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संभल जाओ रहनुमाओ

वो ताज प्रेम की इमारत तो नहीं था-लेकिन वहां मोहब्बत करने वाले आते थे। लेकिन गोलियों से जब उसकी दीवारें छलनी कर दी गईं...तो शहर फट पड़ा। गेटवे ऑफ इंडिया पर उमड़ी वो भीड़ शायद इतिहास में अपना नाम लिख गई हो....बता गई हो कि सब्र का बांध जब टूट जाता है तो एक आम शरीफ शहरी के गुस्से की शक्ल कैसी होती है। मोमबत्तियां जलाकर, भड़काऊ पोस्टर लेकर और अपने रहनुमाओं को गाली देकर उस रात वो भीड़ लौट गई जिसने उस शहर का दुख अपने कलेजे में बड़ी शिद्दत से महसूस किया था। ये एका इतना चौंकाने वाला था कि उस शहर के आका को कुर्सी छोड़ते वक्त कहना पडा कि - लोगों का गुस्सा बहुत था, इसलिए इस्तीफा दे रहा हूं।
इतिहास में ऐसी कई भीड़ों का ज़िक्र हुआ होगा और उन्होंने कई बदलाव किये होंगे। एक की तो याद आप सबको होगी-जब फ्रांस की एक रानी ने महल से झांक कर बाहर देखा और कारिंदों से पूछा कि ये भीड़ क्यों महल के बाहर खड़ी है, कारिंदों ने बताया कि ये लोग कहते हैं कि ये भूखे हैं...इन्हें रोटी चाहिए....रानी ने पूछा--भूखे हैं तो केक क्यों नहीं खाते। इतिहास के पन्नों में दर्ज उस भीड़ ने कुछ दिनों बाद फ्रांस का तख्ता पलट दिया। ताज के सामने इकट्ठा वो भीड़ भी एक चेतावनी थी...हुक्मरानों को...कर लो जितना घालमेल कर सकते हो। एक दिन आएगा जब जवाब देना होगा..कोई कोर्ट कचहरी नहीं...यहीं सबके सामने देना होगा जवाब।
नींद से जागी भीड़ तब पूछेगी कि ये कौन सा कानून है कि ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने पर एक शूटर को ये देश 3 करोड़ रूपये और 40 लाख की कार न्योछावर कर देता है...और ताज बचाने वाले कमांडोज़ मारे जाते हैं तो उनके परिवार को 5 लाख रुपये देकर अपनी ड्यूटी पूरी कर ली जाती है। यही नहीं .... मरने वाले एक कमांडो के परिवार से एक मुख्यमंत्री बदजुबानी भी करता है, माफी मांगने से इनकार भी करता है , फिर माफी मांग भी लेता है। इस नैतिकता पर भीड़ सवाल नहीं पूछेगी...सीधे फैसला करेगी।
सवाल पूछे जाएंगे उन लोगों से भी जिन्होंने कहा था कि लिपिस्टिक-पाउडर लगाकर गेटवे ऑफ इंडिया पर प्रदर्शन करने वाली महिलाओं की जांच होनी चाहिए। लोग पूछेंगे कि तुमने ये सवाल तब क्यों नहीं किया जब यहीं औरतें लिपिस्टिक-पाउडर लगाकर तुम्हें वोट देने सड़कों पर उतरीं थीं...और तुम्हें कुर्सी पर बिठाया भी। शायद इसीलिए लगातार अपनी ग़लतियों से सबक न लेने वाले देश को सोचना होगा कि वो नौबत न ही आए तो बेहतर कि भीड़ को फैसला करना पड़े।

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5 comments:

परमजीत सिहँ बाली said...

बहुत बढिया व सामयिक पोस्ट प्रस्तुत की है। बधाई स्वीकारे। सही सवाल उठाएं है।

SKAND said...

I sometimes think if this carnage was done at a market visited by the lower classes in our economic heirarchy( which have happened previously many times), would it have generated the same amount of reaction and heat? Have our T.V. cameras focussed equally on CST and Cama Hospital as they did on the two five stars? Has our upper middle class realised the menace of terror now ? Will this anger in them lead them to spend some of their precious time on the polling-booths and help in formation of a real government. Why should we critcise the government when it is we who have formed them ?

Meenakshi Kandwal said...

मुंबई हमले से भड़का जनता का ये गुस्सा सचमुच किसी क्रांति का आगाज़ लगता है। लेकिन बात फिर वहीं आकर अटक जाती है कि कब तक इसका असर कायम रहेगा। ज्यों ही ज़ख्म भरने लगेंगे, त्यों ही गुस्सा भी ठंडा पड़ने लगेगा। मीडिया भी अपनी दुकान चलाने के लिए कुछ नया पकड़ लेगा और फिर वही ढाक के तीन पात... जांच कमेटियां बनेंगी, नेताओं की बयनाबाज़ी होगी, मुकदमे चलेंगे... सालो साल चलेंगे और फिर.........

Manojtiwari said...

नेता लोग चाहे कितना भी अपना गाल क्यों न बजा लें आतंकवाद के खिलाफ ये कुछ नहीं करने वाले जब भी भारत पर हमला होता है चार दिन जम कर बयान बाजी होती है उधर पाकिस्तान में नजरबंदी का नाटक होता है क्या यही नाटक हम १३ दिसम्बर के आतंकवादी हमले में पहले भी नहीं देख चुके फिर हमारे नेता इस सब से थकते क्यों नहीं हैं जनता पे अपने गुस्से की भडास क्यों निकलते हैं क्या इसके लिए हमने इन्हें सत्ता सौपी है

Manojtiwari said...

this is realy very good & relevent