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वो तेरी दुनिया

अलगनी पर टांग आया हूं
उन्हें गीले कपड़ों की तरह
तुम्हें फुर्सत मिले अगर
अपनी आभासी दुनिया से कभी
तो दरवाज़ा खोल कर
एक बार बाहर आना
वो वहीं मिलेंगे गेट के पास
जहां मैं उन्हें छोड़ आया था
मुमकिन है उनमें थोड़ी जान बची हो
सांस बाकी हो
लेकिन तुम उनके बहकावे में
मत आना
पास के किसी नाले में
उनका तर्पण कर आना
आखिर वो
मेरे एहसास जो ठहरे

 रा.त्रि

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म्हारी प्रीत निभाजो जी

"प्यार में तकलीफ ही क्यों होती है ?"

"इसलिए कि प्रेम अधिकार देता है, और वो जब मिलता नहीं या मिलने का सिर्फ छलावा देता है तो एकाकीपन घेर लेता है। और उससे दुख का जन्म होता है।"

"प्रेम में तो एक से दो होते हैं न ? तो ये अकेलापन क्यों ?"

"अरे पगली, कभी-कभी तो एक और एक मिलकर ग्यारह भी हो जाते हैं। लेकिन कभी-कभी बस ज़ीरो। यही तो कलर्स हैं प्रेम के। कहीं फीके...तो कहीं चटक...कहीं ऐसे रंगीले कि वो रंग ही जैसे पहली बार दिखे हों...और कभी- कभी तो इतने उदास से कलर्स भी... जैसे पतझड़ वाली कोई दोपहर हो...अकेली... नितांत एकाकी।"

" प्रेम अधिकार देता है, तो प्राब्लम कहां है फिर "

" अरे मेरी सोनचिरैया....प्रेम अधिकार का अहसास कराता है, लेकिन वो अहसास बड़ा छलिया होता है रे...वो होता भी है ...और नहीं भी होता। अधिकार जो शब्द है न, बड़ा भ्रामक है, कभी लबालब छलकता सा है और कभी रीते प्याले सा पड़ा रहता है।"

" अच्छा एक बात बताओ रिक्की....ये प्रेम होता क्यों है...आई मीन ऐसा क्या होता है हमारे मन में जो हमें मुहब्बत हो जाती है।"

" तुम बताओ न ? तुम्हें क्या महसूस हुआ था पहली बार....जब तुम्हें लगा था कि तुम्हें मुझसे इश्क हो गया है।"

" एक्चुअली जब मुझे पहली बार कुछ हुआ था न....तो उसके कई दिन बाद इश्क जैसा महसूस हुआ था कुछ। तुम्हें बार-बार मुड़ कर देख लेने का मन होता था....कनखियों से देख लेने का मन.....रात में सोते वक्त तुम्हारा ख्याल और फिर सुबह उठते तुम्हारी शक्ल आंखों के सामने। लेकिन तुम मेरी ओर देखते भी नहीं थे, इसलिए गुस्सा भी आता था मुझे तुम्हारे ऊपर। मैं सोचती थी- जाने क्या समझता है अपने आप को। फिर मुझे लगा कि ...यार दरअसल उसके ऊपर नाराज़ होने से अच्छा है खुद को देखूं। मैं भी तो ऐसी ही हूं। बस...मेरी निगाह उस दिन से हर रोज़ क्लास में तुम्हें ही खोजने लगी। फिर एक दिन एहसास हुआ कि वो गुस्सा जाने कब मोहब्बत में बदल गया।"

" मुझे लगता है प्रेम की केमिस्ट्री बड़ी अजीब होती है... इश्क उसी से होता है , जो आप से बेहतर होता है....मतलब ज्ञान में हो....दिखने में हो....शार्पनेस में हो...स्मार्टनेस में हो....कुछ तुमसे अलग हो ..तो पहले आकर्षण ...फिर प्रेम। "

" तो फिर कभी-कभी अचानक ऐसा क्यों लगने लगता है कि प्रेम कम होने लगा है ? "

