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कभी धूप कभी छाँव के दिन

जावेद अख़्तर
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रात के शायद दो बजे होंगे। बंबई की बरसात, लगता है आसमान से समंदर बरस रहा है....
मैं खार स्टेशन के पोर्टिको की सीढ़ियों पर एक कमज़ोर से बल्ब की कमज़ोर सी रौशनी में बैठा हूँ। पास ही ज़मीन पर इस आँधी-तूफ़ान से बेख़बर तीन आदमी सो रहे हैं।
दूर कोने में एक भीगा हुआ कुत्ता ठिठुर रहा है.... बारिश लगता है अब कभी नहीं रुकेगी..... दूर तक ख़ाली अँधेरी सड़कों पर मूसलाधार पानी बरस रहा है.... ख़ामोश बिल्डिंगों की रौशनियाँ कब की बुझ चुकी हैं....
लोग अपने-अपने घरों में सो रहे होंगे.... इसी शहर में मेरे बाप का भी घर है.... बंबई कितना बड़ा शहर है और मैं कितना छोटा हूँ, जैसे कुछ नहीं हूँ.... आदमी कितनी भी हिम्मत रखे कभी-कभी बहुत डर लगता है........मैं अब साल भर से कमाल स्टूडियो (जो कि अब नटराज स्टूडियो है) में रहता हूँ.... कंपाउंड में कहीं भी सो जाता हूँ. ....कभी किसी बरामदे में, कभी किसी पेड़ के नीचे, कभी किसी बेंच पर, कभी किसी कॉरीडोर में..... यहाँ मेरे जैसे और कई बेघर और बेरोज़गार इसी तरह रहते हैं....
उन्हीं में से एक जगदीश है, जिससे मेरी अच्छी दोस्ती हो जाती है..... वो रोज़ एक नई तरकीब सोचता है कि आज खाना कहाँ से और कैसे मिल सकता है, आज दारू कौन और क्यों पिला सकता है..... जगदीश ने बुरे हालात में ज़िंदा रहने को एक आर्ट बना लिया है.....मेरी जान-पहचान अँधेरी स्टेशन के पास फुटपाथ पर एक सेकंड हैंड किताब बेचने वाले से हो गई है. ....इसलिए किताबों की कोई कमी नहीं है.... रात-रात भर कम्पाउंड में जहाँ भी थोड़ी रौशनी होती है, वहीं बैठकर पढ़ता रहता हूँ....दोस्त मज़ाक करते हैं कि मैं इतनी कम रौशनी में अगर इतना ज़्यादा पढ़ता रहा तो कुछ दिनों में अंधा हो जाऊँगा... आजकल एक कमरे में सोने का मौक़ा मिल गया है....स्टूडियो के इस कमरे में चारों तरफ़ दीवारों में लगी बड़ी-बड़ी अलमारियाँ हैं जिनमें फ़िल्म पाकीज़ा के दर्जनों कॉस्ट्यूम रखे हैं.....मीना कुमारी कमाल साहब से अलग हो गई हैं, इसलिए इन दिनों फ़िल्म की शूटिंग बंद है.... एक दिन मैं एक अल्मारी का ख़ाना ख़ोलता हूँ, इसमें फ़िल्म में इस्तेमाल होने वाले पुरानी तरह के जूते-चप्पल और सैंडिल भरे हैं और उन्हीं में मीना कुमारी के तीन फ़िल्मफ़ेयर एवार्ड भी पड़े हैं....मैं उन्हें झाड़-पोंछकर अलग रख देता हूँ.... मैंने ज़िंदगी में पहली बार किसी फ़िल्म एवार्ड को छुआ है....रोज़ रात को कमरा अंदर से बंद करके, वो ट्रॉफी अपने हाथ में लेकर आईने के सामने खड़ा होता हूँ और सोचता हूँ कि जब ये ट्रॉफी मुझे मिलेगी तो तालियों से गूँजते हुए हॉल में बैठे हुए लोगों की तरफ़ देखकर मैं किस तरह मुस्कुराऊँगा और कैसे हाथ हिलाऊँगा.....इसके पहले कि इस बारे में कोई फ़ैसला कर सकूँ स्टूडियो के बोर्ड पर नोटिस लगा है कि जो लोग स्टूडियो में काम नहीं करते वो कम्पाउंड में नहीं रह सकते।

