RSS

बात पते की

पहाड़ों से घिरा देश का एक कोना ऐसा है, जो आजकल दो अलग अलग तस्वीरें दिखा रहा है। ये इलाका है उत्तरांचल का देहरादून । यहां के एक अस्पताल में अभी हाल ही में देश भर के बड़े संतों ने बाबा रामदेव को जूस पिला पिला कर अनशन तुड़वाया। टेलीविजन पर प्रसारित करने के लिए इसकी तस्वीरें भी खिंचवाईं गईं और इसे राष्ट्र हित में बताया गया। लेकिन संतों की नज़र इसी अस्पताल में बिस्तर पर मौत की बाट जोह रहे उस साधु पर नहीं पड़ी, जिसने गंगा नदी के लिए महीनों से अनशन कर रखा था। वो निगमानंद थे , हरिद्वार में गंगा को , उन हाथों से बचाना चाहते थे जो नदी की तलहटी की खुदाई कर मालामाल होने में जुटे थे। सरकार ने निगमानंद की गुहार सुनी थी और खनन का काम रोक दिया था...लेकिन मामला हाइकोर्ट में गया तो स्टे लग गया।

निगमानंद इस स्टे के खिलाफ फिर अदालत के दरवाजे पहुंचे तो उन्हें ये कहकर लौटा दिया गया कि वो दूसरी बेंच में जाएं। अदालती दांवपेंच ने उस साधु को इतना हिला दिया कि उसे और कोई रास्ता नहीं सूझा॥और वो अनशन पर बैठ गया। बैठा तो फिर उठा नहीं.....चाहता तो जूस पी लेता.....लेकिन उसकी ज़िद उसे उस कोमा तक ले गई...जहां से वो फिर नहीं उठा। निगमानंद फिल्म 'गाइड' के उस राजू की याद दिलाता है, जिसे लोग ग़लती से पहुंचा हुआ साधु समझ लेते हैं। राजू जानता है कि वो कोई पहुंचा हुआ संत नहीं है, लेकिन फिर भी भोले गांववालों के उस भरोसे को तोड़ना नहीं चाहता कि उसके अनशन से बारिश ज़रूर होगी। बारिश ज़रूर हुई लेकिन कई दिनों का भूखा राजू भरोसे की वेदी पर चढ़ गया...तो फिर नहीं उठा। स्वामी निगमानंद १९ फरवरी से अनशन पर बैठे थे, यानी करीब ४ महीने उस व्यवस्था से वो अकेले लड़ते रहे , जिससे स्वामी रामदेव के ५० हज़ार चेले रामलीला मैदान में एक रात नहीं लड़ पाए। स्वामी रामदेव को तो खैर सातवें दिन इज़्ज़त बचाने के लिए जूस पीना पड़ा.....जूस पिया या अपमान का घूंट॥ये तो वही जानते हैं...लेकिन ये तय है कि सच्चे भरोसे की कीमत अपने देश में कोई नहीं समझता। अगर समझता होता , तो उमा भारती गंगा को बचाने के लिए अपनी मुहिम को अपनी पार्टी में लौटने का ज़रिया नहीं बनातीं...

अगर विश्वास की कद्र होती तो उस रात रामलीला मैदान में वो न होता जो हुआ। अगर भावनाओं की इज़्ज़त होती तो सोनिया या राहुल दूसरे दिन अस्पतालों में जाते और लोगों से उनका हाल पूछते। आखिर राहुल भट्टा पारसौल तक तो गए ही थे....रामलीला मैदान तो उनके घर से कुछ ही कदम दूर था। वर्ल्ड कप की जीत के बाद सोनिया दिल्ली के ITO चौराहे पर आ सकतीं थीं तो रामलीला मैदान तो उससे कुछ ही आगे है....चाहतीं तो जातीं...देखतीं कि वहां सोते हुए लोगों के साथ उनकी पुलिस ने जो किया है...वो भी किसी भरोसे का कत्ल है। शायद इसीलिए गाइड का राजू और हरिद्वार का निगमानंद दोनों एक ही चेहरा लगते हैं। भरोसे की इज़्जत करने वाले ऐसे चेहरे…. जिनकी कीमत हमें या तो समझ नहीं आती॥या फिर बहुत देर में समझ आती है।

  • Digg
  • Del.icio.us
  • StumbleUpon
  • Reddit
  • RSS

3 comments:

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

भरोसे की इज्जत...!!! बहुत दुर्लभ चीज हो गयी है यह। राजनीति में तो शून्यप्राय है।

Rahul Singh said...

देश, काल और पात्र के साथ बनती-बिगड़ती दास्‍तान.

Unknown said...

सर ये हमारे देश की विडंबना ही है कि रामदेव जैसे अरबपति साधु... जो योग सिखाने के लिए अपने शिविरों में लाखों के टिकट लगाते हैं... उन्हें लोगों का समर्थन मिल जाता है.. क्योंकि दिन रात इनके चेहरे टीवी पर चमकते रहते हैं.. लेकिन निगमानंद जैसे साधु जो चुपचाप रहकर देश के भले के लिए अपनी जान गंवा देते हैं.. वो अंधेरे में गुम हो जाते हैं... समाज को अपनी सोच बदलनी चाहिए...