" प्रेम में जब एक व्यक्ति दूसरे से बहुत प्रेम करने लगता है...तो हमेशा उसके आसपास रहना चाहता है, हमेशा उस से बात करना चाहता है...ऐसा होने से दूसरे को अक्सर थोड़ी बोरियत होने लगती है...वही बातें , वहीं शक्लें...याद रखो इश्क में पड़े किन्हीं भी दो लोगों का प्यार का लेवल बराबर नहीं होता। उनमें से एक के प्यार का प्याला लबालब भरा होता है और दूसरे का थोड़ा खाली। बस इसी से गड़बड़ियां शुरू होती हैं। जब आप थोड़ा दूर होते हैं तो इश्क में भीगे-भीगे से रहते हैं। जादुई मैनरिज़्म होते हैं दोनों के। वो कैसे बालों को झटका देती है...कैसे नाराज़ होती है...वो कैसे लापरवाह-लापरवाह सा रहता है....क्या शानदार चाल है उसकी...वगैरह वगैरह। दिन में एक बार मिलते हैं तो सब कुछ करिश्माई ही लगता है। लेकिन जब पास आ जाते हैं तो एकदूसरे की छोटी-छोटी ग़लतिया भी बड़ी दिखने लगती हैं। "

"अच्छा ये बताओ, क्या प्रेम कई बार होता है ?"

" देखो, प्रेम रोज़ सुबह उठकर ब्रश करने या शेव करने जैसा कोई रूटीन काम नहीं होता, जो रोज़ हो जाए। रोज़ किसी नये आदमी से प्रेम नहीं हो सकता। आकर्षण हो सकता है रोज़-रोज़। प्रेम की अवस्था आकर्षण के बाद की है.....थोड़ा ऊपर का मामला है ये। जब आप प्रेम करते हैं ना....तो आपके इश्क का ग्राफ धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है...अपने पीक पर पहुंचता है...ज़्यादातर मामलों में कुछ देर ठहरता है...फिर उसी रफ्तार से नीचे भी आ जाता है। ज़िंदगी की सच्चाइयों से रू-ब- रू होते ही शिकवे-शिकायतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। और फिर अक्सर दोनों लोग कोई आसरा खोज लेते हैं। कई केस ऐसे भी होते हैं जहां एक बार चरम पर पहुंच कर ग्राफ कभी नीचे आता ही नहीं। हमेशा वहीं बना रहता है। प्रेम होने और फिर रिश्ता टूटने में ही इतने बरस हो जाते हैं कि दूसरी बार प्रेम भी इतनी जल्दी नहीं होता। व्यक्ति पहले उस टूटन से उबरने में वक्त लेता है...और जब तक फिर लगता है कि उसे किसी से प्यार हो रहा है...तब तक आधी ज़िंदगी बीत चुकी होती है। "

" हम्म्म्म्म......... तो इश्क में तो पीएचडी हैं आप....हैं ना ?"

" नहीं.....डी लिट.....हा हा हा हा " -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -- -

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और सियाराम मर गया

और सियाराम मर गया..उस चिट्ठी का इंतज़ार करते करते जो शायद उसके बेटे को नकली पैरों का एक जोड़ा दिलाती...अपनी बेचारगी से उपजने वाली शर्मिंदगी से निजात दिलाती..18 बरस का उसका जवान बेटा साल भर पहले ट्रेन से गिरकर रेल के पहियों के नीचे आ गया...और अपने दोनों पैर गंवा बैठा..उसका दुख हमारी एक रिपोर्टर से देखा नहीं गया और उसने सियाराम की मदद करने की ठान ली। कोशिशें शुरू हुईं सियाराम को सरकार की ओर से मदद दिलाने की। पता चला कि एक लाख रुपये का खर्चा है ...मंत्री जी चाहेंगे तो अपनी ओर से मदद दिलवा देंगे...ये भी कि सियाराम के बेटे को जो नकली पैर लगाए जाएंगे उनसे वो चलने लगेगा..कमोबेश वैसे ही जैसे हादसे से पहले चलता था। सियाराम हमारे ऑफिस का ड्राइवर था और उसकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि एक लाख रुपये का जुगाड़ कर पाता। एक लाख तो क्या...वो तो अपने उस बुखार की भी दवा नहीं कर पाया जिसे उसने मामूली समझा था और जिसने आखिर उसकी जान ही ले ली। खैर...साहब, सियाराम के बेटे को नकली पैर दिलाने के लिए नकली कोशिशें शुरू हो गईं। 