यह वह दौर था जब कामयाबी मिलने लगी थी। जगदीश मुझे फिर एक तरकीब बताता है कि जब तक कोई और इंतज़ाम नहीं होता हम लोग महाकाली की गुफाओं में रहेंगे(महाकाली अँधेरी से आगे एक इलाक़ा है जहाँ अब एक घनी आबादी और कमालिस्तान स्टूडियो है। उस ज़माने में वहाँ सिर्फ़ एक सड़क थी, जंगल था और छोटी-छोटी पहाड़ियाँ जिनमें बौद्ध-भिक्षुओं की बनाई पुरानी गुफाएँ थी, जो आज भी हैं। उन दिनों उनमें कुछ चरस-गाँजा पीने वाले साधु पड़े रहते थे....महाकाली की गुफाओं में मच्छर इतने बड़े हैं कि उन्हें काटने की ज़रूरत नहीं, आपके तन पर सिर्फ़ बैठ जाएँ तो आँख खुल जाती हैं...एक ही रात में ये बात समझ में आ गई कि वहाँ चरस पीए बिना कोई सो ही नहीं सकता... तीन दिन जैसे-तैसे गुज़ारता हूँ....बांदरा में एक दोस्त कुछ दिनों के लिए अपने साथ रहने के लिए बुला लेता है..... मैं बांदरा जा रहा हूँ।
जगदीश कहता है दो-एक रोज़ में वो भी कहीं चला जाएगा (ये जगदीश से मेरी आख़िरी मुलाकात थी)।
आनेवाले बरसों में ज़िंदगी मुझे कहाँ ले गई मगर वो ग्यारह बरस बाद वहीं, उन्हीं गुफ़ाओं में चरस और कच्ची दारू पी-पीकर मर गया और वहाँ रहने वाले साधुओं और आसपास के झोंपड़-पट्टी वालों ने चंदा करके उनका क्रिया-कर्म कर दिया-क़िस्सा खतम। मुझे और उसके दूसरे दोस्तों को उसके मरने की ख़बर भी बाद में मिली। मैं अकसर सोचता हूँ कि मुझमें कौन से लाल टंकें हैं और जगदीश में ऐसी क्या ख़राबी थी। ये भी तो हो सकता था कि तीन दिन बाद जगदीश के किसी दोस्त ने उसे बांदरा बुला लिया होता और मैं पीछे उन गुफाओं में रह जाता। कभी-कभी सब इत्तिफ़ाक लगता है.... हम लोग किस बात पर घमंड करते हैं....
मैं बांदरा में जिस दोस्त के साथ एक कमरे में आकर रहा हूँ वो पेशेवर जुआरी है. ..वो और उसके दो साथी जुए में पत्ते लगाना जानते हैं.... मुझे भी सिखा देते हैं...कुछ दिनों उनके साथ ताश के पत्तों पर गुज़ारा होता है फिर वो लोग बंबई से चले जाते हैं और मैं फिर वहीं का वहीं-अब अगले महीने इस कमरे का किराया कौन देगा....एक मशहूर और कामयाब राइटर मुझे बुलाके ऑफ़र देते हैं कि अगर मैं उनके डॉयलॉग लिख दिया करूँ (जिन पर ज़ाहिर है मेरा नहीं उनका ही नाम जाएगा) तो वो मुझे छह सौ रुपए महीना देंगे....सोचता हूँ ये छह सौ रुपए इस वक़्त मेरे लिए छह करोड़ के बराबर हैं, ये नौकरी कर लूँ, फिर सोचता हूँ कि नौकरी कर ली तो कभी छोड़ने की हिम्मत नहीं होगी, ज़िंदगी-भर यही करता रह जाऊँगा, फिर सोचता हूँ अगले महीने का किराया देना है, फिर सोचता हूँ देखा जाएगा....