हूं कि मैं

याद करता हूं अपनी अम्मां को

फ्रेम में जड़ी तस्वीर वाली

अम्मां को।

Tuesday, April 7, 2009

ज़ुबान की राजनीति

चुनावी मौसम में राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ना तो लाज़िमी है। लेकिन वोट बैंक जुटाने के लिए जिस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं वो सिवाए लानत के मन में कोई और भाव पैदा नहीं करते। राजनीति में 'राज' से भी ज़्यादा 'अराजकता' का अस्तित्व फलता-फूलता दिखाई देने लगा है। वरुण गांधी का विलेन बनना, उस पर माया-मेनका की डॉयलॉग डिलीवरी और फिर कहानी में लालू का नया एंगल.. यानी एक पालीटिकल थीम पर बनने वाली फिल्म के लिए सारे चालू मसाले मौजूद हैं। मामला थमा भी नहीं था कि राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री नीतिश कुमार के खिलाफ़ जो ज़हर उगला, वो एक राजनैतिक लड़ाई कम और एक व्यक्तिगत लड़ाई ज़्यादा दिखाई दी। समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह का महिला डीएम के साथ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करना। नेताओं के बीच चल रहा ये वाक्-युद्ध ये पूछने पर मजबूर करता है कि...

  • इस तरह का गैरजिम्मेदाराना और निहायती शर्मनाक व्यवहार अपनाने वाले नेताओं को क्या हम ये अधिकार देने के लिए तैयार हैं कि वो हमारा प्रतिनिधित्व करें ?
  • लाखों लोगों के बीच चुनावी रैली करने वाले इन नेताओं के पास एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने की बजाए क्या कोई वैचारिक ज़मीन या सोच है ?
  • क्या हम कभी भी जाति और धर्म की राजनीति से ऊपर नहीं उठ पाएंगे और यूं ही इन घटिया मुद्दों के आधार पर वोटो का ध्रुवीकरण होता रहेगा ?

------मीनाक्षी कंडवाल-------

नीली छांह...


नीली स्याही... नीला कागज...

नीला बादल... नीला दु:ख...

नीली आंखों वाली की हर याद बहुत नीली है...

नीला सरगम... नीला पंचम...

नीली बातें... नीला चुप...

नीले-नीले जीवन की हर सांस बहुत नीली है...

लिख-लिख कर कागज पर सपने,

आग लगाए हाथों से...

जलते नीले सपनों की ये आग बहुत नीली है...

अब सूरज का बंद हुआ है,

मेरे घर आना जाना...

और तभी से इस कमरे की रात बहुत नीली है...

नीले पत्ते... नीली खुशबू...

नीली मिट्टी... नीली छांह...

मेरे रोपे हर पौधे की शाख बहुत नीली है...

नीला हंसना... नीला रोना...

नीला नीला कह देना...

अक्षय-अक्षय तेरी-मेरी, जात बहुत नीली है...


देवेश वशिष्ठ खबरी...

जरनैल का जूता

इराक के पत्रकर जैदी ने मानों दुनिया भर के लोगों को एक रास्ता दिखा दिया है। जब हद हो जाए-तो क्या करे कोई। 1984 में सैकड़ों सिख मारे गये थे और आज 25 साल बाद उन दंगों के सारे आरोपी बाहर हैं। जैदी के ज़हन में था इराक की बर्बादी का सवाल...उसने जूता मारने से पहले बुश से कोई सवाल नहीं पूछा था। बरसों से अपने ज़ेहन में पनप रहे ग़ुस्से को ज़ैदी ने एक शक्ल दी-जूता फेंक दिया...सीधे साधे जरनैल सिंह भी मन से हिंसक नहीं हैं। मैं उन्हें कई दिनों से जानता हूं....अगर सरकार बदमाशी पर उतर आए तो कोई सीधा साधा आदमी हताशा में क्या कर सकता है ...जरनैल का ऐक्शन यही बताता है।