कोशिशों को नकली बड़े भारी मन से कह रहा हूं..इसलिए कि उन सारी कोशिशों में कुछ कोशिशें मेरी ओर से भी थीं...और सियाराम के जीते जी उसके बेटे के पैर नहीं लग पाए..तो कोशिशें नकली ही समझिए.... ये मलाल मुझे अब भी खाए जा रहा है। रिपोर्टर की हैसियत होती है , कुछ यही सोच कर मैंने अपने एक रिपोर्टर को ये इमोशनल सी ज़िम्मेदारी सौंपी..कि वो अपने 'रिश्तों'के चलते उसे वो एक लाख रुपया दिलवा पाए जो सियाराम के बेटे को चाहिए। सुबह सुबह मैं जैसे ही अपनी कुर्सी पर आकर बैठता..उदास सियाराम सामने आ खड़ा होता..नि:शब्द...मूक। सच बता रहा हूं..मैं उसे आते देखता नहीं था ...लेकिन आभास हमेशा हो जाता था कि वो आकर खड़ा हो गया है....उसके सवाल जो वो कभी पूछता नहीं था..यकीन करिये.. बहुत तीखे होते थे.....मुझे पता होता था--वो कह रहा है ...साहब अब तक कुछ हुआ नहीं.....। अब लगता है सियाराम आर के लक्ष्मण के कार्टूनों का वो 'आम आदमी' था जो कभी कुछ बोलता नहीं है..हमेशा वो सब देखता रहता है जो उसके सामने हो रहा है। 'वो'कुछ कर नहीं सकता...बस गवाह है उन सारी अकर्मण्यताओं का , सारी नपुंसकताओं का जो हमारे शरीरों में भर दी गई है...और जैसे किसी बोरे में कुछ भरकर सूजे से सिल दिया जाए...वैसे ही कुछ । 

सियाराम की अर्जी जिस दिन से सरकारी फाइलों में लगी ...उसके जैसे पंख लग गए....फाइल थी कि जैसे हवाई जहाज़...खूब उड़ी...कभी अफसर छुट्टी पर ..तो कभी मंत्री दौरे पर..कभी होली की छुट्टियां तो कभी दीवाली की....इस बीच एलेक्शन भी सिर पर आ गया...अब मंत्री जी ढ़ंढे नहीं मिल रहे। खैर ...मंत्री के लिए देश और उसकी जनता पहले है...इसलिए सियाराम थोड़ा 'पीछे' रह गया। देश जब इन सारी 'ज़रूरी' जद्दोजहद से गुज़र रहा था-एक दिन सियाराम मर गया। पता चला ..उसे बुखार हुआ था और उसके शब्दों में.. जाने क्यों उसका पीछा ही नहीं छोड़ रहा था। बुखार डेंगू साबित हुआ और उसने बीमार सियाराम की जान ले ली। वो मर गया लेकिन जाते जाते उसने हम सबकी पोल खोल दी। उसने ये बता दिया कि बात बात पर हांकने वाले पत्रकारों की हैसियत दरअसल क्या है.

उसने पोल खोल दी कि दुनिया भर की सच्चाई उजागर करने वाले भीतर से कितने कमज़ोर होते हैं...ये भी कि चौथे खंभे की असलियत क्या है। सवाल पूरे सिस्टम पर है। मंत्री जी जब दस्तखत करते हैं तो फाइल क्यों रुक जाती है...चल भी गई तो कागज अफसरों की टेबल पर पड़ा धूल क्यों फांक रहा होता है...किस्मत से काग़ज़ अगर चेक में तब्दील हो भी गया तो डाक में खो क्यों जाता है। और ऐसा सियाराम जैसे गरीब ड्राइवर के साथ ही क्यों होता है। देश में लाखों करोड़ों के चेक इधर से उधर आते - जाते हैं...फिर ऐसा सियाराम के साथ ही क्यों हुआ। रिपोर्टरों से अब नेता और अफसर डरते क्यों नहीं....एक सही बात की वकालत करते वक्त अब चौथा खंभा मिमियाने क्यों लगता है..और..चपरासी को अफसर का , अफसर को मंत्री का और मंत्री को जनता का डर क्यों नहीं है। मैं अब भी पसोपेश में हूं...समझ नहीं आता कि बीमार कौन था...देश या सियाराम।