तीन दिन सोचने के बाद इनकार कर देता हूँ.... दिन, हफ़्ते, महीने, साल गुज़रते हैं.... बंबई में पाँच बरस होने को आए, रोटी एक चाँद है हालात बादल, चाँद कभी दिखाई देता है, कभी छुप जाता है.....ये पाँच बरस मुझ पर बहुत भारी थे मगर मेरा सर नहीं झुका सके..... मैं नाउम्मीद नहीं हूँ... मुझे यक़ीन है, पूरा यक़ीन है, कुछ होगा, कुछ ज़रूर होगा, मैं यूँ ही मर जाने के लिए नहीं पैदा हुआ हूँ-और आख़िर नवंबर, 1969 में मुझे वो काम मिलता है जिसे फ़िल्मवालों की ज़बान में सही "ब्रेक"कहा जाता है...कामयाबी भी जैसे अलादीन का चिराग़ है... अचानक देखता हूँ कि दुनिया ख़ूबसूरत है और लोग मेहरबान.... साल-डेढ़ साल में बहुत कुछ मिल गया है और बहुत कुछ मिलने को है. .....
सीता और गीता के सेट पर हनी ईरानी मिलीं और फिर शादी हो गई...हाथ लगते ही मिट्टी सोना हो रही है और मैं देख रहा हूँ-अपना पहला घर, अपनी पहली कार.... तमन्नाएँ पूरी होने के दिन आ गए हैं मगर ज़िंदगी में एक तनहाई तो अब भी है.....सीता और गीता के सैट पर मेरी मुलाकात हनी ईरानी से होती है..... वो एक खुले दिल की, खरी ज़बान की मगर बहुत हँसमुख स्वभाव की लड़की है..... मिलने के चार महीने बाद हमारी शादी हो जाती है...मैंने शादी में अपने बाप के कई दोस्तों को बुलाया है मगर अपने बाप को नहीं (कुछ जख़्मों को भरना अलादीन के चिराग़ के देव के बस की बात नहीं-ये काम सिर्फ वक़्त ही कर सकता है).... दो साल में एक बेटी और एक बेटा, ज़ोया और फ़रहान होते हैं....
अगले छह वर्षों में एक के बाद एक लगातार बारह सुपर हिट फ़िल्में, पुरस्कार, तारीफ़ें, अख़बारों और मैगज़ीनों में इंटरव्यू, तस्वीरें, पैसा और पार्टियाँ, दुनिया के सफ़र, चमकीले दिन, जगमगाती रातें-ज़िंदगी एक टेक्नीकलर ख़्वाब है, मगर हर ख़्वाब की तरह यह ख़्वाब भी टूटता है.....पहली बार एक फ़िल्म की नाकामी-(फिल्में तो उसके बाद नाकाम भी हुईं और कामयाब भी मगर कामयाबी की वो खुशी और खुशी की वो मासूमियत जाती रही)....

(फ़िल्मी गीतकार, पटकथा लेखक और उर्दू शायर जावेद अख़्तर का यह आत्मकथ्य उनके काव्य संग्रह 'तरकश' से लिया गया है)बीबीसी से साभार

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5 comments:

Udan Tashtari said...

Javed sahab ki Tarkash me padha tha..ise yahan pesh karne kaa aabhar.

राकेश त्रिपाठी said...

shukriya sir

रंजू भाटिया said...

पहले भी पढ़ा है :)यहाँ पढ़ना और अच्छा लगा शुक्रिया

राज भाटिय़ा said...

दोबारा पढना भी अच्छा लगा, धन्यवाद

SKAND said...

" kabh kabhi sab itifaq lagata hai...ham log kis baat par ghamand karte hain" -- a refrain found in thoughts of all philosophers.And so true and consoling.