रा.त्रि

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बाबू जी

रात के आठ बज रहे थे। लंबे चौड़े बरामदे की बत्ती धीमी पड़ चुकी थी। बीचोंबीच बाबूजी लेटे हुए थे। उनके अगल-बगल बर्फ की सिल्लियां रखी थीं। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। बाबूजी कभी इसी बरामदे में कुर्सी पर बैठते थे सुबह सुबह। सामने मेज होती थी। एक हाथ में अखबार और दूसरे में चाय का प्याला। देर तक पढते। कभी कभी मुझे बुलाते , सामने टाईम्स ऑफ इंडिया रख देते । कहते- ज़ोर ज़ोर से पढ़ो....जुबान साफ होगी। या फिर जाड़ों की वो शाम , जब वो आलू-मटर की घुंघरी खाते, अलाव जलाकर। सारा परिवार बैठता ईर्द गिर्द। तीनों चाचा, बुआ, हम भाई...और बाबूजी। परिवार पर चर्चा होती...कौन क्या कर रहा है...किसे क्या करना चाहिए... पुराने असल चुटकुले जो परिवार के किसी न किसी कैरेक्टर से जुड़े होते। पढ़ाई लिखाई पर उनका ज़ोर ज़्यादा रहता। कहीं कोई मौका हो, कोई इंस्टीट्यूट हो...तुरंत बताते...वहां चले जाओ....दाखिला ले लो। शिक्षा का महत्व शायद उनसे बेहतर और कोई समझ भी नहीं सकता था। दस बरस के थे , तो मां चली गईं..पिता ने दूसरी शादी की। पढ़ाई कर पाएं , इसके लिए पैसे थे नहीं...इसलिए हाईस्कूल के बाद पढ़ाई का संकट आ गया। नौकरी की और नौकरी करते हुए साहबों के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते रहे॥ताकि बीए की पढ़ाई कर सकें। शायद इसीलिए उनकी कोशिश रहती कि हम अच्छे से अच्छी पढ़ाई करें, बेहतर सलीका सीखें, बेहतर इंसान बनें। इसी बरामदे में उनकी स्कूटर खड़ी होती थी...पहले लैम्ब्रेटा...फिर बजाज प्रिया। बाद में कार आई तो वो गाड़ियां जाने कहां खो गईं।
बाबूजी गजब के किस्सागो भी थे। अपने बचपन के , करियर से जुड़े ऐसे ऐसे किस्से जो अपने खत्म होने तक सबक भी देते जाएं। किस कलेक्टर ने क्या कहा...कैसे मुश्किल से निबटा कोई अधिकारी...कौन से कमिश्नर बात के पक्के थे और कौन कान के कच्चे...खूब सारी असल कहानियां। वो एक संघर्षशील शख्सियत थे, रोज़ १४ घंटे काम करते थे...गिर कर उठना उन्होंने खूब जाना था और जहां जिसकी जितनी मदद कर पाए , करते थे। मुझे याद है जब बड़े भइया फॉरेन सर्विस की नौकरी में पहली पोस्टिंग पर ज़ांबिया जा रहे थे...तो अम्मां को रोते देख कर उन्होंने कहा था...बेटवा रहै नाहर , चाहे घर रहै , चाहे बाहर।

लेकिन अब बरामदे में लेटे थे..असहाय। अम्मां के रोने की आवाज़ आती है बीच बीच में॥अस्फुट स्वर में वो जो कहती हैं..उसका मतलब ये कि वो कह के तो गए थे कि अस्पताल तक जा रहे हैं..अभी आते हैं....तो ऐसे क्यों आए...बेजान। बाबूजी की ओर फिर देखता हूं...इतने असहाय कभी नहीं दिखे वो....तब भी नहीं , जब तीन साल तक बिस्तर पर पड़े रहे। कहीं पढ़ा था...पिता का मन हिमालय की तरह होता है। अब सोचता हूं ...बाबूजी तन और मन दोनों से हिमालय थे।

रा.त्रि

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ये हैं असली चैम्पियन

'ये समझ लीजिए कि ईशान मेरा भाई नहीं .... दूसरा बच्चा है..हमने उसे बच्चे की तरह पाला है' कहते-कहते 40 बरस के अमित गुप्ता का गला रुंध जाता है। ईशान आईटी प्रोफेशनल हैं और 4 बरस पहले नोएडा में एक सड़क दुर्घटना में कोमा में चले गए थे, ऐसे कि डेढ़ बरस तक वापस नही आए। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था, लेकिन अमित और उनके परिवार की उम्मीदों ने नहीं। ईशान के शरीर में सांसें तो थीं, लेकिन उनका दिमाग साथ नहीं दे रहा था। पूरे दो साल अमित गुप्ता , उनकी पत्नी और उनकी मां ने ईशान को कुछ ऐसे पाला जैसे कोई नवजात शिशु। अपने भाई को फिर से चलता देखने की ललक ने अमित और उनकी पत्नी में इतनी ऊर्जा भर दी थी कि साल भर की उनकी बच्ची की देखरेख भी इसके आड़े नहीं आई। अमित बताते हैं कि छोटा भाई ईशान कोमा से लौटेगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं थी, लेकिन उसके ईलाज के लिए अमित और उनके परिवार ने कानपुर का घर बेच दिया।

होली और दीवाली जैसे त्योहार आते थे और कब चले जाते थे , उनके परिवार को पता भी नहीं चल पाया। डेढ़ बरस बाद जब ईशान कोमा से वापस लौटे, तो परिवार की जान में जैसे जान आई। लेकिन अभी इम्तिहान जैसे खत्म नहीं हुए थे। ईशान को खड़ा करना था जिसके लिए अमित , उनकी पत्नी और उनकी मां ने अपनी पूरी ताकत लगा दी। अमित ईशान को अपने आगे कर पीछे से एक बेल्ट में अपनी कमर से बांध देते और फिर ईशान को खड़ा रखने की कोशिश करते थे। बकौल अमित ये मुहिम एक सेकेंड के टारगेट से शुरू हुई। यानी पहले दिन एक सेकेंड के लिए ईशान को खड़ा किया फिर दूसरे दिन दो सेकेंड और तीसरे दिन तीन सेकेंड। इस तरह हर दिन वो एक सेकेंड बढ़ाते गए और टारगेट पूरा करते गए। एक-एक सेकेंड ईशान की ज़िंदगी के खाते में जुड़ते गए और अब किसी भी सामान्य व्यक्ति की तरह ईशान रोज़मर्रा की ज़िंदगी में वापस लौट आए हैं....ज़िंदगी के वो डेढ़ साल उन्हें याद नहीं हैं...और वो याद करना भी नहीं चाहते ... एमबीए की पढ़ाई उन्हें मसरूफ़ रखती है, लेकिन उनका चेहरा अगर आप देखें तो आप को उनके भाई, उनकी भाभी और उनकी मां की तस्वीर दिख जाएगी..क्योंकि मैंने देखे हैं उस चेहरे में ये अक्स।

ईशान अमित के लिए इकलौते पड़ाव नहीं थे... मुश्किलों ने अमित को जब-जब अकेले में धरना चाहा, वो हमेशा गच्चा दे गए। न सिर्फ गच्चा दे गए...बल्कि उस लड़ाई में अव्वल होकर बाहर भी निकले। ठीक उसी तरह जैसे यूपी बोर्ड की भयानक मानी जाने वाली दसवीं और बारहवीं की परीक्षाओं में मेरिट में उन्हें जगह मिली थी। इंटरमीडिएट के नतीजे आ गए थे और घर-बाहर , पड़ोसियों और रिश्तेदारों में मां-बाप की नाक और ऊंची हो गई थी। रुड़की इंजीनियरिंग कॉलेज में एडमिशन मिलने से पिता की छाती और चौड़ी हुई लेकिन इसके कुछ ही दिनों के भीतर जैसे परिवार की खुशियों को ग्रहण लग गया। जिस दिन उन्हें इंजीनियरिंग कॉलेज मे एडमिशन के लिए जाना था उसके एक दिन पहले पिता ने आंखें मूंद लीं। जब इंजीनियरिंग में एडमिशन मिलना प्रतिभा की सबसे बड़ी मिसाल मानी जाती थी, उन्हें देश के अच्छे कॉलेजों में से एक में जगह मिली, लेकिन पिता के यकायक जाने से टूटे आर्थिक मुश्किलों के पहाड़ ने उन्हें रुड़की से अलग रखा। हार कर अमित ने बीएससी की और ज़िंदगी के खेल में आगे बढ़ लिए। ज़िंदगी रोड़े अटकाती रही, और वो लोहा बनते गए।

इसीलिए अगर अपने बच्चों को बताना हो कि असली चैंपियन कैसे होते है , तो आप नोएडा के सेक्टर 25 में अमित गुप्ता के घर ज़रूर जाएं।

रा.त्रि

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बेटा बड़ा हो गया है

रसे बाद अचानक

घर में किताबों की आमद बढ़ गई है
पॉलो कोल्हो..चार्ल्स डिकेंस...
.... रस्किन बॉंड और.....
और बहुत सारी दूसरी किताबें

मैं उन नये पन्नों की खुशबू सूंघता हूं
मुझे एक पीढ़ी का अहसास होता है
मैं उनके कवर पेज पर
एक ज़िंदगी की शुरुआत देखता हूं
नई कोंपलों जैसी नरमी.....
और सुबह के सूरज की किरणों की गुनगुनाहट
उनमें चिड़ियों की चहचहाहट भी सुनाई पड़ती है

मेरे भीतर का बच्चा बड़ा होने लगा है....

जब से क़िताबें.......घर आने लगी हैं


रा.त्रि

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अम्मां

हुत सालों पहले ,
अम्मा देखा करती थी,एक सपना ..

पने में लहलहाती थी खुशियाँ,
जिसमे, एक ख़याल पनप कर 
सरकारी बंगले से होता हुआ ..
'अपने-घर' में तब्दील हो जाता था ..
जिसमे पिता होते थे,
उनके साथ ..वार्धक्य का 
सुख-दुःख बांटते हुए ..

इस एक सपने के पीछे,
दौड़ती रही ,सालों-साल ..
इसी भागम-भाग में 
एक दिन छूट गया 
'सप्तपदी' सुनते हुए हौले से थामा गया 
एक मजबूत हाथ . 
फिर .., एक दिन अम्मा ,
थक के बैठ गई 
खुद को सुलझाने की आस में ,
बिलकुल उलझ गई ..

तमाम बड़ी बातो का हौसला देने में,
कभी भी पीछे नहीं रहे,हम 
अपनी बूढी होती अम्मा को रोज़ सिखाया,
हमारे लिए छाँव वहीँ होगी ,
जहां भी तुमने अपना दामन फैलाया ..

अम्मा कैसे कहती,की 
वो हमारी बात नहीं समझती ?
और उसने भी ओढ़ लिया मुखौटा ,
संतुष्ट रहने का ...
और रिश्तो के लबादे में 
चुपचाप पलने लगी ...!

और एक दिन ....
अम्मा के सारे सपने सच हो गए ..
बेहद चुपचाप तरीके से ,
अम्मा अपने ख़्वाबों के बगीचे में जा बैठी ...
जहां उसके इर्द-गिर्द बसा हुआ था ,
उसके सपनो का लहलहाता खेत ,
फिर भी .. 
अम्मा मुस्कुराती क्यों ना थी ?

कुछ अनुमान ही शेष हैं ...,

शायद ,अम्मा का दर्द हो ..
अपनी जड़ों से कट जाने का 
9 महीने की बच्ची को गोद में लेकर 
दाखिल हुई थी जिस घर में,
वहां आखिरी पूर्णाहुति देकर ,
बेरंग ,बेनूर  होकर निकलते हुए ...
कुछ चिटका  तो ज़रूर होगा ,
अम्मा के भीतर ..!

कुछ तकलीफें होंगी ..
उन परम्पराओं के वहीँ छूट जाने की 
जिन्हे निभाया करती थी अम्मा ..
होली,दिवाली और रक्षाबंधन के बहाने ..
अक्सर बहुत याद  आएँगी ,वो दीवारें 
जहां से हो सकती थी ...
कभी भी,किसी से भी ...
बेकल दिल की बातें ...!

त्योहारों में यकीन हो ना हो ..
विश्वास जीता था,उस बहाने से ,
अम्मा के करीब जाने का,
उसके  चेहरे पर खिलती हंसी से 
जी जाने का ...!
पर खैर ..
अलग-अलग तरीके से,
सब मरते हैं,कई कई बार  !

तब जाकर पता चलता है,की 
कितनी  भावनाओं का  हविष्य 
कितनी सिसकियों का तर्पण ,
देना होता है ...
तब जाकर ,

आती है समृद्धि !!

सुमन-------


(ये इलाहाबाद की सुमन हैं..पक्की गृहस्थिन..लेकिन उससे भी पक्की साहित्यकार। उनका साहित्य तवे की रोटी की तरह है, सोंधी खुशबू वाला..और उसमें चूल्हे की आग का सा तेज़ भी है। उनकी कविताएं महकती हैं....और जो भी लिख दें...पढ़ने लायक होता है। )

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अलविदा

जा
मैं नहीं रोकूंगा तुम्हें
वैसे भी रोके से
कौन रुका है
आज तक
मैं बांध बन जाऊंगा
रोकूंगा वो प्रवाह
आखिरी सांस तक
और फिर एक रोज़

जब सब थम जाएगा
तब वहां
एक तुलसी का पौधा लगाउंगा
जहां कभी तुमसे
उचकने को कहा था

- रा.त्रि

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उपेक्षित



जब फेफड़ा
आक्सीजन को तरस रहा है
तुम दूर होते जा रहे हो
मैं तुम्हें देख रहा हूं
धीरे धीरे अलग होते

थोड़ी देर में
तुम ओझल हो जाओगे
और

मैं उसके तुरंत बाद
विलीन

रा.त्रि

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वो लड़की



वो वैसी ही थी
बिल्कुल छोटी बच्चियों जैसी
अपने में मगन..फ्रॉक पहने, दोनों चोटियां,
जिनके अंतिम हिस्से पर
गुलाबी रिब्बन बंधे हों.. इधर-उधर लहराती हुई,
दबंग सी, धूल मिट्टी में खेलती हुई...अकेली।
बस अपने बालू के घर बनाती और बिगाड़ती हुई...
और कभी-कभी
खेलते-खेलते न जाने कब सो जाने वाली
इस तरह अपने ही भीतर के झंझावातों से
ताकत बटोरती हुई
और ज़िंदगी में आगे बढ़ जाती हुई।
वो वैसी ही थी


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नोएडा की लड़कियां





नोएडा की लड़कियां
सुबह सुबह निकलती हैं
दिल्ली के दफ्तर को
शेयरिंग वाले ऑटो से
रेज़गारी के लिए झगड़ती
भागमभाग वाले मेकअप में
मेट्रो की लाइन तोड़ती
कंधे का बैग पटकती
आगे बढ़ती हैं
नोएडा की लड़कियां

कभी-कभी मेट्रो में
सीट के लिए लड़तीं
और कभी-कभी
दूसरे को यूं ही
अपनी जगह दे देतीं
दफ्तर तक का सफर
मेसेंजर और व्हाट्सअप
पर करतीं
मुस्कुराते हुए मेसेज करती
फिर कोई मेसेज पढ़
बिना बात
झूम भी उठतीं हैं
नोएडा की लड़कियां
शाम ढले

तन पर दिन भर की
चिपकी घूरती निगाहों को
पीठ पर लादे
जब घर लौटती हैं
नोएडा की लड़कियां
तब आप देख सकते हैं
उनके बदन पर लटके
असंख्य,अदृश्य
गोल्ड मेडल
कल सुबह फिर निकलेंगी
नोएडा की लड़कियां

राकेश त्रिपाठी

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